वक्फ बिल के समर्थन से JDU में दरार, बिहार चुनाव में कहीं भारी न पड़ जाए 'मुस्लिम वोटबैंक' की नाराजगी!
बिहार की राजनीति में इन दिनों वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 को लेकर गरमाई हुई है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाली पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने संसद में इस बिल का समर्थन कर दिया, लेकिन अब पार्टी के भीतर बेचैनी साफ देखी जा रही है। विधेयक के लोकसभा और राज्यसभा में पारित होने के कुछ घंटों के भीतर ही जेडीयू के पांचमुस्लिम नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। वहीं कुछ अन्य नेताओं ने विधेयक पर अपनी असहमति व्यक्त की है।
जेडीयू के अंदर की हलचल दिखाती है कि पार्टी का एक वर्ग में वक्फ (संशोधन) विधेयक का समर्थन करने को लेकर असंतोष है। सबसे हाल ही में इस्तीफा पार्टी की युवा शाखा के उपाध्यक्ष तबरेज हसन ने दिया है। उनसे पहले, जेडीयू अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव मोहम्मद शाहनवाज मलिक, अलीगढ़ से प्रदेश महासचिव मोहम्मद तबरेज सिद्दीकी, भोजपुर से सदस्य मोहम्मद दिलशान राईन और पूर्व उम्मीदवार मोहम्मद कासिम अंसारी ने भी इस्तीफा दे दिया था।

बिहार चुनाव: JDU पर कहीं भारी न पड़ जाए मुस्लिमों की नाराजगी!
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या यह कदम आने वाले बिहार विधानसभा चुनावों में जेडीयू को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है? जेडीयू प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत जेडीयू नेताओं को अब बिहार चुनाव से पहले मुस्लिम वोटबैंक खिसकने का डर सता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जेडीयू के कई नेता वक्फ बिल इस समर्थन को लेकर नाराज हैं और पार्टी के भीतर गुपचुप असहमति की आवाजें उठ रही हैं। यह असंतोष अगर खुलकर सामने आया, तो पार्टी की एकता पर असर पड़ सकता है। वहीं विपक्ष (राजद, कांग्रेस, AIMIM) इस मुद्दे को लेकर जेडीयू को घेरने में जुट गया है।
युवा शाखा के उपाध्यक्ष तबरेज हसन ने 4 अप्रैल को जेडीयू प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपना इस्तीफा भेजा। अपने इस्तीफे में उन्होंने कहा कि बिल के लिए पार्टी के समर्थन ने मुसलमानों का भरोसा तोड़ा है, जो मानते हैं कि यह पार्टी धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लिए खड़ी है।
तबरेज हसन ने नीतीश कुमार को लिखे पत्र में लिखा,
"मुझे उम्मीद थी कि आप अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाए रखेंगे, लेकिन आपने उन ताकतों के साथ खड़े होने का फैसला किया जो लगातार मुसलमानों के खिलाफ काम करती रही हैं। एनडीए सरकार का वक्फ विधेयक अनुच्छेद 370 को खत्म करने, तीन तलाक कानून और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे पहले के कदमों के बाद आया है, जिससे मुस्लिम हितों को नुकसान पहुंचा है। मैं पार्टी से विधेयक का विरोध करने का आग्रह करते हुए उर्दू और हिंदी में ज्ञापन सौंपे थे, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। इस्तीफा गहन विचार के बाद दिया जा रहा है। यह मेरी जिम्मेदारी का अंत नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत है।"
गौरतलब है कि जेडीयू, खासकर नीतीश कुमार की छवि, लंबे समय तक एक "सेक्युलर" नेता की रही है। नीतीश कुमार पहले भी भाजपा से अलग होकर अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने की कोशिश की थी। हालांकि भाजपा के साथ गठबंधन ने पहले ही जेडीयू की "सेक्युलर" छवि को कमजोर किया है। अब जब पार्टी ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए वक्फ विधेयक का समर्थन किया है, ऐसे में संदेश जा सकता है कि जेडीयू अब मुस्लिम हितों की रक्षा नहीं कर रही।
क्या नीतीश कुमार मुस्लिम समुदाय की नाराजगी से डर रहे हैं?
क्या नीतीश कुमार मुस्लिम समुदाय की नाराजगी से डर रहे हैं? इस विधेयक के पारित होने से बिहार चुनाव में नीतीश कुमार पर क्या असर पड़ेगा? क्या बिहार विधानसभा चुनावों मुस्लिम समुदाय का समर्थन उनसे छीन जाएगा? इन सवालों के जवाब देते हुए भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''नीतीश कुमार के बारे में सवाल तब से पूछे जा रहे हैं जब से उन्होंने 1996 में भाजपा के साथ गठबंधन किया था। ऐसे में हर बार ये मुद्दा उठता है,...।''
उन्होंने आगे कहा कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी हल्ला था कि मुस्लिम की नागरिकता छीन जाएगी। लेकिन क्या एक भी मुस्लिमों की नागरिकता छीनी गई है।
उन्होंने कहा, "लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि 1984 में हम दो थे, 1984 की लोकसभा में सिर्फ दो (भाजपा के पास दो सीटें थीं)। आज हम कहां हैं? देश के 21 से अधिक राज्यों में शासन कर रहे हैं। हमारे बहुत ही गौरवशाली सहयोगी और मित्र नीतीश कुमार जी 19 साल तक मुख्यमंत्री रहे हैं...उन्होंने सोचकर फैसला किया है।''
सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''धर्मनिरपेक्ष, सांप्रदायिक, तुष्टीकरण। दुनिया बदल गई है। भारत बदल गया है। और मैं कहूंगा कि अल्पसंख्यक समुदाय के युवा और विचारशील समुदाय भी बदल गए हैं... और कुछ लोग 1990 और 1980 के दशक के उन्हीं तर्कों से उस बदलाव को विफल करने की कोशिश कर रहे हैं।"
नीतीश की JDU के पास कितना मुस्लिम वोटबैंक? क्या सच में डरने की जरूरत है?
हालांकि मुस्लिम वोटबैंक को लेकर ये डर पहली नजर में मान्य लग सकता है कि लेकिन पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो आपके सामने कुथ और ही तस्वीर आएगी। 2015 के बाद जेडीयू के पास कभी भी इतना मुस्लिम वोटबैंक नहीं रहा है कि उसके आने-जाने से चुनाव के परिणाम पर असर पड़े। जब 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार एनडीए से अलग रहकर चुनाव लड़े थे तो मुस्लिम वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा उनके सपोर्ट में था।
सीएसडीएस लोकनीति पोस्ट पोल सर्वे के मुकाबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू को 23.5% मुस्लिम वोट और 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को 80% मुस्लिम वोट मिले थे। लेकिन जैसे ही 2020 में नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन में शामिल हुए तो तस्वीर बदल गई। 2020 के विधानसभा चुनावों में जेडीयू को सिर्फ 5 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनावों में जेडीयू गठबंधन को केवल 6% मुस्लिम वोट मिले थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू गठबंधन को 12 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वक्फ विधेयक पर समर्थन जेडीयू के लिए एक संवेदनशील तो मुद्दा बन गया है। इसका चुनावी असर तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल यह तय है कि पार्टी को मुस्लिम समुदाय में अपनी छवि को लेकर फिर से आत्ममंथन करना पड़ेगा।
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