Bihar Chunav 2025: अधिकार यात्रा या एकला चलो की दस्तक? तेजस्वी की अलग राह से कांग्रेस,RJD के रिश्तों में दरार!
Bihar Chunav 2025: बिहार की राजनीति में फिर से हलचल है। महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं, मगर इस बार मामला और गहरा दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने 16 सितंबर से अपनी अलग 'बिहार अधिकार यात्रा' शुरू करने की घोषणा की है। यह महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि गठबंधन सहयोगियों, खासकर कांग्रेस के साथ खिंचती डोर का स्पष्ट संकेत भी है।
कांग्रेस का निमंत्रण और राजद की अनुपस्थिति
औरंगाबाद के कुटुंबा विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के आमंत्रण पर आयोजित सम्मेलन में राजद नेताओं का न पहुंचना घटनाक्रम को और तीखा बना देता है। यही नहीं, उसी विवाह भवन में अब राजद अपना सम्मेलन कर रहा है। राजनीति में प्रतीकों का गहरा अर्थ होता है; कांग्रेस के कार्यक्रम का यह बहिष्कार सिर्फ व्यस्तता का बहाना नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर उभरती असहमति का प्रतीक है।

सीट शेयरिंग और सीएम चेहरे पर विवाद
सूत्र बताते हैं कि विवाद की जड़ मुख्यमंत्री पद की घोषणा है। राजद चाहता है कि तेजस्वी यादव को महागठबंधन का सर्वमान्य सीएम चेहरा घोषित किया जाए, जबकि कांग्रेस इस पर औपचारिक सहमति देने से हिचक रही है। कांग्रेस उपमुख्यमंत्री पद और सीटों की संख्या को लेकर भी अपना दावा मजबूत कर रही है। पहले 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का इरादा अब 50-60 तक सीमित करने की चर्चा भले हो, लेकिन डिप्टी सीएम का पद कांग्रेस के लिए 'लाल रेखा' जैसा बना हुआ है।
गठबंधन की चुनौतियां
महागठबंधन की मूल ताकत विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों को साथ लाने में रही है। परंतु जब सहयोगी दल अपनी-अपनी शर्तों पर अडिग रहते हैं, तो यह ताकत कमज़ोरी में बदल सकती है। तेजस्वी यादव का 'एकला चलो' अंदाज़ और कांग्रेस की पद-प्रतिष्ठा की मांग, दोनों मिलकर समन्वय को कठिन बना रहे हैं।
एनडीए के लिए अवसर
भारतीय राजनीति में विरोधियों की आपसी खटपट का लाभ तीसरा पक्ष उठाता है। बिहार में यह तीसरा पक्ष राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) है। भाजपा और उसके सहयोगी पहले ही संगठनात्मक रूप से मजबूत हैं। यदि राजद-कांग्रेस का गठजोड़ कमजोर पड़ता है, तो एनडीए को बिना अतिरिक्त मेहनत के चुनावी बढ़त मिल सकती है।
रास्ता अभी खुला है
फिर भी तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। खबरें हैं कि दोनों दलों में बातचीत जारी है और कांग्रेस ने अपने रुख में कुछ नरमी दिखाई है। यह सकारात्मक संकेत है, क्योंकि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष का एकजुट रहना न केवल उनकी रणनीति का, बल्कि बिहार की लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का भी महत्वपूर्ण तत्व है।
गठबंधन टूटने और बनने का खेल यहां आम
बिहार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि गठबंधन टूटने और बनने का खेल यहां आम है। महागठबंधन के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। अगर राजद और कांग्रेस आपसी समझ, साझा दृष्टिकोण और सीट बंटवारे में लचीलापन दिखाएं, तो यह अस्थायी तनातनी भी गठबंधन को परिपक्व बना सकती है।
लेकिन अगर अहंकार और आकांक्षाओं ने कड़ा रूप लिया, तो विपक्ष के कमजोर होने का खतरा वास्तविक है, और इसका सीधा फायदा एनडीए को मिलना तय होगा। महागठबंधन को यह याद रखना होगा कि सत्ता तक पहुंचने का रास्ता केवल मतदाताओं की नाराजगी से नहीं, बल्कि अपने आंतरिक संतुलन से भी तय होता है। आज उनकी सबसे बड़ी चुनौती बाहरी विरोधी नहीं, बल्कि अंदर की खटपट है।
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