'बेटा शहीद हुआ,पर बहू पैसे ले गई', लेफ्टिनेंट शुभम के माता-पिता का दर्द, शहीद को मिलने वाले पैसे पर किसका हक?
Flight Lieutenant Shubham Kumar (NOK Policy): देश के लिए शहीद होने वाले वीर जवानों की शहादत के बाद जब परिवारों में पैसों को लेकर कलह शुरू होती है, तो चर्चा सोशल मीडिया पर होने लगती है। ऐसा ही एक मामला बिहार के जहानाबाद से सामने आया है। असम के जोरहाट में 13 जून 2026 को वायुसेना का एक विमान क्रैश हो गया, जिसमें जहानाबाद के होनहार फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार शहीद हो गए। शुभम की शहादत के बाद उनके पैतृक गांव बनवरिया में मातम पसरा हुआ है, लेकिन इस गम के बीच सरकार से मिली सहायता राशि (अनुग्रह राशि) को लेकर एक बड़ा और कड़वा विवाद खड़ा हो गया है।
शहीद के बुजुर्ग पिता अमरेंद्र शर्मा का आरोप है कि शुभम की पत्नी श्रेया राय ने स्थानीय प्रशासन से साठगांठ कर बिहार सरकार की ओर से मिलने वाला ₹21 लाख का चेक गुपचुप तरीके से हड़प लिया और पति के श्राद्धकर्म से पहले ही वह पैसे लेकर अपने मायके (आजमगढ़) चली गई। इस घटना ने एक बार फिर भारतीय सेना के निकटतम परिजन यानी NoK (Next of Kin) नियमों पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। ऐसे में आइए जानते हैं कि शहीद को मिलने वाले पैसे पर असली हक किसका है और NoK कानून क्या कहता है।

आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक प्रशासन का कहना है कि मौजूद सरकारी दस्तावेजों में श्रेया राय को शहीद शुभम कुमार की वैध पत्नी के रूप में दर्ज किया गया है, इसलिए अनुग्रह राशि उन्हें सौंपी गई। दूसरी तरफ शुभम के पिता अमरेंद्र शर्मा का दावा है कि परिवार को कथित कोर्ट मैरिज की कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
अंतिम संस्कार के दिन ही ₹21 लाख का चेक गायब: पिता ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लगाई इंसाफ की गुहार
शहीद शुभम के पिता अमरेंद्र शर्मा ने भावुक होते हुए बताया,
"अगर श्रेया मेरे बेटे की कानूनी पत्नी थी, तो वह हमारी बहू है और पैसे पाने की हकदार भी है। लेकिन पत्नी होने का फर्ज कहां गया? वह बेटे के अंतिम संस्कार में मास्क लगाकर आई थी, उसके चेहरे पर कोई दुख नहीं था। और तो और, पति के श्राद्धकर्म से पहले ही वह चेक समेटकर चली गई। दुख बांटने के बजाय उसने हमसे यह बात छिपाई।"
पिता का आरोप है कि हुलासगंज के अंचलाधिकारी (CO) ने बिना परिवार को सूचना दिए कि सीक्रेट तरीके से ₹21 लाख का चेक श्रेया को सौंप दिया। पिता ने देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से हाथ जोड़कर न्याय की गुहार लगाई है। उन्होंने बताया कि उनका परिवार बेहद गरीब है और तीन की छत (कर्कट) वाले टूटे-फूटे मकान में रहता है। शुभम ने वायुसेना में अफसर बनने के बाद घर बनाने के लिए बैंक से लोन लिया था, जिसका काम अभी भी अधूरा है। घर का इकलौता सहारा चला गया और अब बूढ़े माता-पिता के सामने आर्थिक बर्बादी का संकट खड़ा हो गया है।

क्या कहता है सेना का कानून? क्या है यह 'NOK' नियम? (NOK Policy Explained)
इस पूरे विवाद के बीच यह समझना जरूरी है कि आखिर कानूनन शहीद जवान की संपत्ति और मुआवजे पर किसका हक होता है। भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना में एक तय प्रशासनिक व्यवस्था है जिसे NoK (Next of Kin) कहा जाता है।
- अविवाहित और विवाहित का अंतर: जब कोई युवा सेना में भर्ती या कमीशन प्राप्त करता है, तो वह अविवाहित होता है। उस समय उसके माता-पिता को 'निकटतम परिजन' (NoK) के रूप में दर्ज किया जाता है। लेकिन नियम के मुताबिक, जैसे ही किसी सैन्य अधिकारी या जवान की शादी होती है, रिकॉर्ड में NoK के तौर पर माता-पिता की जगह उसकी पत्नी का नाम दर्ज हो जाता है।
- पेंशन और फंड का नियम: कानून के मुताबिक, शादी के बाद पत्नी ही सर्विस पेंशन और पारिवारिक पेंशन के लिए एकमात्र नामित (Nominate) व्यक्ति बन जाती है। पेंशन के मामले में किसी और को हिस्सेदार बनाने का विकल्प नहीं होता है।
- वसीयत और विभाजन: सेना समूह बीमा कोष (AGIF), भविष्य निधि (PF) और अन्य चल-अचल संपत्तियों के लिए अधिकारी को यह अधिकार होता है कि वह वसीयत (Will) के जरिए पत्नी और माता-पिता के बीच हिस्सेदारी का प्रतिशत (जैसे 50-50% या 60-40%) तय कर दे। लेकिन अगर शादी के बाद रिकॉर्ड अपडेट नहीं हुआ या वसीयत में सिर्फ पत्नी का नाम है, तो पूरा पैसा पत्नी को ही मिलता है। ऐसे में ज्यादातर मामलों में शहीद होने के बाद आर्थिक मदद से लेकर तमाम सैन्य सुविधाएं शहीद जवान की पत्नी को मिलती है।

कैप्टन अंशुमान सिंह का भी आया था ऐसा ही मामला
यह कोई पहला मामला नहीं है। साल 2024 में भी देश ने ऐसा ही एक हाई-प्रोफाइल विवाद देखा था, जब कीर्ति चक्र से सम्मानित शहीद कैप्टन अंशुमान सिंह के माता-पिता (रवि प्रताप सिंह और मंजू देवी) ने अपनी विधवा बहू स्मृति सिंह पर गंभीर आरोप लगाए थे। माता-पिता का दर्द था कि बहू सारा मुआवजा और सम्मान लेकर अलग हो गई, और उन्हें अपने बेटे का कीर्ति चक्र छूने तक का मौका नहीं मिला। उन्होंने सरकार से मांग की थी कि सेना के NoK नियमों में बदलाव किया जाए ताकि बुजुर्ग माता-पिता पूरी तरह बेसहारा न हों।
विशेषज्ञों का मानना है कि कारगिल युद्ध (1999) के समय से ही यह समस्या देखी जा रही है। जब केंद्र और राज्य सरकारें देशभक्ति के सम्मान में भारी अनुग्रह राशि की घोषणा करती हैं, तो ये राशियां सीधे NoK के खाते में जाती हैं। चूंकि यह पैसा सेना के आंतरिक नियमों से बाहर का होता है, इसलिए इसका बंटवारा माता-पिता और पत्नी के बीच समान रूप से करने के लिए नए नीतिगत बदलावों की सख्त जरूरत है।

क्या है शुभम के गुपचुप कोर्ट मैरिज की इनसाइड स्टोरी?
शुभम के परिवार के मुताबिक, शुभम और उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ की रहने वाली श्रेया राय एक-दूसरे को पसंद करते थे। दोनों के परिवार इस रिश्ते के लिए राजी थे। दिसंबर 2025 में शादी की तारीख भी तय हो गई थी, लेकिन इसी बीच शुभम की दादी का देहांत हो गया, जिसके कारण शादी को एक साल के लिए टाल दिया गया था।
पिता अमरेंद्र शर्मा का आरोप है कि इस दौरान श्रेया के परिवार वालों ने शुभम को बहला-फुसलाकर अहमदाबाद में गुपचुप तरीके से कोर्ट मैरिज करने पर मजबूर किया, जिसकी भनक उन्होंने लड़के के माता-पिता को नहीं लगने दी। यही वजह है कि शहादत के बाद कानूनी दस्तावेजों के आधार पर श्रेया पत्नी के रूप में सामने आ गई।
सैनिक स्कूल से वायुसेना के आसमान तक शुभम का सफर
महज 25 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह देने वाले फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार बचपन से ही बेहद मेधावी थे। उनके पिता एक साधारण किसान हैं। शुभम ने छठी कक्षा में ही आंध्र प्रदेश के सैनिक स्कूल में दाखिला लिया था। उन्होंने मैट्रिक और इंटर की परीक्षाओं में 90% से अधिक अंक हासिल किए थे।
साल 2017 में अपने पहले ही प्रयास में शुभम ने एनडीए (NDA) की कठिन परीक्षा पास की। 2018 से 2021 तक पुणे में कड़ी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग हैदराबाद में हुई थी। उनके नाना सरजू शर्मा गर्व से कहते हैं कि उनके बच्चे ने इतनी कम उम्र में जो मुकाम हासिल किया, उसने पूरे इलाके का सिर ऊंचा कर दिया था।
शुभम के छोटे भाई छोटू ने बताया कि 13 जून की सुबह 9 बजे उनकी भैया से वीडियो कॉल पर बात हुई थी। उन्होंने कहा था कि असम में बारिश तेज हो रही है और वे एक मिशन के लिए जल्दबाजी में हैं, फ्री होकर फोन करेंगे। लेकिन सुबह 11 बजे सीधे उनकी शहादत की खबर आई, जिसने पूरे परिवार को उजाड़ दिया।
दादा ने सिस्टम पर उठाए तीखे सवाल
पोते के जाने के गम में डूबे शुभम के दादा ने सरकार की व्यवस्था पर बेहद कड़े और तीखे सवाल दागे हैं। उन्होंने सीधे तौर पर कहा, "मेरे पोते को व्यवस्था की लापरवाही ने मारा है। सरकार 40-40 साल पुराने खटारा विमानों का इस्तेमाल बंद क्यों नहीं करती? हमारे जवानों की जान इतनी सस्ती क्यों है? भले ही सरकार हमारी पेंशन बंद कर दे, लेकिन आसमान में उड़ने वाले हमारे देश के जांबाज बेटों को आधुनिक और नए सुरक्षित विमान मिलने चाहिए।"
शहादत और मुआवजे को लेकर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: सेना में NoK (Next of Kin) नियम क्या होता है?
NoK का मतलब होता है सैनिक का सबसे करीबी कानूनी रिश्तेदार। अविवाहित रहने तक माता-पिता NoK होते हैं, लेकिन शादी होते ही आधिकारिक तौर पर पत्नी NoK बन जाती है। सरकार और सेना की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद और पेंशन मुख्य रूप से NoK को ही दी जाती है।
Q2: क्या शहीद की अनुग्रह राशि (मुआवजा) में माता-पिता का कोई कानूनी हक होता है?
सेना के नियमों के मुताबिक, यदि जवान विवाहित है और उसने अपनी वसीयत या नामांकन में माता-पिता का नाम शामिल नहीं किया है, तो कानूनन पूरा पैसा और पेंशन पत्नी को मिलती है। हालांकि, राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली विशेष अनुग्रह राशि के नियमों में बदलाव की मांग उठ रही है ताकि माता-पिता को भी हिस्सा मिल सके।
Q3: क्या शादी के बाद जवान अपनी वसीयत में माता-पिता को नामांकित कर सकता है?
हां, शादी के बाद भी कोई भी सैन्य अधिकारी या जवान भविष्य निधि (PF), इंश्योरेंस (AGIF) और अपनी अन्य व्यक्तिगत संपत्तियों के लिए अपनी वसीयत में पत्नी और माता-पिता के बीच हिस्सेदारी का प्रतिशत खुद तय कर सकता है, लेकिन पारिवारिक पेंशन अनिवार्य रूप से पत्नी को ही जाती है।















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