Bihar Chunav 2025: दिलीप की चाल, पप्पू की लोकप्रियता, अख्तरुल का नेटवर्क, उदय सिंह की पकड़, सीमांचल का शेर कौन

Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बिगुल बजते ही राज्य का हर इलाका सियासी हलचल से गूंज रहा है, लेकिन सबसे अधिक सुर्खियां खींच रहा है सीमांचल, पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज के चार जिलों वाला यह भूभाग, जहां कुल 24 विधानसभा सीटें हैं और हर चुनाव में नतीजे पूरे राज्य का रुख बदलने की ताक़त रखते हैं।

मुस्लिम और अतिपिछड़ा बहुल जनसंख्या, सीमावर्ती भूगोल और लगातार बदलते दल-बदल के खेल ने इस इलाके को "किंगमेकर ज़ोन" बना दिया है। यही वजह है कि इस बार हर पार्टी यहां अपना "शेर" तलाश रही है।

Bihar Chunav 2025

एनडीए का दांव, मोदी की सौगात और दिलीप जायसवाल की पहचान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूर्णिया दौरा और लगभग चार हजार करोड़ की विकास योजनाएं इस संदेश के साथ आईं कि एनडीए सीमांचल को अनदेखा नहीं करेगा। बिहार बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में डॉ. दिलीप जायसवाल को सामने रखकर जातीय और सांप्रदायिक दोनों समीकरण साधने की चाल चली है। किशनगंज से आने वाले वैश्य नेता जायसवाल का सीमांचली होना और मुस्लिम समाज में उनकी स्वीकार्यता, भाजपा को नई सीटें दिलाने का आधार बन सकता है।

जनसुराज का नया मोर्चा
पूर्व बीजेपी सांसद और अब प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय सिंह (पप्पू सिंह) को सीमांचल की सियासत में ताज़ा लेकिन अनुभवी चेहरा कहा जा सकता है। राजपूत समाज में पकड़, कांग्रेस और बीजेपी दोनों में पारी खेल चुके अनुभव और स्थानीय जमीनी नेटवर्क से उदय सिंह सीमांचल में त्रिकोणीय मुकाबले को और दिलचस्प बना सकते हैं।

ओवैसी फैक्टर का अहम किरदार
2020 में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने सीमांचल में जिस तरह पाँच सीटें जीतकर हलचल मचाई थी, उसका केंद्र रहे अख्तरुल ईमान फिर सुर्खियों में हैं। उनका संगठन और मुस्लिम मतदाताओं में गहरी पैठ इस बार भी महागठबंधन और एनडीए दोनों के लिए चुनौती है।

कांग्रेस की नई उम्मीदें-पप्पू यादव और तारिक अनवर
निर्दलीय सांसद बने पप्पू यादव ने अपनी जन अधिकार पार्टी का कांग्रेस में विलय कर सीमांचल में कांग्रेस की नई सांस फूंकी है। यादव-मुस्लिम समीकरण पर उनकी पकड़ और "जुझारू नेता" की छवि, कांग्रेस के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकती है।

इसी कड़ी में तारिक अनवर का नाम अलग वजन रखता है। दशकों का अनुभव, मुस्लिम और ओबीसी समुदाय में प्रभाव और कटिहार से लेकर सीमांचल के हर जिले में सक्रियता, उन्हें कांग्रेस का सबसे भरोसेमंद चेहरा बनाती है।

आरजेडी की ढाल, बीमा भारती और सरफराज आलम
जेडीयू से आरजेडी में आईं बीमा भारती ने भले ही हाल के चुनावों में हार का स्वाद चखा हो, लेकिन पूर्णिया-कोसी बेल्ट में उनकी पकड़ और चार बार की विधायक रह चुकी पहचान से लालू यादव की पार्टी उन्हें आसानी से नज़रअंदाज नहीं कर सकती।

वहीं, तस्लीमुद्दीन की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए सरफराज आलम अब भी सक्रिय हैं। लगातार हार के बावजूद अररिया के जोकीहाट से उनका जनाधार और पारिवारिक पहचान आरजेडी के लिए विकल्प बनाए रखती है।

बदलता समीकरण, कठिन मुकाबला
2020 में सीमांचल की 24 सीटों में बीजेपी आठ पर विजयी रही थी। कांग्रेस और एआईएमआईएम को पांच-पांच, जेडीयू को दो, आरजेडी और वामदल को एक-एक सीट मिली थी। लेकिन तबकी तस्वीर अब बदल रही है। ओवैसी फैक्टर स्थायी नहीं, कांग्रेस में पप्पू की एंट्री नई चुनौती, और बीजेपी की अगुवाई में एनडीए का विकास एजेंडा-सब कुछ 2025 को अप्रत्याशित बना रहा है।

बिहार की सियासत का धड़कता दिल
सीमांचल केवल चार जिलों का भूगोल नहीं, बिहार की सियासत का धड़कता दिल है। यहां का हर वोट धार्मिक, जातीय और विकास के तराजू पर तौला जाता है। दिलीप जायसवाल, उदय सिंह, अख्तरुल ईमान, पप्पू यादव, तारिक अनवर, बीमा भारती और सरफराज आलम जैसे सूरमा इस चुनावी रण में अपनी-अपनी चाल चलने को तैयार हैं।

बड़ा सवाल यही है कि 2025 में सीमांचल का शेर कौन बनेगा? क्या यह शेर भाजपा का होगा, महागठबंधन का, जनसुराज का या फिर कोई नया चेहरा उभरेगा? आने वाले महीनों में यही रहस्य बिहार की राजनीति को सबसे रोमांचक मोड़ पर ले जाएगा।

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