Bihar Chunav 2025: चिराग पासवान को CM बनाना चाहते हैं पशुपति, चाचा का ‘भतीजा प्रेम’ के क्या हैं सियासी मायने?
Bihar Chunav 2025: बिहार में विधानसभा चुनाव के दिन नज़दीक आते ही राजनीतिक तस्वीरें बदलती हुई नज़र आ रही है। दल बदल और प्रेशर पॉल्टिक्स भी शुरू हो चुका है। इसी क्रम में राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) के अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस के बयान ने भी नई बहस छेड़ दी है।
अपने भतीजे चिराग पासवान से लंबे समय तक दूरी बनाए रखने वाले पशुपति पारस ने अब उन्हीं की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए हैं। एनडीए से विदाई के बाद पारस ने महागठबंधन में शामिल होने की उम्मीद पाल रखी थी। लालू प्रसाद से मुलाकात के बावजूद पारस को महागठबंधन में कोई खास राजनीतिक "भाव" नहीं मिला।

सीट बंटवारे पर नहीं बैठ रहा समीकरण
विधानसभा चुनाव सिर पर है और सीट बंटवारे के समीकरण में उनकी पार्टी अभी फिट नहीं बैठ रही। इस बीच पारस ने अपने बेटे यशराज पासवान को चुनावी मैदान में उतारने की घोषणा कर दी है। उनका इरादा है कि यशराज को अलौली विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा जाए, जहां से पारस खुद सात बार जीत चुके हैं।
चिराग पासवान की चाचा ने की तारीफ
वर्तमान में यह सीट राजद के कब्जे में है और राजद इसे छोड़ने के मूड में नहीं है। दूसरी ओर एनडीए में अलौली सीट पर चिराग पासवान का दावा मजबूत माना जा रहा है। ऐसे में पारस ने भतीजे चिराग की योग्यता और मेहनत की तारीफ करते हुए कहा, "अगर चिराग पासवान मुख्यमंत्री बनते हैं तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होगी। वे मेरा परिवार हैं, मेरा भतीजा भी।"
पारस के बयान के क्या है सियासी मायने
इस बयान से साफ है कि पारस भतीजे के पक्ष में सार्वजनिक समर्थन दे रहे हैं, जिससे महागठबंधन पर अप्रत्यक्ष दबाव भी बन रहा है। पारस का यह रुख महागठबंधन और एनडीए दोनों के लिए सन्देश लेकर आया है। राजद के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि पारस के समर्थन से चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को अलौली में चुनौती मिल सकती है। वहीं भाजपा इसे पारस की "प्रेशर पॉलिटिक्स" करार दे रही है।
विश्लेषकों के अनुसार, पारस का यह हृदय परिवर्तन केवल व्यक्तिगत रिश्तों की गर्माहट का परिणाम नहीं है, बल्कि चुनावी रणनीति और सीट-बंटवारे के दबाव का नतीजा भी माना जा सकता है। बिहार में सत्ता समीकरण लगातार बदल रहे हैं, और पारस का नया राग यह संकेत देता है कि चुनावी खेमों में नज़दीकियां और दूरियां बेहद तेज़ी से बदल सकती हैं।












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