Opposition party meeting: विपक्ष के नेताओं को जुटाकर सबसे ज्यादा फायदे में नीतीश कुमार?
बिहार की राजधानी पटना में बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी पर इस समय पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं। यहां 23 जून यानी शुक्रवार को देश भर के 18 राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं का जमावड़ा लग रहा है। यहां विपक्षी दल आपस में जो कुछ भी तय करेंगे, उससे 2024 के लोकसभा चुनाव का समीकरण तैयार होने की संभावना है।
विपक्षी दलों की इस महाबैठक के सूत्रधार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं और पटना में विपक्षी नेताओं को बुलाने की पहल उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राय से की है। देश के अगर कुछ प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं को छोड़ दें, तो नीतीश अपनी कोशिशों के पहले राउंड में पूरी तरह से सफल नजर आ रहे हैं।

सीएम केजरीवाल ऑर्डिनेंस पर अपनी बात रखेंगे- आम आदमी पार्टी नेता
बिहार में आम आदमी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुशील कुमार ने वन इंडिया से कहा है कि उनकी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल विपक्षी दलों के नेताओं के समक्ष केंद्र सरकार के ऑर्डिनेंस पर अपनी बात रखेंगे। इससे पहले केजरीवाल पटना में होने वाली बैठक से पहले इस मुद्दे पर गैर-बीजेपी दलों के नेताओं को एक चिट्ठी भी लिख चुके हैं।
केजरीवाल ने एजेंडे में प्रमुखता देने की मांग की है
उन्होंने भाजपा विरोधी दलों से कहा है कि इस मसले को समग्र दृष्टिकोण से देखें और पटना में होने वाली बैठक के एजेंडे में प्रमुखता दें। आम आदमी पार्टी के नेता इस मामले को लेकर पहले भी तमाम गैर-भाजपा दलों के नेताओं से मुलाकात भी कर चुके हैं।
'पार्टियां किसी भी मुद्दे को उठा सकती हैं'
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मसले पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक करीबी ने कहा है, 'बैठक के लिए अपनी सहमति देने वाले 18 दलों में से एक या अधिक पार्टियां किसी भी मुद्दे को उठा सकती हैं, लेकिन इससे बीजेपी के खिलाफ एकजुटता के लक्ष्य को मजबूत करने की कोशिशों में खलल पड़ने की संभावना नहीं है।'
विपक्षी एकता बनाने के मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता-नीतीश के सहयोगी
लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने संकेतों में जदयू सुप्रीमो के अंतिम लक्ष्य को भी स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, 'एक सामान्य मुद्दा जिसने पटना की बैठक के लिए आधार तैयार किया है, वह ये चिंता है कि केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार का बने रहना राष्ट्रीय हित में नहीं है। इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर हम बीजेपी से मुकाबला करने के लिए विपक्षी एकता बनाने के मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे। बाकि, राज्यों से संबंधित मुद्दों को मुख्य एजेंडे से अलग भी सौहार्दपूर्ण ढंग से हल किया जा सकता है।'
18 दलों के नेताओं का पहुंचना ही नीतीश की बड़ी कामयाबी
नीतीश कुमार भले ही इस बैठक के लिए नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव, जगनमोहन रेड्डी,मायावती, कुमारस्वामी, चंद्रबाबू नायडू या सुखबीर बादल जैसे नेताओं को नहीं बुला पाए हों, लेकिन उनके गेस्ट लिस्ट में मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल,शरद पवार और अखिलेश यादव जैसे विपक्षी दलों नेताओं का इकट्ठे होना ही राजनीतिक रूप से बहुत बड़ी बात है।
'जातीय जनगनणना' को भी राष्ट्रीय एजेंडा बनाने की तैयारी-सूत्र
सूत्रों की मानें तो इस बैठक में नीतीश कुमार और लालू यादव की पहल पर पूरे देश में 'जातीय जनगनणना' करवाने का भी एक प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। बता दें कि जबसे नीतीश कुमार ने इस बार एनडीए का साथ छोड़ा है, जातीय जनगणना उनकी सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक एजेंडा है।
नीतीश को विपक्ष का नेता बनते देख जदयू खुश है
नीतीश के कैबिनेट सहयोगी ने कहा है कि 'यदि सब साथ आ गए तो बीजेपी की सरकार की वापसी लगभग असंभव है।' इस विपक्षी महाबैठक का अंतिम अंजाम चाहे जो भी हो, लेकिन जदयू कैंप में खुशी अभी से महसूस की जा सकती है।
सबसे ज्यादा फायदे में नीतीश कुमार
क्योंकि, तथ्य ये है कि बिहार में अपने सिर्फ 44 विधायको के साथ सरकार चला रहे नीतीश कुमार बिखरे हुए विपक्ष को काफी हद तक एक मंच पर लाने में सफल हो गए हैं; और इस तरह से अपनी खुद की कमोजर सियासी धरातल के बावजदू वो विपक्षी एकता का सर्वमान्य चेहरा बनकर उभरे हैं। यही उनकी अपनी निजी राजनीति के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है।












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