OI Ground Report: बिहार में भ्रष्टाचार को बढ़ावा! सिस्टम ही कर्मियों को मजबूर करे, तो सेवा घूस में बदल जाती है
OI Ground Report: बिहार में भ्रष्टाचार अब कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं रही, बल्कि यह सिस्टम का हिस्सा बन गया है। लेकिन क्या आपने कभी इसके असली कारणों को ज़मीनी स्तर पर जाकर देखा है? वन इंडिया हिंदी की टीम जब बेगूसराय के बरौनी प्रखंड अस्पताल पहुंची, तो भ्रष्टाचार की जड़ें ऊपर से नहीं, नीचे से दिखाई देने लगीं-वहीं से, जहां सरकार की योजनाओं को अमल में लाया जाना चाहिए।
'स्वास्थ्य सेवा' कागज़ पर पूरी, ज़मीन पर अधूरी: बरौनी अस्पताल में डॉक्टर, लैब टेक्नीशियन और मरीज़-सब कुछ मौजूद थे। अस्पताल की स्थिति दिखने में संतोषजनक थी, लेकिन जब हमने नज़र डाली उन कर्मियों की ज़िंदगी पर जो इसे चला रहे हैं, तो हालत परेशान करने वाली मिली।

आशा कार्यकर्ता का दर्द: एक आशा कार्यकर्ता ने कहा कि हमसे 4 अलग-अलग कार्य लिए जाते हैं, टीकाकरण, जन्म रजिस्ट्रेशन, गर्भवती महिलाओं की निगरानी और स्वास्थ्य जागरूकता जैसे काम हम लोग करते हैं, इसके एवज़ पूरे महीने की कमाई सिर्फ 1 हज़ार रुपये मिलते हैं, अगर एक भी काम छूट जाए तो पैसे काट लिए जाते हैं।"
आशा कार्यकर्ताओं ने कहा कि बरौनी प्रखंड अस्पताल में उन लोगों के लिए रहने की कोई सुविधा नहीं है। शौचालय की व्यवस्था भी दुरुस्त नहीं है, वहीं कोई यात्रा भत्ता भी नहीं मिलता है। पैसों की तंगी से जूझते हुए जब आशा कार्यकर्ताओं की आशा ही टूट जाए तो भ्रष्टाचार का जन्म लेना संभावित है। ये कर्मी कभी-कभी मरीज़ों से पैसों की डिमांड कर लेते हैं, जो कि भ्रष्टाचार की शुरुआत बन जाती है।
गार्ड की आपबीती: प्रखंड अस्पताल में तैनात गॉर्ड ने बताया कि "रात की शिफ्ट में 12 घंटे काम करना पड़ता है, लेकिन सरकार सिर्फ 8 घंटे का वेतन तय करती है। ओवरटाइम का पैसा भी नहीं मिलता। ऊपर से ₹13,000 सैलरी में से ₹5000 'कट' के तौर पर वापस देना पड़ता है।"
बरौनी प्रखंड अस्पताल के सुरक्षा गॉर्ड ने बताया कि नियुक्ति की कोई सुरक्षा नहीं है। शिकायत और सुनवाई के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। डर है कि अगर सैलरी आने पर रुपये नहीं दिए तो नौकरी से भी निकाला जा सकता हूं। अब सवाल यही है कि जब एक कर्मी खुद आर्थिक तनाव में होगा, तो वह मरीज़ से सेवा के बदले पैसा क्यों नहीं मांगेगा?
सिस्टम में कहां है खामी?
कम वेतन, ज़्यादा काम: कर्मचारी 12 घंटे काम करते हैं, लेकिन भुगतान 8 घंटे का भी पूरा नहीं होता
कट मनी कल्चर: सरकारी भर्ती में "बिचौलियों" को पैसा देना पड़ता है
सुविधाओं का अभाव: ज़मीनी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए न आवास, न शौचालय
मानव गरिमा की कमी: व्यवस्था खुद उन्हें मजबूर करती है कि वे नियम तोड़ें
समाधान की ज़रूरत: सभी आशा वर्कर्स और चतुर्थवर्गीय कर्मियों को सम्मानजनक वेतन, ओवरटाइम के पारदर्शी भुगतान की व्यवस्था, अस्पतालों में कार्यरत कर्मियों के लिए आवास और मूलभूत सुविधाएं, भ्रष्टाचार शिकायत तंत्र को मज़बूत किया जाए, आम जनता को जागरूक किया जाए कि रिश्वत देना/लेना दोनों ही जुर्म हैं। यह पहल की जाए तो व्यवस्था में बदलाव देखने को मिल सकता है।
ग्रामीणों के सवाल? इस पूरे मामले में लोगों ने सवाल उठाए कि जब व्यवस्था ही कर्मियों को मजबूर करती है, तो क्या उन्हें घूसखोर कहना सही होगा? भ्रष्टाचार वहीं से शुरू होता है जहां सरकार अपनी जिम्मेदारी छोड़ देती है? अगर सरकार इन्हें सही सम्मान दे और भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस लागू करे तो बिहार के हालात सुधर सकते हैं।
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