Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

‘13 हज़ार की नौकरी, 5 हज़ार कट’, स्वास्थ्य केंद्र में मरीज़ को मिल रहा इलाज, लेकिन काम करने वाले स्वस्थ नहीं!

OI Exclusive, Health Service In Bihar: आम जनता तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के लिए सरकार करोड़ों रपये खर्च करने का दावा करती है। स्वास्थ्य कर्मियों की बहाली निकाली जा रही है, लेकिन जब वन इंडिया हिंदी की टीम, हकीकत जानने ज़मीन पर पहुंची तो सामने आई सच्चाई हैरान करने वाली थी।

हम बात कर रहे हैं बिहार के बेगूसराय ज़िले के बरौनी प्रखंड की, जहां सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में सुविधा तो काफी है, लेकिन वहां काम कर रहे लोग मजबूरी में नौकरी कर रहे हैं। वन इंडिया हिंदी के वरिष्ठ संवाददाता इंज़माम वहीदी स्वास्थ केंद्र में काम कर रहे लोग और मरीज़ के तीमारदारों से बात की तो सरकारी दावे खोखले साबित हुए।

OI Exclusive

स्वस्थ अस्पताल, व्यवस्था बदहाल
हेल्थ सेंटर में प्राथमिक तौर पर डॉक्टर, टेक्नीशियन और जांच के उपकरण मौजूद हैं। मरीजों का इलाज भी हो रहा है। लेकिन अस्पताल की व्यवस्था अधूरी और गैरजिम्मेदाराना प्रतीत हुई। वहां ज़्यादातर प्रसव के लिए ही महिला जाती हैं, या फिर एक्सीडेंटल केस आता है। अस्पताल में मरीज़ों का इलाज तो हो रहा था। लेकिन तीमारदारों के लिए बुनियादी व्यवस्था, जैसे सोने की जगह और शौचालय पर्याप्त नहीं था।

आशा कार्यकर्ताओं में निराशा
एक कमरे में 3 बेड थे, जिस पर 10 लोग जैसे तैसे लेटे-बैठे थे, जिसमें 3 मरीज़ भी शामिल थे। स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ कही जाने वाली आशा कार्यकर्ताओं की स्थिति भी बेहद चिंताजनक मिली। एक स्थानीय आशा कार्यकर्ता ने बताया कि उन्हें महीने भर काम करने के बावजूद सिर्फ 1000 रुपये ही मिलते हैं। यह राशि न तो मेहनत के अनुरूप है और न ही सरकारी मापदंडों के अनुसार।

शौचालय और विश्राम की कोई व्यवस्था नहीं
अस्पताल में न तो आशा कार्यकर्ताओं के लिए अलग विश्राम कक्ष है, न ही तीमारदारों के लिए कोई छायादार इंतज़ाम। कई मरीजों के परिवार वालों को ज़मीन पर ही सोने के लिए मजबूर होना पड़ता है। शौचालय की हालत भी बेहद खराब है, जिसे देखकर किसी भी आम नागरिक को घिन आ जाए।

गार्ड को सैलरी से लौटाने पड़ते हैं पैसे
सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब अस्पताल में तैनात एक गार्ड ने बताया कि उन्हें 13 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है, लेकिन उसमें से 5 हजार रुपये उन्हें हर महीने उस व्यक्ति को लौटाने पड़ते हैं, जिसने उन्हें नौकरी दिलवाई। उसने कहा अगर ऐसा नहीं करेंगे तो नौकरी से निकाल दिए जाएंगे। इसलिए नहीं चाहते हुए भी नौकरी कर रहे हैं। रात की ड्यूटी 12 घंटे की होती है (रात के 8 बजे से सुबह के 8 बजे तक) नहीं चाहते हुए भी नौकरी कर रहे हैं, क्योंकि परिवार का गुज़ारा करना है।

प्रशासन की चुप्पी, सवालों के घेरे में सरकारी सिस्टम
बरौनी का यह सरकारी अस्पताल राज्य सरकार के स्वास्थ्य दावों (मरीज़ों के इलाज) के मापदंड को तो पूरा करता है, लेकिन व्यवस्था पर सवालिया निशान ज़रूर है, क्योंकि मरीज़ों और उनके तीमारदारों ने कैमरे पर पैसे लेने की बात को तो नकार दिया लेकिन कैमरे के पीछे सरकारी संसाधनों का गलत प्रबंधन और भ्रष्टाचार से इनकार भी नहीं किया।

क्या कहता है स्थानीय प्रशासन?
इस पूरे मामले में अभी तक स्थानीय स्वास्थ्य विभाग या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। वन इंडिया हिंदी ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगने की कोशिश की लेकिन वह गोलमटोल देकर कन्नी काट गए।

क्या यही है 'सबके लिए स्वास्थ्य' का वादा?
बिहार के बरौनी स्वास्थ्य केंद्र की यह हालत केवल एक जिले की कहानी नहीं है। यह राज्यव्यापी स्वास्थ्य व्यवस्था की गहराई में फैली समस्याओं की एक झलक मात्र है। सवाल उठता है कि क्या इसी तरह ज़मीनी सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर सिर्फ़ काग़ज़ों पर विकास दिखाया जाता रहेगा? या फिर बदहाल व्यवस्था में सुधार होगा।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+