मोदी-नीतीश बने भरोसे का पर्यायः सधे हुए सामाजिक समीकरण और दृढ़ नेतृत्व ने बदला बिहार का राजनीतिक परिदृश्य

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणमा ने इस बार राज्य की राजनीति एक नई दिशा में बढ़ी है - विश्वास, स्थिरता और ज़मीन से जुड़े नेतृत्व की दिशा में। जहां आम तौर पर एंटी-इंकम्बेंसी की चर्चाएं हावी रहती हैं, वहीं इस चुनाव में बिहार ने एक शांत लेकिन प्रभावी प्रो-इंकम्बेंसी लहर दर्ज की है। यह लहर न किसी आक्रामक प्रचार का परिणाम थी और न ही किसी भावनात्मक उभार का; यह मतदाताओं के मन में धीरे-धीरे बनी और मतदान दिवस पर पूरी दृढ़ता से प्रकट हुई।

हमने बीते कई महीनों में लगभग हर विधानसभा का दौरा किया। स्थानीय लोगों से मिलने बिहार में प्रो-इंकम्बेंसी सहज नहीं होती। जातीय समीकरण, राजनीतिक अस्थिरता और ऐतिहासिक सत्ता-विरोधी रुझानों ने यहां सत्ता वापसी को हमेशा चुनौतीपूर्ण बनाया है। लेकिन जब तीन कारक एक साथ मौजूद हों - सत्तापक्ष की सशक्त और सुविचारित सोशल इंजीनियरिंग, नेतृत्व की विश्वसनीयता, विपक्ष की कमजोर एवं बिखरी रणनीति, तो परिस्थितिजन्य प्रो-इंकम्बेंसी पूरे बल के साथ उभरती है।

Dr Dhananjay Giri

इस बार ये तीनों तत्व स्पष्ट रूप से सामने दिखाई दिए। एनडीए : विशेषकर जदयू की सोशल इंजीनियरिंग न केवल संगठित रही, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के साथ सीधा जुड़ाव कायम करने में सफल भी हुई। मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार की शांत, संतुलित और भरोसेमंद छवि ने मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि स्थिर नेतृत्व ही विकास को गति दे सकता है। वहीं, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का व्यापक जनाधार और उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता ने परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। जिस प्रकार से केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह लगातार पार्टी नेताओं के हर फीडबैक पर गहनता से विचार करके आगे की रणनीति बनाते रहे हैं, वह भी प्रेरक रहा है।

बिहार विधानसभा चुनाव के इस बार के मतदान आंकड़े एक महत्वपूर्ण सामाजिक संकेत देते हैं। चुनाव आयोग के अनुसार दोनों चरणों में कुल मतदान 66.91 फीसदी रहा, लेकिन सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से लगभग 10 फीसदी अधिक दर्ज किया गया। जहाँ पुरुषों ने 62.8 फीसदी मतदान किया, वहीं महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6 फीसदी तक पहुँच गया। यह केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक और सामाजिक संरचना में आए बड़े बदलाव का प्रमाण है।

बिहार की राजनीति में महिलाओं की यह बढ़ी हुई भागीदारी कोई अचानक हुई घटना नहीं है। यह पिछले डेढ़ दशक में महिलाओं के जीवन को सीधे प्रभावित करने वाली नीतियों और योजनाओं का परिणाम है। विशेष रूप से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उन पहलियों का, जिन्होंने महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर अधिक सशक्त बनाया।

चुनाव से पूर्व राज्य सरकार ने जीविका दीदी योजना के तहत 1.30 करोड़ महिलाओं को दस-दस हजार रुपए की सहायता दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 सितंबर को इस योजना की शुरुआत की और बाद में 3 अक्टूबर को 25 लाख अतिरिक्त महिलाओं को भी लाभ प्रदान किया गया। यह आर्थिक सहयोग केवल सहायता नहीं था, बल्कि ग्रामीण परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिरता में बड़ा योगदान बना।

नीतीश कुमार के शासन में लागू शराबबंदी ने भी महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को मजबूत किया। शराबबंदी के फैसले ने लाखों परिवारों में आर्थिक बचत, घरेलू शांति और सामाजिक सुरक्षा की भावना को बढ़ाया। यह कदम महिलाओं की आकांक्षाओं के अनुकूल रहा और उन्होंने इसे अपनी आवाज़ को महत्व देने वाली नीति के रूप में देखा।

इसके अलावा 2006 में शुरू की गई मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना ने बिहार की बेटियों के लिए शिक्षा के रास्ते खोले। साइकिल और स्कूल पोशाक उपलब्ध कराने से उन लड़कियों को नई ताकत मिली जो दूरी के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर होती थीं। इस योजना ने बिहार में लड़कियों की शिक्षा को नई दिशा दी और महिलाओं के सशक्तिकरण की मजबूत नींव रखी।

आज जब मतदान में महिलाओं की अभूतपूर्व सहभागिता देखी जाती है, तो यह स्पष्ट है कि वे केवल मतदाता नहीं, बल्कि परिवर्तन की निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। उनकी बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और मतदान में सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि बिहार की राजनीति अब उन नीतियों की सराहना करती है जो समाज के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ-महिलाओं-के सशक्तिकरण पर केंद्रित हों।

दूसरी ओर, महागठबंधन आंतरिक मतभेदों, अस्पष्ट नेतृत्व और असंगत रणनीति के कारण खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने में असफल रहा। जनता ने महज़ नारेबाज़ी पर भरोसा नहीं किया; उसने उसी पर विश्वास जताया जो शासन, विकास और स्थिरता का भरोसेमंद आधार बना रहा।

उच्च मतदान प्रतिशत भी इस प्रो-इंकम्बेंसी भावना को पुष्ट करता है। जहां सामान्यतः अधिक मतदान को सत्ता-विरोधी माना जाता है, वहीं बिहार में बार-बार यह प्रवृत्ति देखी गई है कि बढ़ा हुआ टर्नआउट अक्सर सत्तापक्ष के लिए फायदेमंद साबित होता है। इस बार भी स्थिरता चाहता वर्ग बड़ी संख्या में बूथों पर पहुंचा।

मतदाताओं ने शोरगुल, आरोप-प्रत्यारोप और खोखले वादों के इतर जाकर वोट दिया। उन्होंने उस नेतृत्व को चुना, जो कठिन समय में भी प्रशासन, कानून-व्यवस्था और विकास को प्राथमिकता देता रहा। यह चुनाव परिणम केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक परिपक्वता का संकेत है। अब मतदाता अस्थिर विकल्पों के बजाय विश्वसनीय नेतृत्व और निरंतरता को प्राथमिकता दे रहे हैं।

बिहार ने संदेश साफ दिया है कि विश्वास ही जनादेश की असली नींव है।इस चुनाव में नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी उस विश्वास के सबसे दृढ़ प्रतीक बनकर उभरे हैं।

लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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