Bihar Chunav 2025: सात लाख वोटर कटे, 7 बड़े सवाल, क्या यह तकनीकी गड़बड़ी है या सुनियोजित चुनावी चाल?
Bihar Chunav 2025: बिहार में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) के दौरान केवल चार दिन में सात लाख मतदाताओं के नाम सूची से "गायब" हो गए। 22 जुलाई को मृत मतदाताओं की संख्या 15 लाख थी, जो 26 जुलाई को बढ़कर 22 लाख हो गई। भाकपा(माले) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का आरोप है कि यह मतदाताओं के अधिकार छीनने की सुनियोजित कोशिश है। यह आंकड़े कई चुभते सवाल खड़े करते हैं।
चार दिन में सात लाख मतदाता! यह कोई जनगणना का आंकड़ा नहीं, बल्कि बिहार में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से "गायब" हुए लोगों की संख्या है। सवाल यह है कि क्या यह किसी महामारी, प्राकृतिक आपदा या दुर्भाग्यपूर्ण हादसे का परिणाम था? नहीं। यह आंकड़े चुनाव आयोग की आधिकारिक सूची से निकले हैं और यही सबसे बड़ा खतरे का संकेत है।

मतदाता सूची केवल नामों का संग्रह नहीं होती, यह लोकतंत्र का रजिस्टर है। इसमें से सात लाख नाम चार दिन में हट जाना केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं हो सकता। यह या तो घोर लापरवाही है, या फिर सुनियोजित साजिश। भाकपा(माले) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का आरोप है कि SIR प्रक्रिया मतदाताओं के अधिकार छीनने का जरिया बन रही है। और अगर यह सच है, तो यह किसी भी सरकार या संस्था के लिए सबसे बड़ा कलंक होगा।
चुनाव आयोग का कर्तव्य निष्पक्ष और पारदर्शी मतदाता सूची बनाना है। लेकिन जब आंकड़ों में इतनी बड़ी छलांग दिखती है, 15 लाख से 22 लाख मृत मतदाता तो यह भरोसा टूटने लगता है। इन सात लाख नामों में कितने लोग ऐसे होंगे जो जीवित हैं, पर अगले चुनाव में मतदान का अधिकार खो देंगे? कितने गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और वंचित तबके के लोग इस "सुधार" की आड़ में सूची से बाहर कर दिए जाएंगे?
लोकतंत्र का असली संकट तब शुरू होता है, जब नागरिक यह मानने लगते हैं कि उनका वोट गिनने वालों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सात लाख नामों का चार दिन में कटना इसी भरोसे पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह इस "सात लाख गायब" मामले पर तुरंत स्वतंत्र जांच करवाए, हर नाम की पुनःसत्यापन करे और पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक निगरानी में लाए।
क्योंकि अगर मतदाता सूची ही संदिग्ध हो, तो आने वाला चुनाव केवल सत्ता बदलने का खेल होगा, जनता की भागीदारी का नहीं। लोकतंत्र की असली ताकत उसकी संख्या में नहीं, बल्कि उसकी सटीकता में है। और अगर सात लाख आवाज़ें बिना वजह खामोश कर दी गईं, तो यह केवल चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक हत्या है।
1. क्या चार दिन में सात लाख लोग वाकई मर सकते हैं?
इतनी बड़ी संख्या में मौतें अगर वास्तविक होतीं, तो यह किसी महामारी या बड़ी आपदा से भी ज्यादा भयावह होतीं। लेकिन बिहार में इन दिनों न तो ऐसी कोई आपदा दर्ज हुई और न ही सरकारी स्वास्थ्य रिपोर्ट में इसका जिक्र है। तो फिर यह आंकड़ा कहां से आया?
2. किस आधार पर ये नाम हटाए गए?
क्या चुनाव आयोग के पास इन सभी सात लाख लोगों के मृत्यु प्रमाणपत्र हैं? या फिर यह हटाना "डेटा क्लीनिंग" की आड़ में किया गया? पारदर्शिता के बिना यह प्रक्रिया संदेहास्पद बन जाती है।
3. क्या गरीब और वंचित तबके ज्यादा प्रभावित हुए?
इतिहास गवाह है कि मतदाता सूची से कटने वाले नाम अक्सर प्रवासी मजदूरों, अल्पसंख्यकों और दलित-ओबीसी समुदायों के होते हैं। क्या इस बार भी यही पैटर्न दोहराया गया?
4. तकनीकी गड़बड़ी या सुनियोजित रणनीति?
आधार लिंकिंग, डुप्लीकेट एंट्री और मृतक हटाने के नाम पर डेटा सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल होता है। लेकिन अगर एल्गोरिद्म या ऑपरेटर किसी विशेष वर्ग के नाम टारगेट करें, तो यह तकनीकी गलती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक धोखाधड़ी है।
5. सुप्रीम कोर्ट में "सामान्य" जवाब क्यों?
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर विस्तृत नहीं, बल्कि साधारण जवाब दिया। क्या यह पारदर्शिता से बचने की कोशिश है?
6. क्या 2025 चुनाव में वोटर टर्नआउट पर असर पड़ेगा?
अगर सात लाख लोग-और संभवतः उससे ज्यादा-सूची से बाहर कर दिए गए, तो यह न सिर्फ टर्नआउट घटाएगा, बल्कि कई सीटों पर नतीजे पलट सकता है।
7. क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?
अगर जांच में गड़बड़ी साबित होती है, तो क्या अधिकारियों और डेटा ऑपरेटरों पर कार्रवाई होगी, या यह मामला चुनाव खत्म होने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
सात लाख नामों का अचानक कटना केवल आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल है। जब मतदाता सूची ही संदिग्ध हो, तो चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, उसकी वैधता पर हमेशा एक धुंधलका छाया रहेगा।
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