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Russian Oil: 'क्या वाशिंगटन तय करेगा भारत की ऊर्जा नीति', मोदी सरकार पर भड़के मनोज झा

Manoj Kumar Jha on Russian Oil: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिनों के लिए रूसी तेल खरीदने की 'अस्थायी छूट' देने के फैसले पर देश में सियासत गर्मा गई है। राजद (RJD) नेता मनोज कुमार झा ने इस पर कड़ा एतराज जताते हुए केंद्र सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। झा का कहना है कि यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के आत्म-सम्मान की बात है।

उन्होंने अमेरिका की 'अपमानजनक भाषा' पर तंज कसते हुए पूछा कि आखिर हमारे विदेश मंत्रालय और पीएम मोदी इस दादागिरी पर खामोश क्यों हैं? मनोज झा के मुताबिक, भारत को पहले ही दिन अमेरिका को अपनी हद में रहने की नसीहत दे देनी चाहिए थी।

Manoj Kumar Jha on Russian Oil

अमेरिका की 'शर्तों' पर मनोज झा का कड़ा प्रहार

मनोज झा ने साफ कहा कि अमेरिका जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहा है, वह किसी संप्रभु राष्ट्र के लिए अपमानजनक है। 30 दिनों की 'मोहलत' देना ऐसा लगता है जैसे कोई मालिक अपने अधीन को आदेश दे रहा हो। झा का तर्क है कि भारत एक आजाद मुल्क है और हमें किससे तेल खरीदना है और किससे नहीं, यह तय करने का हक सिर्फ हमारा है। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को भारत की विदेश नीति की कमजोरी बताया है।

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सरकार की चुप्पी पर उठाए बड़े सवाल

राजद नेता ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी, विदेश मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने सवाल किया कि जब अमेरिका भारत के हितों को चोट पहुँचाने वाली भाषा बोल रहा है, तो सरकार का 'सीना' कहाँ गया? झा के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को विश्वगुरु बताने वाली सरकार आज वाशिंगटन के एक छोटे से आदेश पर मूकदर्शक बनी हुई है, जो देश की साख के लिए ठीक नहीं है।

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"पहली बार में ही टोकना जरूरी था"

मनोज झा का मानना है कि रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत को शुरुआत से ही कड़ा रुख अपनाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि जब पहली बार अमेरिका ने हमें रोकने की कोशिश की थी, तभी उसे 'माइंड योर ओन बिजनेस' (अपने काम से काम रखें) कह देना चाहिए था। अगर हम शुरू में ही दब गए, तो भविष्य में भी अमेरिका इसी तरह हमारी ऊर्जा जरूरतों और व्यापारिक फैसलों में दखलअंदाजी करता रहेगा।

राजनीति नहीं, राष्ट्रीय गरिमा का है मामला

झा ने स्पष्ट किया कि उनकी आलोचना राजनीति से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की गरिमा से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि तेल की खरीद-बिक्री दो देशों का आपसी मामला है और इसमें तीसरे पक्ष की 'सहमति' या 'छूट' लेना हमारी संप्रभुता के खिलाफ है। विपक्ष का तर्क है कि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी भी देश के दबाव में आए बिना स्वतंत्र फैसले लेने की हिम्मत दिखानी चाहिए।

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