Loksabha Election: हाजीपुर सीट पर मज़बूत दिख रहे चिराग, लेकिन INDIA दे सकता है NDA को कड़ी टक्कर

Loksabha Election के मद्देनज़र देश भर में 'INDIA और NDA' के बीच सियासी दावपेंच का खेल शुरू हो चुका है। चुनावी बिसात में देश की सबसे चर्चित सीटों में से एक हाजीपुर में भी सियासी पारा चढ़ चुका है। इस सीट पर निवर्तमान सांसद और केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस और हाजीपुर सीट से पूर्व सांसद रहे, देश के दिग्गज नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रामबिलास पासवान के बेटे चिराग पासवान दोनों अपने अपने लिए दावा ठोक रहे हैं।

वन इंडिया हिंदी से हाजीपुर सीट के सियासी समीकरण पर चुनावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने ख़ास बातचीत की, उन्होंने कहा कि चाचा-भतीजे अपने प्रशंसकों और समर्थकों के हौसले बुलंद करने के लिए इस सीट पर दावा ठोक रहे हैं। दोनों एक ही गठबंधन में है, इसलिए इस सीट पर कयासों का बाजार काफी गर्म है।

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सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में चाचा-भतीजे की तकरार में NDA का हाजीपुर सीट पर खेल बिगड़ सकता है ? इस पर क्या -क्या समीकरण बन सकते हैं ? INDIA गठबंधन के लिए कैसे आसार होंगे ? इन सब बिन्दुओं पर चर्चाएं तेज़ हो चुकी हैं। क्या-क्या संभावनाएं हैं? हाजीपुर सीट को चुनावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने बातचीत के दौरान बेबाकी से राय रखी।

कैसे हैं राजनीतिक परिदृश्य?
आपात काल के पहले तक इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा था। हाजीपुर लोकसभा सीट 1977 में पहली बार SC के लिए आरक्षित की गई थी। कांग्रेस विरोधी लहर पर सवार होकर तबके युवा नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत रामविलास पासवान ने 1977 में कांग्रेस के किले में न सिर्फ सेंध लगाई थी, बल्कि इस सीट को अपने गढ़ के रूप में स्थापित कर दिया था। उन्होंने अपने पहले लोक सभा चुनाव में देश में सर्वाधिक 4,69,007 वोट प्राप्त कर अपना वर्चस्व स्थापित किया और अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवाया ।

1980 में फिर रामविलास चुनाव जीते। साल 1984 में पासवान यहां से चुनाव हार गए। उन्हें कांग्रेस के रामरतन राम ने हराया था। 1989 में पासवान ने फिर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और कांग्रेस के महावीर पासवान को 5 लाख 4 हजार 448 वोटों से न सिर्फ हराया बल्कि अपने रिकार्ड को और बेहतर किया था। तब से यह सीट रामविलास पासवान का गढ़ रही। 2009 में वे जेडीयू के वरिष्ठ नेता रामसुन्दर दास से हार गए, पर साल 2014 में उन्होंने फिर जीत के साथ वापसी की और 8वीं बार हाजीपुर से सांसद बने।

अब तक इस सीट पर स्व. रामविलास पासवान के परिवार का वर्चस्व रहा है। राम विलास पासवान इस सीट पर JDU से 2009 में चुनाव हारे थे, लेकिन 2014 में एक बार फिर से रामविलास पासवान ने चुनाव में जीत दर्ज की थी। 2019 लोकसभा पहले बने यूनाइटेड लोजपा के बीजेपी से गठबंधन के मुताबिक रामविलास पासवान को राज्य सभा भेजा जाना तय सुनिश्चित हुआ था।

रामविलास पासवान ने अपने छोटे भाई तत्कालीन बिहार के पशु एवं मतस्य संसाधन मंत्री पशुपति कुमार पारस को इस सीट से उम्मीदवार बनाया था। इस तरह पशुपति कुमार पारस यूनाइटेड लोजपा से सांसद बनने में सफल हुए थे। रामविलास पासवान की मौत के बाद पार्टी के अन्य सांसदों नें पार्टी तोड़कर पार्टी पर दावा किया। बीजेपी ने भी पशुपति खेमे का खुलकर पशुपति खेमे का साथ दिया।

पशुपति कुमार पारस को केंद्र में जहां खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री बनाया गया, वहीं चिराग पासवान से 12 जनपथ रोड बंगले को खाली करा लिया गया। पशुपति कुमार पारस अपने भतीजे से बयानों में युद्ध करते रहे तथा अपने मंत्रालय में व्यस्त रहे। सब कुछ गवाने वाले चिराग पासवान ने इन 4 सालों में पूरे बिहार का दौरा किया। इस प्रकार चिराग की लोकप्रियता बढ़ने से NDA में भी इनकी बढ़ी लोकप्रियता को तरजीह दी गई।

हाजीपुर सीट पर NDA का क्या है एस्कोप?
हाजीपुर सीट का जातीय समीकरण से भी यह सीट पासवान फैमिली और वर्तमान में NDA के लिए बिल्कुल अनुकूल है। इस क्षेत्र में हिन्दुओं की आबादी लगभग 90 % , जबकि मुस्लिम 9 प्रतिशत के आस पास है। जातीय आधार पर इस क्षेत्र में यादव, राजपूत, भूमिहार, कुशवाहा, पासवान और रविदास समाज की तादाद ज़्यादा है। अति पिछड़ों की भी अच्छी संख्या है जिनकी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्रिश्चियन 0.06, सिख, बुद्धिस्ट और जैन 3 प्रतिशत हैं। 1977 के बाद से इस सीट पर रामविलास पासवान परिवार मात्र 2 बार चुनाव हारे हैं |

2019 तक इस सीट पर रामबिलास पासवान के परिवार का दबदबा रहा है। लेकिन परिवार और पार्टी में टूट के बाद यहां का समीकरण पूरी तरह से बदल चुका है। एक ही परिवार के 2 लोग इस सीट पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। पिछले महीने ये दोनों परिवार अपने दलों को NDA गठबंधन का हिस्सा बता चुके हैं। ऐसे में NDA में खासकर बीजेपी के पास एक बड़ी जिम्मेदारी होगी कि कैसे इन दोनों लोगों को एडजस्ट कर सीट पर जीत दर्ज की जाय?

पशुपति कुमार पारस को अगर बीजेपी मना लेती है तो NDA सीट पर भारी बढ़त के साथ जीत दर्ज करने की सम्भावना काफी प्रबल होगी। पशुपति कुमार पारस के को एडजस्ट करने के लिए बीजेपी के पास कई अस्त्र हैं उनमें से किसी भी अस्त्र का प्रयोग करके उनको साधने की कोशिश की जा सकती है। पशुपति को राज्य सभा भेजकर, किसी राज्य का राज्यपाल बनाकर या फिर लोकसभा चुनाव के 1 साल बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में जीत के बाद मंत्री आदि बनाए जानें का आश्वासन देकर मना सकती है।

चिराग पासवान या पशुपति पारस इसके बाद भी नहीं मानते हैं, तो इन दोनों दलों के NDA में होते हुए फ्रेंडली मुकाबला देखने को मिल सकता है। ऐसे में चाचा-भतीजे एक दूसरे पर जमकर वार करेंगे। दोनों को पूरे बिहार में ठीक वैसे ही नुकसान उठाना पड़ेगा जैसा कि 2020 विधान सभा चुनाव में चिराग नें नितीश की सीटों पर फ्रेंडली लड़कर नीतीश कुमार को काफी नुकसान पहुंचाया था।

INDIA गठबंधन के क्या हैं आसार?
2009 में इस सीट पर JDU उम्मीदवार राम सुन्दर दास ने राम बिलास पासवान को हरा दिया था, उस वक्त लालू प्रसाद यादव ने राम बिलास पासवान को राज्य सभा भेज कर राजनीति में वेंटीलेटर पर जा चुके नेता को ऑक्सीजन दी थी। लालू यादव के इस बात की चर्चा भी इस सीट पर खूब होगी, अगर चाचा भतीजे गठबंधन में रहकर फ्रेंडली लड़ते हैं तो महागठबंधन के जीत के आसार भी बन सकते हैं।

आज लालू और नीतिश दोनों साथ आ चुके हैं, इससे महागठबंधन भी काफी मजबूत स्थिति में आ चुका है। फिर भी चिराग पासवान के द्वारा इस लोकसभा में की गई गतिविधियों, अपनी पहली मां और दूसरी मां दोनों को साधने से जो माहौल है। इससे लोगों के बीच चिराग के प्रति काफी सहानुभूति दिख रही है। चुणावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने कहा कि मुझे लगता है कि इस सीट को जीतने के लिए चिराग NDA की तरफ से सबसे अच्छे उम्मीदवार होंगे।

चाचा-भतीजे की तकरार में बिगड़ा सकता है NDA का खेल?
पिछले दिनों हाजीपुर पहुंचे केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस ने साफ-साफ कहा कि हाजीपुर से मैं सांसद हूं और यहीं से चुनाव चुनाव लड़ूंगा। दुनिया की कोई ताकत हमें इधर-उधर नहीं कर सकती है। हाजीपुर हमारा है और हमने पिछले 4 दशक से यहां के जनता की सेवा की है। उन्होंने आगे कहा कि किसी की औकात नहीं है कि वह हाजीपुर से चुनाव लड़ ले।

केंद्रीय मंत्री ने अपने भतीजे और लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान को यह संदेश दिया है, क्योंकि जमुई से सांसद चिराग संसद में हाजीपुर सीट को अपने पिता की कर्मभूमि बताकर निरंतर इस सीट से चुनाव लड़ने का दावा ठोक रहे हैं। दरअसल, दिवंगत नेता रामविलास पासवान ने हाजीपुर सीट को अपनी कर्मभूमि बनाई थी। इस वजह से पासवान परिवार के लिए केंद्र की राजनीति तक पहुंचने के लिए यह सीट सबसे आसान रास्ता है।

चुणावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने एक वाकया याद करते हुए कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में सुबोध कान्त सहाय के सामने संजय सेठ को टिकट देकर बीजेपी ने रांची लोकसभा में उतारा था। उस समय के निवर्तमान सांसद राम टहल ने निर्विरोध चुनाव लड़कर 30,000 वोट ही हासिल की थी। राम टहल के चुनाव लड़ने से बीजेपी के वोटों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

इसकी सबसे बड़ी राम टहल के खिलाफ रांची लोकसभा के लोगों के बीच उपजी एंटी एन कॉम्बेसी बताई गई थी। अगर राम टहल को बीजेपी टिकट दे भी देती तो सुबोध कान्त सहाय चुनाव जीत जाते। टिकट बदलने की रणनीति से बीजेपी ने कांग्रेस को तत्कालीन सांसद राम टहल के खिलाफ माहौल होने के बाद भी रोक दिया था। वैसे ही हाजीपुर लोकसभा सीट पर NDA टिकट बदलकर अंदर खाने जीतने की रणनीति बना रही है। पशुपति जितना चिराग का विरोध करेंगे उतना ही सहानुभूति चिराग के पक्ष में होगा।

NDA के 36 दलों का दिल्ली में हुए शक्ति प्रदर्शन में चिराग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नें गले लगाकर सबसे ज्यादा तरजीह दी है। इस दरम्यान चिराग पासवान ने पशुपति के पैर छुए, गले मिले, पशुपति पारस ने चिराग का हाल चाल पूछा और आशीर्वाद भी दिया। इस बात पर चर्चा होने से पशुपति पारस को राजनीतिक नुकसान का डर सताने लगा तो, मामले को औपचारिक बताकर उन्होंने मीडिया में स्पष्टीकरण भी दिया। दावे पर कई बार सीटिंग गेटिंग का तर्क भी देते रहे।

मोदी ने अपने हनुमान को गले से लगाया, ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि यह अचानक से हो गया। अन्य जगहों पर अचानक से ढेर सारी चीजें हो भी सकती हैं लेकिन राजनीति में ऐसा बिलकुल भी नहीं होता। राजनीति में पीछे के हर कदम आगे के रास्ते की तरफ ले जाते हैं, इशारा काफी है। अपनी लोकप्रियात की वजह से चिराग NDA में काफ़ी मज़बूत स्थिति में पहुंच चुके हैं।

पहले यूपीए नाम वाले गठबंधन INDIA और NDA के बीच मुकाबले की बात की जाय, तो प्रत्याशी बदलने का मुद्दा हो या फिर फ्रेंडली चुनाव। गठबंधन के 2 घटक दलों के एक में आने से NDA के नुकसान होने की संभावनाएं प्रबल हैं। ऐसे में इस सीट पर कांटे की टक्कर देखने को मिल सकती है।

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