Bihar Politics: 2024 के चुनाव में कैसे एक-एक सीट का मोहताज बन चुका है नीतीश कुमार का जेडीयू?

Bihar Lok Sabha Election 2024 JDU: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने सियासी भविष्य को लेकर काफी उलझन में लग रहे हैं। अपने डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को गद्दी सौंपने के दबाव की अटकलों के बीच उनके कुछ हालिया फैसले इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं।

नीतीश का यह सियासी उलझन 2020 के विधानसभा चुनावों के बाद बहुत ही ज्यादा बढ़ चुका है। इसके पीछे की वजह कुछ और नहीं, सिर्फ और सिर्फ उनकी अपनी खिसकती हुई राजनीतिक जमीन है।

2024 nitish kumar jdu
  • नीतीश कुमार के राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे कठिन चुनाव
  • लगातार घटता गया है जेडीयू का जनाधार
  • इंडिया ब्लॉक में सम्मानजनक सीटों के लिए है नीतीश की 'छटपटाहट'
  • बिना सहयोगी के आशीर्वाद से अब नहीं चल पा रहा है नीतीश का 'दांव'

नीतीश का खिसकता गया है अपना जनाधार
नीतीश कुमार जानते हैं कि बिहार की राजनीति में बिना किसी जनाधार वाली सहयोगी का आशीर्वाद प्राप्त किए सत्ता तक पहुंच लायक उनका अपना कोई खास सियासी वजूद नहीं रह गया है।

इसलिए, वह समय के साथ अपनी चुनावी गोटी सेट करते रहते हैं। यह बात बिहार में पिछले कुछ वर्षों में हुए विधानसभा और लोकसभा के नतीजों से जाहिर होते हैं।

जेडीयू से प्रभावी साबित होते रहे सहयोगी दल
2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन था। नीतीश की पार्टी 141 सीटों पर लड़ी, 115 सीटें जीती और 38.77% वोट ला पायी। जबकि, भाजपा सिर्फ 102 सीटों पर लड़ी, 91 पर जीत गई और उसे 39.56% वोट मिले।

2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश पाला बदल कर महागठबंधन में कांग्रेस और राजद के साथ चुनाव लड़े। जेडीयू-आरजेडी बराबर 101 सीटों पर लड़े। जेडीयू को 71 सीटें मिलीं और 40.65% वोट हासिल हुए। राजद 80 सीटें जीता और वोट शेयर भी जेडीयू से करीब 4% ज्याद रहा।

2014 में ही नीतीश ने नाप ली थी अपनी सियासी जमीन
नीतीश ने यह गठबंधन 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी सियासी जमीन को नाप लेने के बाद मजबूरी में किया था। उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ी थी और 40 लोकसभा सीटों में से सिर्फ दो- पूर्णिया और नालंदा में ही जीत पाई थी। पार्टी का वोट शेयर घटकर 16.04% रह गया था।

2019 में सिर्फ 1 सीट हारा एऩ़डीए, वह सीट भी जेडीयू की ही थी
2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी फिर एक बार बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए का हिस्सा थी। दोनों के बीच 17-17 सीटों का बंटवारा हुआ। 6 सीटें सहयोगी एलजेपी को दी गई।

इस चुनाव में एनडीए सिर्फ 1 सीट हारी और वह थी किशनगंज की सीट, जहां जेडीयू उम्मीदवार को कांग्रेस के हाथों हार मिली। बाकी एनडीए पार्टनरों की स्ट्राइक रेट 100% रही।

2020 में जेडीयू को मिली सिर्फ 43 सीटें, फिर भी बीजेपी ने दी सीएम की कुर्सी
नीतीश का यह सियासी गुमान फिर भी कम नहीं हुआ। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने भाजपा से 5 सीटें ज्यादा यानी 115 पर चुनाव लड़ा। लेकिन, उसे सीटें मिलीं सिर्फ 43 और वोट प्रतिशत रह गया 15.39%. वहीं बीजेपी सिर्फ 110 पर लड़कर 74 सीटें जीती और उसका भी वोट शेयर जेडीयू से कहीं ज्यादा यानी 19.46% रहा।

17 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए चल रहे हैं सियासी दांव!
नीतीश की ओर से अभी जितने भी सियासी दांव चले जा रहे हैं, उसको लेकर जानकारों का मानना है कि वह सबकुछ महागठबंधन या इंडिया ब्लॉक से कम से कम वही 17 सीटें चाहते हैं, जो 2019 में बीजेपी ने उनकी पार्टी के लिए छोड़ी थी।

लेकिन, राजनीति के धुरंधर जेडीयू सुप्रीमो को लगता है कि जब सीटों के बंटवारे को लेकर औपचारिक बातें होंगी तो लालू यादव के सामने वह किस मुंह से बड़े दावे कर सकेंगे?

उनकी यह कथित सियासी 'छटपटहाट' कभी विधानसभा में बहके-बहके बोल में छलक पड़ती है तो कभी इंडिया ब्लॉक की बैठक में हिंदी-अंग्रेजी के बीच उलझी नजर आती है। या फिर यह जेडीयू के अंदर ही उनके अपने साम्राज्य को किसी भी संभावित चुनौती के खिलाफ ठोस करने की कोशिशों के तौर पर दिखती है।

नीतीश को करना पड़ रहा है सियासी सच से सामना!
2019 में बिहार में जेडीयू ने जो सीटें जीती थीं वे हैं-
वाल्मीकि नगर
सीतामढ़ी
झंझारपुर
सुपौल
कटिहार
पूर्णिया
मधेपुरा
गोपालगंज
सीवान
भागलपुर
बांका
मुंगेर
नालंदा
काराकाट
जहानाबाद
गया

इंडिया ब्लॉक में कहां फंस सकता है पेच?
महागठबंधन में चुनाव लड़ने की स्थिति में इनमें से अधिकतर सीटों पर जेडीयू के मुकाबले आरजेडी की दावेदारी ज्यादा मजबूत बनती है। कई सीटें तो मंडल युग के जमाने से आरजेडी की गढ़ रही हैं। इनमें सीतामढ़ी, जहानाबाद, सीवान,भागलपुर,बांका, गोपालगंज,मधेपुरा, सुपौल और झंझारपुर का नाम तो आसानी से लिया जा सकता है।

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