Bihar News: निसंतान दंपतियों के लिए उम्मीद की नई किरण, बिहार में सरोगेसी को कानूनी मान्यता, निगरानी बोर्ड गठित
Bihar News: पटना की सुनीता कुमारी की कहानी अकेली नहीं है। चार बार मातृत्व का स्वाद चखने के बावजूद हर बार बच्चा छिन जाने का दर्द उन्हें अंदर तक तोड़ चुका था। लेकिन अब, सुनीता और उनके जैसे हजारों दंपतियों को न संकोच रहेगा, न भटकाव।
बिहार सरकार ने आखिरकार सरोगेसी (किराए की कोख) को कानूनी दर्जा दे दिया है, एक ऐसा फैसला जो चिकित्सा, समाज और नीति तीनों स्तरों पर ऐतिहासिक साबित हो सकता है।

कानून का आधार और राज्य सरकार की पहल
दिसंबर 2021 में केंद्र सरकार द्वारा सहायक प्रजनन तकनीक (ART) अधिनियम लागू किया गया था, जिसके तहत सभी राज्यों को अपने-अपने स्तर पर बोर्ड गठित करना था। बिहार में यह प्रक्रिया तीन साल तक लंबित रही, लेकिन अब जाकर राज्य सरकार ने विधायकों और विशेषज्ञों की एक 24-सदस्यीय निगरानी समिति गठित कर दी है।
इस बोर्ड की जिम्मेदारी केवल लाइसेंस जारी करना ही नहीं, बल्कि सरोगेसी से जुड़ी नैतिकता, मानवाधिकार और चिकित्सा मानकों की निगरानी भी है।
परंपरा बनाम आधुनिक विकल्प
भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से पारंपरिक समाज में मां बनना सिर्फ जैविक नहीं, सामाजिक भी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि 'मां बनना विवाह संस्था के भीतर आदर्श है।' इसका असर यह हुआ कि अविवाहित महिलाएं अब भी सरोगेसी का विकल्प नहीं चुन सकतीं, जबकि तलाकशुदा और विधवा महिलाएं सीमित शर्तों के तहत यह कर सकती हैं।
यहां एक सवाल उठता है, क्या यह कानून समानता की भावना को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है? क्या केवल शादीशुदा या "सही ढांचे" में रहने वाली महिलाएं ही मातृत्व की आकांक्षा रख सकती हैं?
तकनीक है, प्रक्रिया नहीं थी
पटना में IVF (In Vitro Fertilization) सेंटरों की कोई कमी नहीं है, लगभग 40 से अधिक केंद्र सक्रिय हैं। लेकिन बिना सरकारी मान्यता के, इन सेंटरों में सरोगेसी कराना कानूनी रूप से असंभव था। IVF विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु राय कहते हैं, "रोजाना 50 से अधिक दंपति सरोगेसी की पूछताछ के लिए आते हैं। लेकिन बोर्ड की मान्यता के बिना प्रक्रिया अधूरी थी।"
अब इन सेंटरों को मान्यता मिलने के बाद, एक साफ और पारदर्शी चिकित्सा प्रक्रिया संभव होगी। भ्रूण को महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित करने से लेकर सरोगेट मां की स्वास्थ्य सुरक्षा और बीमा तक - सब कुछ अब निगरानी में होगा।
कहां तक पहुंचेगा यह कानून?
लाभ:
राज्य के भीतर ही उपलब्धता, जिससे समय और खर्च दोनों में कमी
भ्रूण व्यापार, शोषण और अवैध मेडिकल प्रैक्टिस पर रोक
सरोगेट मां और इच्छुक दंपतियों को कानूनी सुरक्षा
IVF और ART क्लीनिकों को मेडिकल गाइडलाइन के अनुसार कार्य करने की बाध्यता
सीमाएं:
सिर्फ विवाहित या विधवा/तलाकशुदा महिलाओं तक सीमित अधिकार
ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी जागरूकता की भारी कमी
बोर्ड की स्वीकृति प्रक्रिया धीमी हुई तो सरोगेसी की वेटिंग लंबी होगी
अवैध नेटवर्क का खतरा यदि निगरानी ढीली पड़ी
खर्च में राहत या नया बाजार?
बिहार में सरोगेसी का खर्च औसतन ₹5 से ₹10 लाख के बीच बताया जा रहा है, जबकि दिल्ली, मुंबई या विदेशों में यह ₹20 से ₹60 लाख तक हो सकता है। यह निश्चित ही बिहार को 'सरोगेसी डेस्टिनेशन' के रूप में स्थापित कर सकता है, बशर्ते कि इसका दुरुपयोग न हो।
क्या यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम है?
बिहार में सरोगेसी को कानूनी मान्यता देना केवल एक चिकित्सा सुधार नहीं है, यह उन हजारों महिलाओं और दंपतियों की सामाजिक मान्यता की ओर बढ़ा एक बड़ा कदम है, जिन्हें मातृत्व की चाह है लेकिन साधन या समाज की सीमाएं आड़े आती रही हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में सरकार इस नीति को सुनियोजित, नैतिक और समावेशी रूप में लागू कर पाती है या नहीं। सही दिशा में पहला कदम उठ गया है, अब राह को समतल बनाना सरकार, चिकित्सा जगत और समाज, तीनों की साझी जिम्मेदारी होगी।












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