Kargil Vijay Diwas: शहीद रम्भू सिंह के गांव में अधूरे वादों की गाथा,26 साल बाद भी 'वीरगति' को तरस रहा मोहल्ला!

Kargil Vijay Diwas: 26 जून 1999 कारगिल युद्ध में पाकिस्तानियों से लड़ते हुए सीवान जिले के आंदर प्रखंड स्थित चितौर गांव के लाल रम्भू सिंह ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। लेकिन अफसोस, 26 साल बाद भी उनके गांव की हालत देखकर लगता है कि "सरकारों ने भी वादों को शहीद कर दिया है।"
टूटी-फूटी सड़कें, बदहाल पानी की व्यवस्था

चितौर गांव में आज भी टूटी-फूटी सड़कें, बदहाल पानी की व्यवस्था और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का टोटा है। जहाँ शहीद की प्रतिमा है, वहां कोई नियमित देखभाल करने वाला नहीं। सिर्फ एक दिन-26 जुलाई को लोग फूल चढ़ा जाते हैं, बाकी साल वही वीरानी, वही उपेक्षा।

Kargil Vijay Diwas Special News

नेताओं के वादे:
सिर्फ भाषणों में शहीद द्वार, फाइलों में सड़क का नामकरण, सिर्फ घोषणाओं में प्रतिमा सौंदर्यीकरण?। शहीद की पत्नी सुनीता कंवर की बात में वो टीस है, जो किसी सरकार को शर्मिंदा करने के लिए काफी होनी चाहिए। "अगर एक शहीद के परिवार से किया गया वादा 26 साल में भी पूरा नहीं हुआ, तो आम जनता के साथ न्याय की उम्मीद ही क्या!"

बुजुर्गों का तंज:
"नेता आते हैं, वादे कर जाते हैं... फिर अगली बरसी पर वही माला, वही झूठी संवेदनाएं और वही गड्ढों से भरी सड़कें।" और सरकारें? 26 साल में कई बार सत्ता बदली, लेकिन हालात नहीं। कभी राजनीति के नाम पर वोट मांगे गए, कभी विकास के नाम पर झूठे फॉर्मूले पेश किए गए, लेकिन चितौर गांव आज भी एक वीर शहीद की कुर्बानी का बोझ ढो रहा है, बिना इज़्ज़त, बिना बुनियादी सुविधाओं के।

अब सवाल उठना लाज़मी है:
क्या हम सिर्फ़ पोस्टर और फूलों से शहीदों का सम्मान करते रहेंगे?, या कभी उनकी धरती को भी वो सम्मान मिलेगा, जिसकी वो हक़दार है? "शहीद के नाम पर सड़क भी नहीं बनी... शायद इसलिए क्योंकि सरकार की नीयत भी गड्ढों जैसी है।"

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