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Bihar Chunav 2025: कौन थे बिहार के पहले मुख्यमंत्री? जिन्होंने अपने बेटे को टिकट देने से साफ मना कर दिया

Bihar Chunav 2025: एक नेता जो कभी महात्मा गांधी की आंखों में खटकता था, नेता बनने से पहले ये छात्र अंग्रेजों को भी उतना ही खटकता था। एक नेता जिसकी बात नेहरू भी काटने से पहले 100 दफा सोचते और फिर अपना फैसला उस नेता के फैसले से मैच करवा लेते। एक मुख्यमंत्री जिसे आधुनिक बिहार का जनक कहा गया। एक ऐसा मुख्यमंत्री जिसने अपनी राजनीतिक विरासत बनाने से ही इनकार कर दिया और अपने बेटे तक को टिकट न देने की जिद पकड़ ली।

आज के दौर में जहां किसी नेता के इधर-उधर के भी एक दर्जन रिश्तेदारों का टिकट पक्का होता है ऐसे में ये मुख्यमंत्री गैर परिवारवाद की राजनीति की मिसाल पेश करता रहा। एक मुख्यमंत्री जिसके कार्यकाल में छात्रों के लिए पहला आवासीय विद्यालय खोला गया ताकि बिहार में शिक्षा की रफ्तार और बढ़ाई जा सके। एक ऐसा नेता जो पहले प्रधानमंत्री बना और बाद में मुख्यमंत्री। हम बात कर रहे हैं बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की।

Bihar Chunav 2025

मात्र साढ़े चौबीस हजार थी कुल संपत्ति

इतिहास जब निराश करता है तब तारीख बन जाता है और जब निर्माण करता है तो नाम। ऐसा ही कुछ श्रीकृष्ण सिंह के मामले में साफ झलकता है, जब एक शख्सियत ने एक नव निर्मित राज्य की कमान संभाली और फिर कैसे विकास का खाका खींच दिया। 11 फरवरी 1961 का दिन था, बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह का निधन हुए 12 दिन हो चुके थे. लेकिन फिर सूबे के राज्यपाल डॉक्टर जाकिर हुसैन की मौजूददगी में उनकी तिजौरी खोली गई। तिजोरी खुले तो सबकी आंखों में वो भाव स्पष्ट थे कि जो ढूंढा जा रहा है दरअसल वो था ही नहीं। सब भौंचक्के थे। दरअसल तिजोरी के भीरतर मात्र 4 लिफाफे थे। लेकिन इनमें से एक भी लिफाफे में मौजूद रकम का एक पैसा भी उनके परिवार को नहीं मिलने वाला था।

वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह अपनी किताब दी जननायक कर्पूरी ठाककुर में लिखते हैं। कि पहले लिफाफे में 20 हजार रुपए थे जो कांग्रेस पार्टी के नाम थे, दूसरे में तीन हजार रुपए निकले जो पूर्व मंत्री उजियार हुसैन मुनीमी की बेटी के नाम पर थे। तीसरे लिफाफे में एक हजार रुपए थे जो तत्कालीन मंत्री महेश प्रसाद सिंह की सबसे छोटी बेटी के लिए थे। चौथे लिफाफे में 500 रुपए निकले जो उनके सबसे भरोसेमंद नौकर के लिए थे। लेकिन कमाल की बात ये थी कि तिजोरी में न परिवार के लिए कुछ निकला, ना बेटों के लिए। बिहार केसरी के नाम से पहचाने जाने वाले श्रीकृष्ण सिंह उर्फ श्रीबाबू ने अपने पूरे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में ना संपत्ति खड़ी की, न पैसे इकठ्ठे किए। उनके कर्म ही उनकी पूंजी रही।

पहले प्रधानमंत्री फिर मुख्यमंत्री

21 अक्टूबर 1887 को बंगाल प्रेसिडेंसी के शेखपुरा में जन्में श्रीबाबू का सियासी सफर काफी रोचक रहा। 1935 में श्रीकृष्ण सिंह पहली बार बिहार के पीएम बने, दरअसल देश आजाद होने के पहले अंग्रेजी हुकूमत हर राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बल्कि प्रधानमंत्री बनाते थे। इसीलिए श्रीबाबू बिहार से इकलौते ऐसे नेता थे जो पहले प्रधानमंत्री भी रह लिए और जब आजादी मिली तो मुख्यमंत्री भी बने। आजादी के बाद पहली बार हुए चुनाव में कांग्रेस ने 210 सीटों पर कब्जा जमाया। लेकिन सीएम के नाम को लेकर रस्साकसी तेज थी क्योंकि एक तरफ थे भूमिहार जाति से आने वाले श्रीकृष्ण सिंह और दूसरी तरफ अनुग्रह नारायण सिंह। कई पैमानों पर दोनों को परखा गया और अंत में गेंद श्रीकृष्ण सिंह के पाले में आई।

श्रीबाबू जीत के बाद अपने घर पहुंचे तो समर्थकों ने घेर लिया। आतिशबाजी हो रही थी, लोग ढोल की थाप पर नाच रहे थे लेकिन तभी एक गाड़ी उनके बंगले में घुसती है, समर्थक श्रीबाबू को खबर देते हैं, श्री बाबू दौड़े-दौड़े आते हैं और गाड़ी के रुकने पर उसका गेट खुद अपने हाथों से खोलते हैं। दरअसल गाड़ी में उनकी सीएम सीट के मुख्य प्रतिद्वंदी अनुग्रह नारायण सिंह थे। वे बाहर आते हैं तो दोनों गले लगकर बुरी तरह रोने लगते हैं। दरअसल अनुग्रहण प्रतिद्वंदी बाद में थे पहले दोनों बहुत करीबी थे। अनुग्रह माफी मांगते हुए कहते हैं कि लोगों की बातों में आकर आपके खिलाफ खड़ा हुआ, जवाब में श्रीबाबू कहते हैं ये सब छोड़ों, अब जैसा तुम्हारा मन करे वैसी सरकार बनाओ। आप सोच रहे होंगे राजनीति में भला ऐसा होता है क्या? होता है, जब नेता उस कद का हो तो होता है। ये जितना सीधा दिख रहा है उतना सीधा है भी नहीं।

गांधी जी की चिठ्ठी

साल 1935 में जब बिहार का प्रधानमंत्री चुना जाना था तब भी अनुग्रह नारायण सिंह और श्रीकृष्ण सिंह आमने सामने थे। गांधी जी ने चिठ्ठी में अनुग्रह नारायण सिंह के नाम का सुझाव दिया, बावजूद इसके दूसरे नेताओं की आपत्तियां और समर्थन गांधी जी की चिठ्ठी पर बीस साबित हुआ। फिर बिहार की राजनीति में वो फेक्टर आया जो आजतक चुनावी गणित को झगझोर देता है। जाति का गणित। जैसा कि बाताया अनुग्रह नारायण राजपूत थे और श्रीबाबू भूमिहार। लिहाजा भूमिहारों ने गांधी जी चिठ्ठी का विरोध किया और श्रीबाबू को कमान देने की मांग की, दरभंगा के महाराज ने भी श्रीबाबू के समर्थन में मांग की तो पलड़ा और मजबूत हो गया।

नतीजतन अनुग्रह नारायण को ना चाहते हुए संतोष का घूंट पीना पड़ा और प्रधानमंत्री का ताज श्रीबाबू के सिर सजा। 4 साल उन्होंने इस पद को संभाला लेकिन वर्ल्ड वॉर टू में ब्रितानी हुकूमत के एक फैसले की वजह से कांग्रेस शासित सभी राज्यों के प्रधानमंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। वर्ल्ड वॉर 2 खत्म हुआ तो देश की आजादी की लड़ाई शुरू हुई और देश आजाद हुआ लेकिन दो हिस्सों में। बिहार में फिर चुनाव हुए और फिर मुख्यमंत्री खोजा जाने लगा, जिसका किस्सा हमने आपको बताया।

आजादी की लड़ाई और जेल

बात 1911 की है। मुंगेर का लड़का श्रीकृष्ण पटना के पटना कॉलेज से कानून की पढ़ाई कर रहा था। एक रोज जॉर्ज पंचम का पटना दौरा हुआ, पटना में एक दिन पहले से तैयारियां जोरों पर थीं। जॉर्ज पंचम आए तो गंगा में नाव की सवारी का लुत्फ उठाने निकले। लोग जॉर्ज को देखने के लिए उमड़ पड़े। लेकिन पटना कॉलेज का मिंटो हॉस्टल जिसमें श्रीकृष्ण रहते थे उन्होंने अपने कमरे की खिड़की तक नहीं खोली, क्योंकि हॉस्टल गंगा किनारे था और अगर खिड़की खुलती तो जॉर्ज पंचम दिख जाता जो श्रीकृष्ण को नागवार था। ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ मन में सिर्फ नफरत और कड़वाहट भरी हुई थी, कि कब जाएंगे हमारा देश छोड़कर। इससे पहले श्रीकृष्ण कुछ आंदोलनों में ब्रिटिश की लाठियां भी खा चुके थे।

अब चलते हैं सीधा 1930 में। अब तक श्रीबाबू के नाम से मशहूर हुए श्रीकृष्ण कांग्रेस और गांधी दोनों से जुड़ चुके थे। बढ़-चढ़कर आंदोलनों और प्रदर्शनों में हिस्सेदारी लेने लगे थे। 1930 में महात्मा गांधी ने जब दांडी मार्च शुरू किया और तमाम कांग्रेसी नेताओं के साथ जाकर में समुंदर किनारे हाथ से नमक उठाकर नमक कानून तोड़ा तो इधर श्रीबाबू ने भी नमक कानून तोड़ा और गिरफ्तार भी हुए। भारत छोड़ो आंदोलन में भी खूब एक्टिव रहे, लाठियां खाईं और जेल में दिन गुजारे। नाम और बड़ा होता चला गया, इतना कि नेहरू और गांधी जैसे नेता अच्छे से जानने पहचानने लगे थे। पहचानने क्या लगे थे की-कॉन्टेक्ट्स हो गए थे।

आधुनिक बिहार के निर्माता

अगर श्रीबाबू को आधुनिक बिहार का निर्माता कहा जाए तो शायद ही किसी इतिहासकार को आपत्ति होगी। क्योंकि श्री बाबू ही वो पहले शख्स थे जिसने देश में सबसे पहले बिहार में जमींदारी प्रथा को खत्म किया था। भूमिहार होते हुए भी प्रदेश को जातिवाद के दलदल से बाहर निकालने के लिए श्रीबाबू ने खुद देवघर के प्रसिद्ध बाबाधाम मंदिर में साथ जाकर दलित श्रद्धालुओं का प्रवेश शुरू करवाया था, इसके लिए उनका विरोध भी हुआ लेकिन उन्होंने इन विरोधों की कभी परवाह नहीं की। हालांकि देवघर के पंडों ने उनका ये आंदोलन सफल नहीं होने दिया लेकिन समय और जनता दोनों उनके साथ रहे और बाद में दलितों की बाबाधाम मंदिर में एंट्री हो सकी।

बिहार का विकास और श्रीबाबू

उनके कार्यकाल में बिहार ने विकास की रफ्तार पकड़ी। क्योंकि आजादी के बाद बिहार में जितने भी बड़े उद्योग या शिक्षण संस्थान खुले, वह श्री कृष्ण सिंह के कार्यकाल में ही खुले। इसका भी किस्सा दिलचस्प है। दरअसल देश में रिफाइनरी लगना थी, केंद्र सरकार ने कहा कि वह बिहार में नहीं देना चाहती साथ ही उर्वरक फैक्ट्री भी बिहार से बाहर जाने लगी तो श्रीबाबू नाराज हो गए।

श्री बाबू ने नेहरू जी को कहा कि अगर ये दोनों कारखाने बिहार नहीं आए तो वह पद से इस्तीफा दे देंगे। नेहरू जी ने खूब समझाया लेकिन वो टस से मस नहीं हुए, उल्टा केंद्र के खिलाफ अनशन पर बैठ गए। तब जाकर बरौनी में उर्वरक फैक्ट्री भी आई और रिफाइनरी भी। श्रीबाबू यहीं नहीं रुके, उन्हें पता था कि आजादी के बाद देश में कोई बहुत बड़ा फंड नहीं था, देश का जीडीपी बहुत कम था। बावजूद इसके लिमिटेड रिसोर्सेस के बीच बिहार में श्री बाबू ने उद्योग शुरू करने का काम किया। बिहार में उस समय 9 शुगर फैक्ट्री हुआ करती थी, बहरागोड़ा में यूरेनियम का इलाका था, दामोदर घाटी परियोजना, बीआईटी सिंदरी, नेतरहाट सब कुछ उन्हीं के समय में शुरू हुआ। उनके समय शुरू हुईं फैक्ट्रियां झारखंड में आज भी चल रही है लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि बिहार में इनमें से ज्यादातर फैक्ट्रियां और कारखाने जो रोजगार देते थे या तो वे राजनीति के शिकार हो गए या राजनेताओं द्वारा पाले गए माफियाओं के।

राजनीतिक सुचिता

जहां आजकल नेता अपने बेटे-बेटियों को तो छोड़िए, चाचा, चाचा का बेटा, चाचा के बेटे की पत्नी, चाचा के बेटे की पत्नी के भाई तक को टिकट दिलवा देते हैं। ऐसे में श्रीबाबू उन नेताओं में से थे जिन्होंने अपनी किसी औलाद को चुनाव में टिकट दिलवाना तो दूर, उल्टा टिकट न मिले इसके लिए लड़ाई लड़ी। ऐसा नहीं था कि उन्हें अपने बेटे से कोई दिक्कत थी, दरअसल वे इस बात को कतई पसंद नहीं करते थे कि वे इसे अच्छा नहीं मानते थे। उत्तर बिहार के चम्पारण जिले के कुछ प्रमुख कांग्रेसी नेता सन 1957 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह से पटना में मिले। उनसे आग्रह किया कि आप अपने बेटे शिवशंकर सिंह को विधानसभा चुनाव लड़ने की इजाजत दे दीजिए श्रीबाबू ने कहा कि मेरी अनुमति है, लेकिन फिर मैं स्वयं चुनाव नहीं लड़ूंगा। क्योंकि एक परिवार से एक ही व्यक्ति को चुनाव लड़ना चाहिए।

श्रीबाबू को पता था कि पार्टी को बिल्कुल मंजूर नहीं होगा, तो उन्होंने यही पत्ता फेंका। उन्हें मनाने की इस बार कोई खास कोशिश नहीं हुई क्योंकि प्रदेश स्तर के नेता इस बात को समझ चुके थे कि जो आदमी नेहरू जी की नहीं सुनता वो हमारी क्या ही सुनेगा। इसलिए सब बैरंग लौटे और श्रीबाबू ने राजनीतिक गरिमा को कायम रखा। इसी का कारण था कि उनके बेटे शिवशंकर सिंह, श्रीबाबू के सन 1961 में निधन के बाद ही विधायक बन सके।

भूमिहार थे इसलिए नहीं मिला भारत रत्न?

श्रीबाबू बाकी दिनों में अपने क्षेत्र के खूब दौरे करते लेकिन जैसे ही चुनाव आता वे वोट मांगने अपने इलाके में नहीं जाते, बावजूद इसके वे चुनाव नहीं हारे। क्या भूमिहार-क्या राजपूत, दोनों जातियों से उन्हें तबीयत से वोट मिलते। संपत्ति के मामले में भी कुछ ऐसे ही थे। राजनीति में रहते हुए कभी संपत्ति नहीं बनाई और जब दुनिया छोड़ी तो मात्र साढ़े चौबीस हजार रुपए थे वो भी किसी और के लिए। इतना सबकुछ करने के बाद भी उन्हें कभी भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया। लोगों ने कई मौकों पर इसकी मांग की लेकिन ना जाने किस वजह से सरकार ये न कर सकी। उनके चाहने वाले कहते हैं कि अगर वे भूमिहार से न होकर किसी और जाती से होते तो शायद भारत रत्न कब का मिल चुका होता। इसीलिए तो कहते हैं, राजनीति है तो सब कुछ मुमकिन है बिना कुछ किए।

श्रीबाबू के बारे में आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में बताएं।

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