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Elephant Shoes: अब हाथी भी पहनेंगे जूते ! कीमत और वज़न जानकर हैरान रह जाएंगे आप

Elephant Shoes: बिहार के नालंदा ज़िले में हाथी के लिए जूते बनाए जा रहे हैं। हाथी के जूते का वजन और उसे बनाने में लागत जानकर हैरान रह जाएंगए आप।

Elephant Shoes Maker In Bihar

Elephant Shoes: बिहार पशु प्रेमियों की कमी नहीं हैं, पिछले दिनों एक रिटायर्ड फौजी की खबर से हमने आपको रूबरू करवाया था, जो अपने पेँशन की रकम बेज़ुबान जानवर की देखभाल के लिए इस्तेमाल करते हैं। आज हम आपको एरावत ट्रस्ट के अध्यक्ष अख्तर इमाम के पहल के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं। जो कि हाथियों के लिए जूते बनवा रहे हैं। खुले पांव चलने से अख्तर इमाम के ज़ेहन में यह बात आई की जिस तरह से इंसानों को खुले पैर से चलने में तकलीफ होती है। उसी तरह जानवरों को भी तकलीफ होती होगी। इसी सोच के साथ उन्होंने हाथियों के लिए जूते बनने को दिया।

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    Elephant Shoes: अब हाथी भी पहनेंगे जूते ! कीमत और वज़न जानकर हैरान रह जाएंगे आप
    जूते का वज़न जानकर हैरान रह जाएंगे आप

    जूते का वज़न जानकर हैरान रह जाएंगे आप

    अख्तर इमाम हाथी विशेषज्ञ भी हैं, उनकी मानें तो पक्की सडक़ों पर चलने में हाथियों को काफी परेशानी होती है। इसलिए उनके लिए जूते बनवाए गए। उन्होंने बताया कि उनकी देखरेख में कई हाथी हैं, लेकिन तीन हाथी मोती, रागिनी और बेटी उनके काफी करीब है। बेटी नाम की हाथी सबसे कम उम्र की है। तीनों हाथियों के पैर का माप लेकर जूता बनाया गया। बताया जा रहा है कि चमड़े से बनाए गए जूते का वज़न 10 किलो ग्रांम के क़रीब है। नांलदा के बिहार शरीफ़ के कारीगरों ने जूते बनाए। । नालंदा की मशहूर चमड़ा मंडी मोरातलाब के मोची अनिरुद्ध को जूता बनाने का काम सौंपा गया था।

    जूता बनाने में इतने रुपये का आता है ख़र्च

    जूता बनाने में इतने रुपये का आता है ख़र्च

    अनिरुद्ध झारखंड में बैंकर का काम करते हैं, इसलिए नालंदा में उनके बुजुर्ग पिता और छोटा भाई जूते बनाने के कारोबार को संभालता है। अनिरूद्ध की मानें तो हाथी के लिए एक अच्छा जूता सेट बनाने में कम से कम 12 हज़ार रुपये का खर्च आता है। जब उसे हाथी के जूते बनाने के प्रस्ताव वह चौंक गया लेकिन बाद में उसने जूता बनाने के लिए हामी भर दी। जूते का सोल मजबूत रखने के लिए टायर काटकर सोल दिया गया। हाथी के पैर का आकार खुला-खुला सा है। इसलिए सैंडल की तरह जूते में फीते भी दिए गए। जूता बनाने में यह भी खयाल रखा गया कि, इसे पहनने के बाद हाथी को परेशानी महसूस नहीं हो। अगर ऐसा होगा तो वह जूता तोड़ देगा।

    'पूर्वजों से करते आ रहे हैं ये '

    'पूर्वजों से करते आ रहे हैं ये '

    अनिरुद्ध ने कहा उम्मीद है कि बिहार के अन्य जिलों में रहने वाले हाथी प्रेमी भी जूते बनवाएंगे। सुरेश दास ने (अनिरुद्ध कुमार दास के पिता) कहा कि पूर्वोजों से वह लोग इस पेशे से जुड़े हुए हैं। यहां पर पहले 105 कारीगरों के परिवार का इस पेशे से गुज़ारा होता था, लेकिन महंगाई बढ़ने और फोरलेन के निर्माण का काम शुरू होने के बाद सब कुछ खत्म होता जा रहा है। अब करीब 30 लोग ही इस पेशे से जुड़े हैं। बाकी लोग नुकसान होने की वजह से रोज़गार की तलाश में पलायन कर गए। उन्होंने कहा कि उम्र हो गई है इसलिए वह लोगो अपने पूर्वजों के कारोबार से ही गुज़ारा चला रहे हैं।

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