सरहद की सुरक्षा में तैनात जवानों की कलाई पर सजेगी इको फ्रेंडली राखी, इस तरह से किया जा रहा तैयार
Rakhi Special Story: बिहार के औरंगाबाद ज़िले में गोबर की राखी के बाद अब पूर्णिया ज़िले की इकोफ़्रेंडली राखी की देशभर में चर्चा हो रही है। गोबर, मिट्टी और पिस्ते के छिलके से बनी राखी, सरहद पर तैनात जवानों के हाथों पर सजेगी। 1500 राखी सरहद पर डटे सेना के जवानों की कलाई पर बांधी जाएगी।
सरहद पर जवनों के लिए जुट एंड बनाना फाइबर क्लस्टर के तहत को पूर्णिया के मारवाड़ी महिला सम्मेलन शाखा समिति की तरफ़ 1500 राखियां भारतीय सेना जवान को भेजी जा रही हैं। ग़ौरतलब है कि अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन की देशभर की शाखाओं से 5 लाख राखियां जवानों को लिए भेजी जा रही हैं।

देश विदेश से इकोफ्रेंडली राखी की डिमांड आ रही है, महिलाओं को वीडियो ट्रेनिंग के ज़रिए गोबर, मिट्टी, पिस्ते का छिलका, पटुआ, संठी से इको फ्रेंडली राखी बनाने सिखाया गया है। औरंगाबाद जिला बिहार का पहला ऐसा जिला बना है, जहां गोबर से राखी तैयार की जा रही है। वहीं अब पूर्णिया ज़िला दूसरे नंबर पर है, जहां गोबर से राखी बन रही है।
कलाकर गुल्लू ने कहा कि हर प्रदेश की अपनी कलाकृति की अलग पहचान होती है। ओडिशा में शंख की बनी चीजें देखने को काफी मिलती है। मुरादाबाद में पीतल के सामनान, असम में बांस से बनी चीज़े और केरल में नारियल से बनी चीजें देखने को मिल जाती हैं।
इसी तरह पूर्णिया में पटुआ से निकलने वाली संठी की एक अलग पहचान है। यहां तैयार की जाने वाली राखी इकोफ्रेंडली है। वेस्ट चीज़ों से इकोफ्रेंडली राखी बनाने में सिर्फ 10 मिनट का वक्त लगता है। बनने के बाद 10 से 30 रुपये तक की कीमत होती है। राखी की यूनिकनेस के देश ही नहीं विदेशों में भी लोग क़ायल हैं। विदेशों में रहने वाले लोग भी संपर्क साधकर राखी की डिमांड कर रहे हैं।
पूर्णिया शहर के रजनी चौक (सहायक खजांची थाना क्षेत्र) इलाका निवासी आर्टिस्ट गुल्लू ने कहा कि उन्हें इस बात की सबसे ज़्यादा खुशी है कि उनकी इकोफ्रेंडली राखी देश के जवानों की कलाई पर बंधेगी, जो दिन रात हम लोगों के लिए सरहद पर डटे रहते हैं।












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