Bihar News: ‘CM नीतीश ने तोड़ा मेरा घर, 80 सालों से यहां रह रहे हैं’, प्रदेश के मुखिया से क्यों ख़फ़ा है जनता?

Bihar CM Nitish Kumar News: बिहार में बारिश से लोगों को राहत तो ज़रूर मिली है, लेकिन प्रदेश के बाढ संभावित क्षेत्रों में जनजीवन भी बेहाल हो गया है। प्रदेश के विभिन्न जिलों की बात तो छोड़िए, राजधानी पटना में लोगों किन परेशानियों से जूझना पड़ रहा है, जानने के लिए वन इंडिया हिंदी की टीम पटना के गाय घाट पहुंची।

गाय घाट वही जगह हैं जहां के पर रोज़गार कर रहे लोगों को हर चुनावी मौसम में यह आश्वासन मिलता है कि आप लोग बेखौफ़ होकर गाय घाट पर रोज़गार करें। बारिश के दिनों में जलस्तर बढ़ने से पहले ही आपके लिए बेहतर व्यवस्था की जाएगी, जिससे आपको रोज़गार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

CM Nitish demolished my house living here from 80 years people opinion on flood Bihar News

अब जब बारिश ने लोगों को राहत दी है, तो वहीं प्रदेश के विभिन्न जिलों में बाढ संभावित क्षेत्रों से विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। ऐसे में राजधानी में रह रहे लोगों का हाल भी जानना ज़रूरी है, क्योंकि यह मास मतदाता सीएम नीतीश कुमार के कोर वोटर्स में गिने जाते हैं।

गाय घाट पर रोज़गार कर रहे लोगों और महिलाओं से वन इंडिया हिंदी ने बात की और उनकी परेशानियों पर सवाल किया। सभी लोगों ने बेबाकी से अपनी बात रखी। अनीता देवी ने कहा कि नीतीश कुमार ने हमारा घर तोड़ दिया। 80 सालों में हम लोग यही रह रहे हैं। यही आश्वासन मिला था कि अच्छी व्यवस्था की जाएगी।

चुनावी मौसम में वादों का लॉलीपॉप थमाया जाता है। इन लोगों ने कहा था कि हम लोगों के लिए बाढ़ से पहले बेहतर सुविधा कर दी जाएगी। जलस्तर बढ़ने से हमारे रोज़गार पर असर नहीं पड़ेगा लेकिन अब हम लोगों की आदत हो गई है, ऐसे जिंदगी गुज़ारने की। कोई भी हम लोगों की नहीं सुनता है।

मनीषा ने कहा कि जलस्तर बढ़ने से मेरी मां को बहुत परेशानी होती है। मुश्किल से डेढ़ दो सौ रुपये कमाकर मां घर चलाती है। बारिश के दिनों में घाट पर जल स्तर बढ़ने से वह भी कमाई का ज़रिया बंद हो जाता है। भूखे सोने की नौबत आ जाती है, सीएम नीतीश को हमारे वोट तो चाहिए, लेकिन हमारे हालात नहीं सुधारे जाते हैं।

राजधानी पटना के लोगों को बाढ़ से निजात तो मिल नहीं पाती है। यहां के लोग तो हैं बेहाल, प्रदेश के अन्य जिलों के लोगों का क्या होगा हाल, इससे ही अंदाज़ा लग जाता है। हम लोग बस इसी उम्मीद पर जीते हैं कभी तो हालात बदलेंगे, बेहतर व्यवस्था की राह देखते-देखते बदतर हालात में जान जाने की उम्र आ चुकी है।

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