Chhath Puja 2022: मां सीता ने पहली बार इस मंदिर किया था छठ, जानिए किसने दी थी व्रत की सलाह ?
Chhath Puja 2022: आनंद रामायण के मुताबिक बबुआ घाट (मुंगेर) से 3 किलोमीटर दूर गंगा के बीच में पर्वत पर मां सीता ने ऋषि मुद्गल के आश्रम में छठ पूजन किया था। मौजूदा वक्त में उस जगह को सीता चरण मंदिर के नाम से लोग जानते हैं।
Chhath Puja 2022: उत्तर भारत के लोगों के लिए छठ सबसे बड़ा त्यौहार है, यही वजह है कि छठ पूजा को उत्तर भारतीय लोग महापर्व की संज्ञा देते हैं। बिहार में छठ की तैयारियां ज़ोरों से चल रही हैं, इसी कड़ी में छठ पर्व से जुड़ी कई दिलचस्प खबरें भी पढ़ने को मिल रही हैं। आज हम आपको छठ से जुड़ी ऐसी खबर बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं। जी हां हम बात करने जा रहे हैं उस मंदिर की जहां मां सीता ने पहली बार छठ किया था। छठ व्रत के साथ कई मंदिरों की मान्यता और खासियत वाली फेहरिस्त में बिहार के मुंगेर जिला का नाम भी शुमार है। क्योंकि यहां सीता चरण मंदिर स्थित है, इसके बारे में हम आपको आगे बताने जा रहे हैं, कि आखिर क्या मान्यता है और ये मंदिर क्यों मशहूर है।

आज भी मौजूद है प्रमाण
मां सीता ने पहली बार मुद्गल के आश्रम में ही छठ किया था, इस बात का ज़िक्र धार्मिक ग्रंथों में भी है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां सीता ने रामायण काल में पहला छठ पूजन मुंगेर (बिहार) में गंगा तट पर किया था। इस बात का प्रमाण आज भी वहां मौजूद है। मां सीता के अस्तचलगामी सूर्य और उदयमान सूर्य को अर्घ्य देते पैर के निशान आज भी मौजूद हैं। जानकारों की मानें तो मां सीता के पैर के निशान और मुंगेर के बारे में ज़िक्र आनंद रामायण के पेज नंबर 33 से 36 तक किया गया है।

राजसूर्य यज्ञ करने का प्रभु राम ने लिया फ़ैसला
आनंद रामायण के मुताबिक बबुआ घाट (मुंगेर) से 3 किलोमीटर दूर गंगा के बीच में पर्वत पर मां सीता ने ऋषि मुद्गल के आश्रम में छठ पूजन किया था। मौजूदा वक्त में उस जगह को सीता चरण मंदिर के नाम से लोग जानते हैं। मुद्गल आश्रम आज भी मां सीता के छठ पूजन की गवाही दे रहा है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक प्रभु राम वनवास पूरा करने के बाद अयोध्या वापस लौटे थे, जिसके बाद रामराज्य के लिए उन्होंने राजसूर्य यज्ञ करने का फ़ैसला लिया था।

छठ व्रत पूरा करने की दी थी सलाह
प्रभु राम के फैसले पर वाल्मीकि ऋषि ने कहा था कि मुद्गल ऋषि के आये बिना राजसूर्य यज्ञ कामयाब नहीं हो सकता है। वाल्मीकि ऋषि की बात मानकर ही प्रभु राम और मां माता मुद्गल ऋषि के आश्रम पहुंचे था। आश्रम पहुंचने के बाद मुद्गल ऋषि ने मां सीता को छठ व्रत पूरा करने की सलाह दी थी। आनंद रामायण के मुताबिक रावण का वध करने की वजह से प्रभु राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा था, क्योंकि रावण एक ब्रह्मण था।

मां सीता ने आश्रम में रहकर रखा था व्रत
ब्रह्म हत्या के पास से मुक्ति के लिए अयोध्या के कुलगुरु मुनि वशिष्ठ ने मुगदलपुरी (वर्तमान में मुंगेर) में ऋषि मुद्गल के पास प्रभु राम और मां सीता को भेजा था। जिसके बाद ऋषि मुद्गल ने वर्तमान कष्टहरणी घाट में प्रभु राम को ब्रह्महत्या मुक्ति यज्ञ करवाया था। वहीं ऋषि मुद्गल ने मां सीता को आदेश दिया की वह आश्रम में ही रहें। क्योंकि यज्ञ में महिलाओं को भाग लेने उचित नहीं है। ऋषि मुद्गल के निर्देश पर मां सीता ने आश्रम में रहकर ही व्रत रखा और सूर्य उपासना के दौरान अस्ताचलगामी सूर्य को पश्चिम दिशा की ओर और उदीयमान सूर्य को पूरब दिशा की ओर अर्घ्य दिया था।

मनोकामना पूर्ण होने की है मान्यता
मां सीता के छठ व्रत का प्रमाण आज भी सीताचरण मंदिर में मौजूद है। जानकार बताते हैं कि मंदिर के गर्भ गृह में माता सीता के पैरों के निशान पश्चिम और पूरब दिशा की ओर मौजूद हैं। साल के 6 महीने मंदिर का गर्भ गृह गंगा में समाया रहता है। 6 महीने गंगा का जलस्तर कम रहता है तो मंदिर का गर्भ गृह ऊपर दिखता है। स्थानीय लोगों की मानें तो ऐसी मान्यता है कि यहां पूजा करने से श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती है। इसके साथ ही स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार इसे पर्यटक स्थल के तौर पर विकसित करे तो पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है।
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