भाजपा को कितना रास आएगा नीतीश समर्थक ‘पारस’ का मजबूत होना ?
पटना, 17 जून। नरेंद्र मोदी समर्थक चिराग पासवान का कमजोर होना और नीतीश समर्थक पशुपति पारस का मजबूत होना क्या भाजपा को रास आएगा ? पंद्रह-सोलह साल की राजनीति में नीतीश कुमार पहली बार भाजपा के मुकाबले कमजोर हुए हैं। यह संभव हुआ चिराग पासवान की वजह से। चिराग पासवान ने स्थापित किया कि अगर नीतीश कुमार के खिलाफ राजद के अलावा कोई तीसरा मजबूत प्लेयर भी हो तो उन्हें हराया जा सकता है। चिराग की स्थिति जब लोजपा में मजबूत थी तब उन्होंने इस अवधारणा को सच साबित किया। लेकिन जिस तरह से जदयू की पटकथा पर लोजपा में तख्तापलट हुआ उससे हालात के बदलने की संभावना है।

अगर पशुपति कुमार पारस लोजपा के शक्तिशाली नेता बन कर उभरते हैं तो यह नीतीश कुमार के लिए सुकून की बात होगी। पारस नीतीश कुमार के प्रशंसक हैं और उनसे बेहद अच्छे रिश्ते भी हैं। अगर लोजपा की कमान पारस के हाथ में आती है तो भविष्य में भाजपा को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। नीतीश कुमार को खुश करने के लिए भाजपा ने चिराग पासवान को कुर्बान तो कर दिया लेकिन उसका नतीजा क्या होगा?

नीतीश की छवि पर असर
जदयू का 43 सीटों पर सिमटना कोई साधारण घटना नहीं है। जिस नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा जिताऊ चेहरा माना जा रहा था उनकी पार्टी आधी से अधिक सीटों हार गयी। 115 सीटों पर लड़ने वाले जदयू के सिर्फ 43 उम्मीदवार जीते। न नाम काम आया न काम। नीतीश कुमार की वर्षों से बनायी छवि खंड-खंड हो गयी। आज उन्हें भाजपा की इनायत पर राजनीति करनी पड़ रही है। ये बात जदयू को दिल से मंजूर नहीं। हालात बदलने के लिए जदयू के नीति निर्माता साम, दाम, दंड, भेद की नीति पर चलने लगे हैं। चिराग को दर-बदर कर लोजपा को अपने प्रभाव में लेना इसी रणनीति का हिस्सा है। यह रणनीति भाजपा के लिए एक चेतावनी भी है।

चिराग के अकेले लड़ने का फायदा तो भाजपा को मिला
बिहार चुनाव में लोजपा का जदयू के खिलाफ चुनाव लड़ना चिराग पासवान की नकारात्मक राजनीति थी। लेकिन इसका फायदा किसे मिला ? जाहिर है भाजपा को मिला। बिहार में अगर भाजपा जदयू का बड़ा भाई बनी तो यह चिराग पासवान की वजह से ही मुमकिन हुआ। उस समय तो ये आरोप लगाया जाता था कि भाजपा के इशारे पर ही चिराग ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोला था क्योंकि भाजपा नीतीश को बिहार में कमजोर होते देखना चाहती थी। बिहार चुनाव में भाजपा के नेता चिराग के खिलाफ बयान देते रहे लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक शब्द भी नहीं कहा, आखिर क्यों ? कहा जाता है कि बिहार में सरकार बनाने की मजबूरी में भाजपा ने जदयू के सामने हथियार डाल दिये वर्ना दिल से वह चिराग के साथ थी।

भाजपा के सपनों का क्या होगा ?
2025 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा बड़े-बड़े सपने बुन रही है। उसका सपना है कि बिहार में पहली बार भाजपा का कोई नेता सीएम की कुर्सी पर बैठे। यह तभी संभव है जब भाजपा की स्थिति जदयू और राजद से मजबूत रहे। अगर मौजूदा घटनाक्रम को छोड़ दें तो चिराग पासवान नरेन्द्र मोदी के लिए आदर और समर्पण दिखाते रहे हैं। वे भाजपा के लिए स्वभाविक सहयोगी हो सकते थे। लेकिन भाजपा ने चिराग के खिलाफ विद्रोह को मौन समर्थन दे कर अपनी उम्मीदों की राह में खुद ही कांटे बिछा लिये। जदयू के दबाव में ही भाजपा ने चिराग पासवान को केन्द्रीय मंत्री बनाने का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया था। रामविलास पासवान के निधन के बाद खाली हुई राज्यसभा सीट भी चिराग पासवान की मां को नहीं दिया गया। और तो और जब जदयू के नेताओं ने लोजपा में तोड़फोड़ की जमीन तैयार की तो भाजपा भी परोक्ष रूप से इसमें शामिल हो गयी। बिहार में भाजपा की भावी राजनीति के लिए कौन ज्यादा भरोसेमंद और मुफीद है ? पशुपति कुमार पारस या चिराग पासवान ? नीतीश कुमार अपने राजनीतिक हित के लिए कभी भी भाजपा को कुर्बान कर सकते हैं। ऐसा किया भी है। चिराग समर्थकों का कहना है कि अगर नीतीश कुमार के इशारे पर पारस लोजपा तोड़ सकते हैं तो क्या 2025 में वे एनडीए नहीं छोड़ सकते ?

किस राह जाएंगे पासवान वोटर ?
बिहार में जाति आधारित राजनीतिक की कुछ कड़वी सच्चाइयां भी हैं। अनुसूचित जाति में पासवान समुदाय की प्रभावशाली स्थिति है। यह समुदाय रामविलास पासवान के साथ मुस्तैदी से खड़ा रहा है। चिराग की नेतृत्व क्षमता पर बेशक सवाल उठाया जा सकता है। लेकिन जिस तरह से उन्हें दूध में गिरी मक्खी की तरह बाहर फेंका गया, ये बात रामविलास समर्थकों को पसंद नहीं आयी है। लोजपा का बिहार विधानसभा चुनाव में भले खराब प्रदर्शन रहा है लेकिन उसे चार से छह प्रतिशत के बीच मत मिलते रहे हैं। 2020 के चुनाव में लोजपा को 134 सीटों में से सिर्फ एक सीट पर जीत मिली लेकिन उसे 5.66 फीसदी वोट हासिल हुए थे। विधानसभा चुनाव में पांच प्रतिशत मतों की हेरफेर से बहुत बड़ा फर्क पड़ सकता है। जदयू ने इस बात को अच्छी तरह से महसूस कर लिया। चिराग के मामले में भाजपा की चुप्पी उनके समर्थकों को अखर रही है। चिराग समर्थक ये मान रहे हैं कि भाजपा ने नीतीश कुमार को बैलेंस करने के लिए चिराग का इस्तेमाल किया और जब मतलब सध गया तो दरकिनार कर दिय। चिराग समर्थक, लोजपा में हुई टूट के लिए जदयू और भाजपा को जिम्मेदार मान रहे हैं। चूंकि चिराग लोजपा की स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ रहे हैं इसलिए जमीनी कार्यकर्ता उनका समर्थन कर रहे हैं। अगर ये पांच प्रतिशत मत चिराग के साथ एकजुट रहा तो कम से कम बिहार के चुनाव में उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।












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