बिहार में नीतीश सरकार को समर्थन देने वाले 3 राजद विधायकों का क्या होगा?
बिहार विधानसभा में सोमवार को नीतीश कुमार सरकार को विश्वास मत के दौरान संख्या से ज्यादा विधायकों का समर्थन मिला। इसकी वजह ये रही कि राजद के तीन विधायकों ने पाला बदलकर सत्तापक्ष की ओर अपनी वफादारी शिफ्ट कर ली।
राजद के इन तीनों विधायकों में मोकामा के पूर्व बाहुबली विधायक अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी, डीएम कृष्णैया हत्याकांड में सजायाफ्ता रहे आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद और सूर्यगढ़ा के एमएलए प्रह्लाद यादव पर अब पार्टी व्हिप के उल्लंघन के आरोपों की वजह से सदस्यता जाने की तलवार लटक सकती है।

राजद के तीनों विधायकों के खिलाफ पार्टी में भारी आक्रोश
हालांकि, अभी आरजेडी की ओर से औपचारिक तौर पर अपने तीनों विधायकों के खिलाफ किसी ऐक्शन लेने की बात सामने नहीं आई है। लेकिन, तेजस्वी यादव की पार्टी में इन तीनों के लिए काफी आक्रोश है और सहयोगी कांग्रेस भी बहुत ज्यादा मुखर हो रही है।
क्या है दल-बदल विरोधी कानून?
संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) में राजनीतिक दलों को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह अपने विधायकों या सांसदों को व्हिप जारी कर सकता है।
व्हिप क्या है?
व्हिप किसी राजनीतिक पार्टी की ओर से अपने सदस्यों के लिए जारी वह लिखित आदेश है, जिसमें उनसे किसी विषय पर सदन में उपस्थित रहने या किसी विशेष विषय के पक्ष में या विपक्ष में वोट डालने या मतदान से अनुपस्थित रहने की पार्टी लाइन के हिसाब से निर्णय लेने को कहा जाता है।
पार्टी अपने जिस सदस्य को व्हिप जारी करने के लिए अधिकृत करती है, उसे चीफ-व्हिप कहा जाता है, जिसके नीचे कुछ अतिरिक्त व्हिप हो सकते हैं।
व्हिप का उल्लंघन दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आता है
अगर कोई सदस्य व्हिप के निर्देशों का उल्लंघन करता है तो वह दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आता है और उसकी सदन की सदस्यता खत्म हो सकती है।
कानून के जानकारों का क्या कहना है?
पटना हाई कोर्ट के वकील आदित्यनाथ झा ने कहा है कि मौजूदा केस में आरजेडी विधानसभा स्पीकर से व्हिप का उल्लंघन करने वाले तीनों सदस्यों की सदस्यता रद्द करने की मांग कर सकती है।
लेकिन, स्पीकर सत्तापक्ष के होते हैं इसलिए वह विपक्ष की मांग पर तुरंत फैसला नहीं लेकर इसे लंबित भी रख सकते हैं। लेकिन, यह तय है कि तीनों विधायकों की सदस्यता पर आखिरी फैसला स्पीकर को ही लेना होता है।
स्पीकर के फैसले में देरी होने पर कोर्ट जाने का है विकल्प
उन्होंने ये भी बताया कि अगर विधानसभा स्पीकर की ओर से फैसला लेने में बहुत देरी होती है तो राजद के पास अपने विधायकों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प मौजूद रहेगा।
लेकिन, बात फिर वहीं आ जाती है कि अदालतें इसमें खुद से कोई फैसला नहीं सुनाती और वह भी इसके लिए आखिरकार स्पीकर को ही निर्देश दे सकती हैं।
बिहार विधानसभा का चुनाव 2025 में होने हैं। ऐसे में लगता है कि औपचारिक शिकायत होने के बाद भी यह मामला लंबा खिंच सकता है।
महाराष्ट्र में शिवसेना के दोनों गुटों में भी व्हिप का विवाद सामने आया था। जिसपर स्पीकर का फैसला आते-आते डेढ़ साल से ज्यादा गुजर गए और वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट को स्पीकर को फैसला सुनाने की तारीख मुकर्रर करनी पड़ी।
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