नीतीश सरकार गिरेगी कैसे ? अगर मांझी-सहनी गये और कांग्रेस टूट गयी तो ?
पटना। जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी की लालू यादव से बात के बाद बिहार में राजनीति हलचल बढ़ गयी है। राजद ने तो ये चुनौती दे डाली है कि अगर एनडीए को सरकार बचाना है तो बचा ले। लेकिन नीतीश कुमार इन सब बातों से बेपरवाह हैं। वे 243 सदस्यों वाले सदन में 128 विधायकों के समर्थन से सरकार चल रहे हैं। क्या लालू यादव से मोबाइल पर बात कर लेने भर से मांझी और सहनी एनडीए छोड़ देंगे ? मांझी और सहनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा एक हद तक एनडीए में आने के बाद ही पूरी हुई हैं। जीतन राम मांझी बिहार में लंबे समय तक मंत्री रहे हैं। वे मुख्यमंत्री भी रहे। लेकिन उनके पुत्र संतोष कुमार सुमन को मंत्री बनने का मौका नीतीश सरकार में ही मिला है। पिछले सात साल से बिहार में राजनीतिक जमीन तलाश रहे मुकेश सहनी की राजनीतिक लालसा भी इसी सरकार में पूरी हुई। चुनाव हारने के बाद भी वे मंत्री बने। क्या ये दोनों नेता राजद के दिये घाव को भूल गये ? नीतीश सरकार को गिराने की बात अभी दूर की कौड़ी है। जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है, पिछले 15 साल में वे कभी विश्वास मत हारे नहीं हैं।
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नीतीश सरकर गिरेगी कैसे ? आंकड़ा 122 से कम होगा तभी न ? चूंकि अभी सारी परिकल्पनाएं अटकलों के आधार स्थापित की जा रही हैं। इसलिए अगर और मगर की भरपूर गुंजाइश है। होने के लिए कुछ भी हो सकता है। अगर जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी एनडीए छोड़ते हैं और इस बीच कांग्रेस टूट जाए तो क्या होगा ? जिस तरह से मध्य प्रदेश में कंग्रेस के 22 विधयकों ने इस्तीफा देकर सत्ता का समीकरण बदल दिया था अगर उसी तरह राजद के कुछ विधायकों ने 'सुंदर भविष्य' के लिए इस्तीफा दे दिया तो क्या नीतीश सरकर विश्वास मत हसिल न कर लेगी ? 2005 में सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार के सामने अभी तक केवल दो मौके आये हैं जब उन्हें विश्वास मत की अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा है। दोनों ही बार उन्होंने कामयाबी हासिल की। ये कामयाबी अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में हासिल की गयी थीं।
2013 में जीता विश्वास मत
2013 में जब नरेन्द्र मोदी भाजपा चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष बने तो नीतीश कुमार ने नाराजगी में भाजपा से नाता तोड़ लिया था। बिहार सरकार में शामिल भाजपा के मंत्रियों को अपमानजनक तरीके से हटा दिया गया। नीतीश सरकार अल्पमत में आ गयी क्योंकि उसके पास 117 विधायकों का ही समर्थन था। पांच विधायकों का और समर्थन चाहिए था। उन्होंने विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया। 20 जून 2013 को विश्वास प्रस्ताव पर मतविभाजन हुआ। मतविभाजन से पहले भाजपा के 91 सदस्यों ने सदन का बहिष्कार कर दिया। नीतीश सरकार ने 126 वोट हासिल कर विश्वास मत जीत लिय। उसे जदयू के 117, चार निर्दलीय और कांग्रेस के चार विधयकों का समर्थन मिला था।
2017 में भी मिली कामयाबी
इसी तरह जुलाई 2017 में राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी पलटीं कि सरकार का स्वरूप ही बदल गया। नीतीश कुमार ने राजद को सरकार से अलग कर भाजपा के साथ सरकार बना ली। नीतीश कुमार ने 2015 में राजद के साथ मिलकर ही चुनाव जीता था। इसलिए बदले हुए हालात में नीतीश कुमार को अपना बहुत दिखाना जरूरी हो गया। वे विधानसभा यह भी स्थापित करना चाहते थे कि उन्होंने सरकार के स्वरूप को बदलने का फैसला क्यों लिया ? 28 जुलाई 2017 को बिहार विधानसभा में विश्वास मत पर चर्चा के दौरान खूब हंगामा हुआ। नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव का नाम लिये बिना कहा, सेक्यूलरिज्म भष्टाचार छिपाने के लिए नहीं होता। मैंने बिहार के हित में ये फैसला लिया है। मतविभाजन हुआ तो नीतीश सरकार के पक्ष 131 वोट पड़े। विरोध में 108 मत मिले।
अतिमहत्वाकांक्षा की चुकानी पड़ सकती है कीमत
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बिहार में कुछ ऐसे नेता हैं जिन्हें अपनी अतिमहत्वाकांक्षा की कीमत चुकानी पड़ी है। जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा इनमें प्रमुख हैं। ये ज्यादा पाने के चक्कर में मूलधन भी गंवा बैठे। नीतीश कुमार ने 2014 के लोकसभा चुनाव में हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ दे दिया था। उन्होंने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था। ये बहुत बड़ा मौका था। वे बिहार के दूसरे दलित मुख्यमंत्री थे। सबको साथ लेकर चलते तो लंबी लकीर खींच सकते थे। लेकिन वे महत्वाकांक्षा का शिकार हो गये। जदयू का वास्तविक नेतृत्व नीतीश कुमार के पास था। लेकिन जीतन राम मांझी खुद की पहचान बनाने के लिए नीतीश कुमार की नीतियों से अलग फैसला लेने लगे।
नतीजा ये हुआ कि जीतन राम मांझी को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। जदयू से अलग होने के बाद वे एनडीए में आये। सबसे दलित के नेता के सवाल पर वे रामविलास पासवान से भिड़ गये। 2015 के विधानसभा चुनाव में एनडीए में दबाव बना कर 21 सीटें ले तो लीं लेकिन जीते सिर्फ एक ही। मांझी दो सीटों में से एक पर चुनाव भी हारे। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय ज्यादा पाने की हसरत में राजद के सहयोगी बन गये। वहां भी दवाब बना कर तीन सीटें ली लेकिन एक में भी नहीं जीते। 2020 के विधानसभा चुनाव के समय फिर नीतीश कुमार का गुणगान कर एनडीए में आ गये। चार सीटें जीते। पुत्र को मंत्री बनवाया। अब पिछले कुछ समय से वे टेनिस की गेंद की तरह कभी इस कोर्ट में तो कभी उस कोर्ट में जा रहे हैं।
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