Bihar Politics: लालू यादव कैसे बने थे जनता दल के अध्यक्ष और फिर कैसे हटे ?
लालू यादव को संयोग से जनता दल अध्यक्ष का पद मिला था। लेकिन बाद में यह संयोग उनके लिए परेशानी का कारण बन गया। जनवरी 1996 में सीबीआइ ने हवाला कांड में चार्जशीट दाखिल की थी। इनमें भारत के कुल 25 नेता जांच के दायरे में थे। उस समय जनता दल के अध्यक्ष एसआर बोम्बई थे जिनका नाम हवाला मामले में आ चुका था। उसूलों की राजनीति के तहत बोम्बई ने जनता दल अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। तब 29 जनवरी 1996 को लालू यादव को जनता दल अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गयी। उस समय लालू यादव कहते थे, हवाला ने जनता दल को मेरे हवाले कर दिया। लालू यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे और 1996 में दोबारा जीत कर वे पिछड़े वर्ग के बड़े नेता बन चुके थे। लेकिन इसके बावजूद जनता दल के वरिष्ठ नेता बीजू पटनायक और रामकृष्ण हेगड़े लालू यादव को अध्यक्ष बनाये जाने से नाराज थे। उनका मानना था कि लालू यादव की राजनीतिक शैली राष्ट्रीय राजनीति के अनुरूप नहीं है।
1996 में जद के अध्यक्ष बने थे लालू यादव
लालू यादव जनवरी 1996 में जनता दल के अध्यक्ष बने। इसके बाद अप्रैल-मई 1996 में लोकसभा का चुनाव हुआ। इस चुनाव में जनता दल के 46 सांसद चुने गये। किसी दल को बहमुत नहीं मिला था। भाजपा 161 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। भाजपा के नेता अटल बिहारी बाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलायी गयी। लेकिन वे बहुमत साबित नहीं कर सके और 13 दिन के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। तब संयोग से जनता दल के एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी। चूंकि जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव थे इसलिए केन्द्र में उनकी भूमिका किंगमेकर की बन गयी। इससे लालू यादव का राष्ट्रीय महत्व बढ़ गया। लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ा कानूनी संकट उनका इंतजार कर रहा था। बिहार में चारा घोटला का मामला सामने आ चुका था। मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने चारा घोटला की जांच सीबीआइ से कराने का फैसला सुना दिया था।

लालू यादव पर जद अध्यक्ष पद छोड़ने का दबाव
23 जून 1997 को सीबीआइ ने चारा घोटला मामले में चार्जशीट दायर की थी। इसमें लालू यादव समेत 55 लोगों को आरोपी बनाया गया था। उस समय लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ जनता दल के अध्यक्ष भी थे। तब तक एचडी देवगौड़ा की जगह इंद्र कुमार गुजराल भारत के प्रधानमंत्री बन चुके थे। वे बिहार से ही राज्यसभा के सदस्य थे। इसलिए लालू यादव का उन पर ज्यादा प्रभाव था। जब लालू यादव का नाम चारा घोटला की चार्जशीट में आ गया तो जनता दल के वरिष्ठ नेता उन पर इस्तीफा देने का दबाव बनाने लगे। वे चाहते थे कि लालू यादव मुख्यमंत्री पद के साथ साथ जनता अध्यक्ष का पद भी छोड़ दें।
शरद यादव के स्टैंड से बढ़ी थी लालू की मुश्किल
इसी बीच जुलाई 1997 में जनता दल के अध्यक्ष पद के चुनाव का समय आ गया। आरोपी बनाये जाने के बाद लालू यादव को जनता दल अध्यक्ष पद से हटाने की कोशिश शुरू हो गयी। शरद यादव जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष थे। उन्होंने घोषणा कर दी कि वे अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ेंगे। जब कि लालू यादव अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहते थे और चुनाव के पक्ष में नहीं थे। लेकिन चुनाव की तैयारी शुरू हो गयी। लालू यादव ने जनता दल अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए अपने निकटतम सहयोगी रघुवंश प्रसाद सिंह को निर्वाचन अधिकारी नियुक्त कर दिया। लालू यादव के इस फैसले को शरद यादव ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। तब रघुवंश प्रसाद सिंह को हटा कर मधु दंडवते को निर्वाचन अधिकारी बनाया गया। मधु दंडवते के निर्वाचन अधिकारी बनते ही लालू यादव समझ गये कि अगर वे चुनाव लड़ेंगे तो हार जाएंगे। जनता दल कार्यकारिणी के अधिकर नेता उनके खिलाफ हो गये थे। सरकार के सहयोगी दलों के नेता (ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त, चंद्रबाबू नायडू) भी चाहते थे कि लालू यादव जनता दल के अध्यक्ष पद से हट जाएं। इससे सरकार की छवि धूमिल हो रही थी।
ऐसे टूटा जनता दल और बन गया राजद
तब लालू यादव समझ गये कि अब उनका जनता दल अध्यक्ष बने रहना मुमकिन नहीं है। 4 जुलाई 1997 को प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने अपने बंगले पर सभी सहयोगी दलों के नेताओं को रात्रिभोज पर बुलाया था। लालू यादव ने पीएम गुजराल से कहा कि अगर आप शरद यादव को चुनाव से हटने के लिए राजी कर लेते हैं तो सारी चीजें ठीक हो सकती है। तब मैं जनता दल नहीं तोड़ूंगा। लेकिन पीएम गुजराल ने ऐसा नहीं किया। अगले दिन इसका परिणाम सामने आ गया। 5 जुलाई 1997 को लालू यादव ने दिल्ली में 16 सांसदों के साथ अपने नये दल (राष्ट्रीय जनता दल) का एलान कर दिया। उस समय बिहार से जनता दल के 22 सांसद जीते थे। राज्यसभा के छह सांसद भी लालू यादव के समर्थन में आ गये। लालू यादव ने जनता दल तोड़ दिया था फिर भी उनके समर्थक मंत्री सरकार में बने रहे। उस समय केन्द्र सरकार इतनी मजबूर थी कि वे लालू समर्थक तीन मंत्रियों (रघुवंश प्रसाद सिंह, कांति सिंह और जयनारायण निषाद) को हटा नहीं सकी। खुद प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल को लालू यादव ने बिहार से ही राज्यसभा में भेजा था। इस हाल में कोई कैसे लालू यादव के समर्थकों को सरकार से बाहर कर सकता था।












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