Bihar में मुख्यमंत्री राज की कहानी: 17 चुनाव, 23 CM बदले, 'श्रीकृष्ण’ का 15 साल राज, Nitish की 10 बार ताजपोशी!
Bihar Politics CM Story: 15 अप्रैल 2026 को बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है, जब पहली बार राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। NDA के सहयोगी दल जेडीयू के नीतीश कुमार के इस्तीफे ने बीजेपी का सपना पूरा हुआ। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 243 में से 202 सीटों का भारी बहुमत मिला था, सिर्फ 5 महीने बाद सरकार बदल रही है।
यह बदलाव इसलिए भी खास है क्योंकि 2025 के चुनाव में NDA को भारी बहुमत मिला था, लेकिन कुछ ही महीनों बाद फिर से सत्ता का समीकरण बदल गया। यही वजह है कि बिहार की राजनीति को देश की सबसे अनप्रिडिक्टेबल पॉलिटिक्स यानी अप्रत्याशित राजनीति कहा जाता है।

बिहार ने आजादी के बाद से 17 विधानसभा चुनाव देखे, एक बार राष्ट्रपति शासन झेला और कुल 23 मुख्यमंत्रियों का शासन साक्षात् किया। इनमें सबसे लंबा राज श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू या बिहार केसरी) का रहा, लगभग 15 साल। सबसे छोटा बीपी मंडल का मात्र 1 महीना। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा वाले नाम नीतीश कुमार का रहा, जिन्होंने 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
यह कहानी सिर्फ नामों और तारीखों की नहीं, बल्कि बिहार की अस्थिरता, सत्ता के खेल, विकास के वादों और हकीकत के बीच की खाई की है। आइए विस्तार से समझते हैं कि बिहार का गठन, चुनावों का इतिहास, हर मुख्यमंत्री का राज और वह सवाल जो हर बिहारी पूछता है कि सरकारें क्यों बदलती रहती हैं, लेकिन लोगों की हालत क्यों नहीं सुधरती? अब इस पूरी कहानी को शुरू से समझते हैं, ताकि आपको साफ तस्वीर दिखे कि आखिर बिहार में इतने बदलाव क्यों होते रहे?
बिहार राज्य का गठन: एक ऐतिहासिक सफर
आधुनिक बिहार का गठन 22 मार्च 1912 को हुआ, जब ब्रिटिश सरकार ने इसे बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग किया। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ यह पूर्ण राज्य बना। 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग हो गया, जिससे बिहार का क्षेत्रफल और संसाधन दोनों कम हुए।
स्वतंत्रता के बाद बिहार कांग्रेस का गढ़ था। 1937 में पहली कांग्रेस सरकार बनी, जिसमें श्रीकृष्ण सिंह प्रीमियर बने। 1946 में वे फिर मुख्यमंत्री बने और 1961 तक (मृत्यु तक) पद पर रहे। यह दौर स्थिरता का था, जबकि बाद के दशकों में अस्थिरता ने बिहार को हिलाकर रख दिया।
17 चुनाव, बार-बार बदलती सरकारों की कहानी...
'बिहार केसरी' का दौर, जमींदारी प्रथा का अंत
इतिहास के इस लंबे सफर में बिहार ने कुल 17 विधानसभा चुनाव देखे हैं। इन चुनावों के दौरान एक बार राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इतने चुनावों के बीच राज्य में 23 अलग-अलग मुख्यमंत्री बने। अगर शुरुआती दौर की बात करें, तो उस समय राजनीति अपेक्षाकृत स्थिर थी। Sri Krishna Sinha, जिन्हें लोग 'श्री बाबू' या 'बिहार केसरी' के नाम से जानते हैं, उन्होंने करीब 15 साल तक लगातार शासन किया। आज तक कोई भी मुख्यमंत्री उनके इस रिकॉर्ड को नहीं तोड़ पाया है। उनका दौर इसलिए खास माना जाता है क्योंकि उस समय कई बड़े फैसले लिए गए, जैसे जमींदारी प्रथा का अंत।
यह वह समय था जब राजनीति में विचारधारा और जनसेवा ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती थी। लेकिन 1967 के बाद बिहार की राजनीति में अस्थिरता शुरू हो गई। कुछ ही सालों में कई मुख्यमंत्री बदले। यही वह दौर था जब गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ और सत्ता बार-बार बदलने लगी। इसी दौर में BP Mandal जैसे नेता भी मुख्यमंत्री बने, जिनका कार्यकाल सिर्फ लगभग एक महीने का रहा। यह आज भी बिहार के इतिहास का सबसे छोटा कार्यकाल माना जाता है।
1952 का पहला चुनाव कांग्रेस की भारी जीत के साथ खत्म हुआ। 2025 का 18वां चुनाव एनडीए की 202 सीटों की लैंडस्लाइड जीत के साथ। कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में दो बड़े दौर दिखते हैं। पहला- 1967-72 का 'मिश्रित' अराजक दौर और 2005 के बाद नीतीश का 'स्थिरता' वाला दौर, जिसमें भी वे 10 बार शपथ ले चुके।
लालू यादव की बिहार सत्ता में छाप, घोटालों की कहानी
1990 के बाद बिहार की राजनीति में जब लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) का उदय हुआ, तो उन्होंने सिर्फ सरकार नहीं चलाई, बल्कि पूरे राजनीतिक समीकरण बदल दिए। उन्होंने पिछड़े वर्गों और वंचित समाज को राजनीति के केंद्र में लाकर 'सामाजिक न्याय' की नई धारा शुरू की। यही वजह है कि उनका जनाधार काफी मजबूत रहा। उन्होंने करीब 7 साल तक सत्ता संभाली और सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत किया। लेकिन उनके कार्यकाल के साथ सबसे बड़ा विवाद जुड़ा रहा चारा घोटाले का। यह मामला पशुपालन विभाग से जुड़ा था, जिसमें सरकारी खजाने से फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपये निकाले गए। 1990 के दशक में सामने आए इस घोटाले ने पूरे देश का ध्यान खींचा और बिहार की राजनीति को हिला कर रख दिया।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे लालू यादव पर दबाव बढ़ता गया। आखिरकार 1997 में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी राबडी (Rabri Devi) को मुख्यमंत्री बनाया, जो उस समय राजनीति में एक अनोखा फैसला माना गया। बाद में अदालत ने लालू यादव को इस मामले में दोषी ठहराया। उन्हें जेल की सजा भी हुई और चुनाव लड़ने पर रोक लग गई। इसके बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ और आज भी बिहार की राजनीति में उनकी पकड़ देखी जा सकती है। लेकिन 2005 के बाद जो दौर शुरू हुआ, वह पूरी तरह से नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के नाम रहा। नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के सबसे अहम और चर्चित चेहरों में से एक बन गए।
नीतीश कुमार की एंट्री, 'पलटूराम' का खिताब
बिहार की राजनीति के नीतीश कुमार ऐसे नेता हैं, जिनका सफर जितना लंबा है, उतना ही उतार-चढ़ाव भरा भी है। 2005 से 2026 तक उन्होंने कुल 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है, जो अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है। लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि ये 10 बार की शपथ 10 अलग-अलग पूरे कार्यकाल नहीं हैं। कई बार उन्होंने खुद इस्तीफा दिया, कभी गठबंधन बदला, तो कभी राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें दोबारा शपथ लेने पर मजबूर किया।
उनका पहला बड़ा मोड़ 2005 में आया, जब उन्होंने बिहार की सत्ता संभाली और 'सुशासन' का नारा दिया। इसके बाद 2010 में NDA के साथ भारी बहुमत लेकर वापसी की और उनकी छवि एक मजबूत प्रशासक की बनी। 2014 में लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद, उन्होंने हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया और जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन 2015 में फिर खुद सत्ता में लौट आए। इसी साल उन्होंने लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव जीता। 2017 में उन्होंने अचानक गठबंधन बदलते हुए बीजेपी के साथ सरकार बना ली। फिर 2020 में NDA के साथ चुनाव जीतकर सत्ता में बने रहे।
इसके बाद 2022 में उन्होंने बीजेपी का साथ छोड़कर तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के साथ नई सरकार बनाई। लेकिन 2024 में फिर से NDA में वापसी कर ली और एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। 2025 में NDA की बड़ी जीत के बाद उन्होंने 10वीं बार शपथ ली, लेकिन 14 अप्रैल 2026 को उन्होंने पद छोड़ दिया, जिससे बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया। यही वजह है कि नीतीश कुमार को 'किंग ऑफ कॉम्बिनेशन' और 'पलटूराम' जैसे नामों से भी जाना जाता है। बार-बार गठबंधन बदलने के बावजूद उनकी सबसे बड़ी ताकत यही रही कि वे हर बार सत्ता में वापसी करने में सफल रहे।
क्या बिहार में हर साल मुख्यमंत्री बदलते हैं?
नहीं। यह सिर्फ एक मिथक है। दरअसल, मुख्यमंत्री का कार्यकाल 5 साल का होता है, लेकिन अगर सरकार गिर जाए, गठबंधन टूट जाए या बहुमत बदल जाए, तो मुख्यमंत्री बदल सकता है। बिहार में 1967-1972 और 2013-2024 के बीच यही स्थिति ज्यादा देखने को मिली।
बिहार के 23 मुख्यमंत्रियों की पूरी सूची (1946-2026)

महत्वपूर्ण आंकड़े
- कुल मुख्यमंत्री (व्यक्ति): 23
- सबसे लंबा कार्यकाल: श्रीकृष्ण सिंह ( लगातार 15 साल)
- दूसरे नंबर: नीतीश कुमार (कुल 20 साल, 10 शपथें, पलटूराम)
- सबसे छोटा: दीप नारायण सिंह 1961 (कार्यवाहक-17 दिन), सतीश प्रसाद सिंह (कुछ दिन), बीपी मंडल (30 दिन)
'श्रीकृष्ण' सिंह: बिहार केसरी का 15 साल का सुनहरा राज
श्रीकृष्ण सिंह (21 अक्टूबर 1887 - 31 जनवरी 1961), जिन्हें श्री बाबू या बिहार केसरी कहा जाता है, बिहार के पहले और सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। 1937 में कांग्रेस की पहली सरकार से लेकर 1961 में अपनी मृत्यु तक (द्वितीय विश्व युद्ध को छोड़कर) वे पद पर रहे। उनकी उपलब्धियां अविस्मरणीय हैं।
जैसे देश में सबसे पहले जमींदारी प्रथा समाप्त की, देवघर के बैद्यनाथ धाम में दलितों का प्रवेश कराया, कोसी, गंडक जैसी नदियों पर बांध बनवाए, शिक्षा और स्वास्थ्य पर जोर दिया। नेहरू के साथ उनके पत्राचार में केंद्र-राज्य संबंध, शिक्षा और लोकतंत्र की नींव पर गहन चर्चा हुई। उन्होंने 17,000 किताबों का निजी संग्रह मुंगेर के पुस्तकालय को दान कर दिया। उनकी 'शेर जैसी गर्जना' वाली जनसभाएं आज भी याद की जाती हैं। श्रीकृष्ण सिंह ने बिहार को आधुनिक बनाने की नींव रखी, जो बाद की अस्थिरता में खो गई।
सबसे छोटा कार्यकाल: सतीश प्रसाद सिंह (कुछ दिन), बीपी मंडल (1968)
बाबू बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल उत्तरी बिहार के यादव जमींदार परिवार से थे। 1 फरवरी 1968 को सातवें CM बने, लेकिन 30 दिन बाद इस्तीफा दे दिया। बाद में वे मंडल आयोग के अध्यक्ष बने, जिसने OBC आरक्षण की नींव रखी और भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।
सरकारें बदलीं, लेकिन लोगों की हालत नहीं सुधरी
आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार:
- प्रति व्यक्ति आय: ₹76,490 सालाना (महीने के ₹6,374), देश में सबसे कम।
- राज्य पर कर्ज: ₹3,74,134 करोड़ (GSDP का 37.7%)।
- 30% बच्चे 9-10वीं में पढ़ाई छोड़ देते हैं, देश में सबसे ज्यादा।
- टीचर-स्टूडेंट रेशियो: 1:38।
- स्वास्थ्य: 1 लाख पर 1 डॉक्टर, 21 बेड।
- PLFS 2023-24: हर साल 30 लाख मजदूर दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाते हैं।
- विनिर्माण में बिहार का योगदान लगभग शून्य।
नेताओं की संपत्ति 21 गुना बढ़ी
- नीतीश कुमार: 2015 में ₹58.97 लाख से 2025 में ₹1.65 करोड़।
- तेजस्वी यादव: ₹1.18 करोड़ से ₹8.98 करोड़ (8 गुना)।
- सम्राट चौधरी: ₹30 लाख से ₹6.38 करोड़ (21 गुना)।
- अशोक चौधरी: 10 साल में 42 गुना बढ़ोतरी।
बिहार की कहानी अभी खत्म नहीं हुई। यह नया अध्याय है 2026 का। क्या BJP स्थिरता और विकास ला पाएगी? या फिर पुराना चक्र दोहराएगा? समय बताएगा।
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