Bihar Political Crisis: गिरगिट, पलटूराम, सुशासन बाबू...कैसे मिले नीतीश कुमार को इतने नाम? डिटेल स्टोरी

Bihar Political Crisis: नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने रविवार 28 जनवरी 2024 को 9वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे महागठबंधन से नाता तोड़ फिर से एनडीए (NDA) में शामिल हो गए। वे बिहार के अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने इतनी बार सीएम पद की शपथ ली हो। साथ ही वे प्रदेश के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले शख्स भी बन गए हैं।

नीतीश से पहले कृष्ण सिन्हा सबसे लंबे समय करीब 13 साल तक सीएम रहे। नीतीश कुमार सियासत के वो चाणक्य हैं, जो सत्ता को आसानी से हाथ से जाने नहीं देते। बिहार की राजनीति में कुछ भी हो मुख्यमंत्री वही रहते हैं और पूरा का पूरा विपक्ष बदल जाता है। इसलिए कोई उन्हें कुर्सी कुमार कहता है को कोई पलटूराम, कोई गिरगिट तो कोई सुशासन बाबू... लेकिन नीतीश कुमार को ये नाम कैसे मिले इसकी कहानी भी बेहद दिलचस्प है।

Nitish Kumar

क्या है सुशासन बाबू के पीछे की कहानी?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विपक्ष अभी पलटूराम, गिरगिट, आया राम गया राम जैसे नामों से पुकार रहा है। लेकिन, इन नामों के बीच में एक नाम ऐसा भी था, जो 2024 से पहले नीतीश की छवि को मजबूती से सबके सामने रखता था.... और वो नाम है 'सुशासन बाबू'...वे बिहार के सुशासन बाबू कहे जाने लगे। जिस बिहार पर जंगलराज का आरोप लगता था, उसकी तस्वीर 2000 के दशक के बाद से बदलने में नीतीश कुमार काफी हद तक कामयाब रहे हैं। जहां दूसरे बड़े नेता अपने परिवार के लोगों को राजनीति में खींचकर लाने में व्यस्त थे, नीतीश कुमार का परिवार कभी सामने ही नहीं आया। वे बेहतर प्रशासन पर ध्यान देते थे। यही कारण है की लोग उन्हें सुशासन बाबू कहने लगे थे।


साल 1951 में पटना के बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार उन नेताओं में से एक है जो जेपी आंदोलन के बाद उभरे... उन्होंने जेपी से राजनीति सीखी। साल 1985 में उन्होंने लोकदल के टिकट पर लड़ते हुए हरनौत से अपना पहला विधानसभा चुनाव जीता। पांच साल बाद वह सांसद बनकर दिल्ली चले गए। 90 के दशक की शुरुआत में मंडल कमीशन ने बिहार की राजनीति बदल दी। बिहार में नई पीढ़ी के नेता पैदा हुए, जिनमें नीतीश बड़े नाम थे। उस समय जनता दल की कमान जहां लालू संभाल रहे थे तो वहीं नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया जिसे अब जेडीयू के नाम से जाना जाता है। साल 2000 में सात दिनों के लिए वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन, 2005 में बीजेपी के साथ गठबंधन में राज्य के प्रमुख के रूप में अपना पहला पूर्ण कार्यकाल संभाला।

सुशासन बाबू से पलटूराम बने
नीतीश कुमार की राजनीतिक सफर में सब कुछ सही चल रहा था। लेकिन, 2014 में नरेंद्र मोदी के उदय ने उनकी सियासी सफर में भूचाल ला दिया। 2014 का चुनाव हुआ, तो उनकी पार्टी ने 40 में से केवल 2 सीटें जीतीं और उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। नरेंद्र मोदी की उग्र हिंदुत्व की राजनीति से खुद को दूर रखना चाहते थे। उन्हें मोदी के साथ गठबंधन पर ऐतराज था। नीतीश नहीं चाहते थे बड़े मंचों पर मोदी उनके करीब भी आएं। वे अपने मुस्लिम वोट बैंक को हर्ट नहीं करना चाहते थे। बीजेपी में आडवाणी और अटल युग समाप्त हो गया था। नरेंद्र मोदी युग में नीतीश डगमगा गए और यहां से शुरू हुआ सुशासन बाबू के पलटूराम और गिरगिट बनने तक का सफर।

पलटूराम से गिरगिट
जिस लालू के विरोध की राजनीति शुरू कर वह सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे, उन्हीं की पार्टी में वे कई दफे जा चुके हैं. जब बीजेपी से रूठते हैं, तो उन्हें लालू परिवार नजर आता है, जब लालू परिवार से बात बिगड़ती है, तो वे पुराने सहयोगी बीजेपी का हाथ थामते हैं। कांग्रेस उन्हें पलटूराम कहती है, वहीं आरजेडी के नेता उन्हें गिरगिट बुलाते हैं। इन सब टैग के बीच, उन्हें करीब डेढ़ दशक से मुख्यमंत्री की कुर्सी को अपने हाथ से जाने नहीं दिया। जिसके कारण नीतीश के विरोधी उन्हें कुर्सी कुमार भी बुलाने लगे।


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