अपराध और राजनीति का गजब का कॉम्बिनेशन! PhD होल्डर है बिहार का ये बाहुबली, बेटा उतर रहा अब चुनाव मैदान में
Bihar Elections 2025: बिहार की राजनीति में अपराध और राजनीति का मिलाजुला स्वरूप कोई नई बात नहीं है। लेकिन भोजपुर के नेता सुनील पांडे ने इसे एक अलग ही आयाम दिया। चार बार विधायक रहे पांडे को सिर्फ उनके राजनीतिक सफर के लिए नहीं बल्कि उनके विवादास्पद कृत्यों और अपराध की दुनिया से जुड़े होने के लिए भी जाना गया। एक समय जब वे पुलिस से छिपकर अपना जीवन जी रहे थे, उसी दौरान उन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाई।
डॉ. पांडे न सिर्फ एक मजबूत नेता थे बल्कि पढ़ाई में भी पीछे नहीं थे। उन्होंने एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल की, साथ ही कानून की पढ़ाई भी की। उनकी जिंदगी में अपराध, सत्ता और राजनीति का ऐसा संगम देखने को मिला, जो बिहार के राजनीतिक इतिहास में शायद ही किसी और ने किया हो। अब जब सुनील पांडे राजनीति से संन्यास ले चुके हैं, उनके बेटे विशाल प्रशांत ने उनके राजनीतिक नक्शे को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली है।

सुनील पांडे का प्रारंभिक जीवन और पढ़ाई
सुनील पांडे का जन्म रोहतास जिले में नरेंद्र पांडे के नाम से हुआ। उनके पिता, कामेश्वर पांडे, ठेकेदारी करते थे और क्षेत्र में उनकी अच्छी पकड़ थी। पांडे ने रोहतास से स्कूली पढ़ाई पूरी की और फिर इंजीनियरिंग के लिए बेंगलुरु गए। बीच में पढ़ाई छोड़कर वे घर लौट आए और बाद में पढ़ाई फिर से शुरू की। इसके बाद उन्होंने अररा की स्थानीय यूनिवर्सिटी से एमए और फिर पीएचडी पूरी की। उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की थी।
तीन बार विधायक रहे सुनील पांडे
पांडे की पहचान पहली बार तब हुई जब उन्हें अपने रूममेट शिलु मियां की हत्या के आरोप में पकड़ा गया। इस चर्चा का फायदा उठाकर उन्होंने राजनीतिक दुनिया में कदम रखा। 2000 तक वे पुलिस से छिपकर रहते थे। फिर समता पार्टी ने उन्हें पिरो विधानसभा से उम्मीदवार बनाया और वे जीत गए।
2005 में उन्होंने जेडीयू से फिर से पिरो से चुनाव जीता। पिरो विधानसभा 2008 में खत्म हो गई और नई सीट तारारी बनी। 2010 में उन्होंने तारारी सीट से तीसरी बार जीत दर्ज की। 2015 में उन्होंने अपनी पत्नी गीता पांडे को एलजेपी से उम्मीदवार बनाया, लेकिन वह हार गई।
पांडे ने अपने राजनीतिक करियर में सात बार पार्टी बदली, जिसमें जेडीयू, समता पार्टी और एलजेपी शामिल हैं।
अपराध की दुनिया से रहा है सुनील पांडे का नाता
पांडे का जीवन ज्यादातर जेल में या पुलिस से छिपकर बीता। उन पर हत्या, अपहरण और जबरन वसूली जैसे कई मामलों के आरोप लगे। वे मुख़्तार अंसारी की हत्या का 'सुपारी' देने के आरोप में भी चर्चा में रहे। पांडे का नाम रणवीर सेना से भी जुड़ा।
वे सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया के करीब माने जाते थे, लेकिन 1997 में उनके एक रिश्तेदार की हत्या के बाद दोनों आमने-सामने आ गए। 2012 में मुखिया की हत्या हुई, पांडे इस मामले में भी चर्चा में आए, लेकिन सबूतों की कमी के कारण उन्हें बरी कर दिया गया। अररा सिविल कोर्ट बम ब्लास्ट और पत्रकार को होटल में धमकी देने जैसे मामले भी उनके नाम जुड़े।
बेटे को सौंपा राजनीतिक विरासत का दायित्व
अब सुनील पांडे राजनीति से संन्यास ले चुके हैं। उन्होंने अपने बेटे विशाल प्रशांत को तारारी सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ाने का मौका दिया। 2024 के उपचुनाव में विशाल प्रशांत ने यह सीट जीत ली और अब 2025 विधानसभा चुनाव में दूसरी बार जीत के लिए तैयार हैं। सुनील पांडे का राजनीतिक सफर विवादों और जीत की मिसाल रहा, और अब उनका उत्तराधिकारी उनके राजनीतिक नक्शे को आगे बढ़ा रहा है।
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