BIHAR ELECTIONS 2020 : दो यादव घराने हुए राजद से अलग, क्या ‘माई’ का ‘वाई’ और बिखरेगा ?

क्या 2020 के चुनाव में राजद के यादव वोट बैंक में और बिखराव होगा ? लालू यादव से पहले बिहार में यादवों के दो बड़े नेता थे। रामलखन सिंह यादव और दारोगा प्रसाद राय। बिहार में पिछड़ों को एकजुट करने और सवर्ण राजनीति को चुनौती देने वाले पहले नेता रामलखन सिंह यादव ही थे। जब कि दारोगा प्रसाद राय बिहार के दूसरे यादव मुख्यमंत्री थे। दारोगा प्रसाद राय के पुत्र चंद्रिका राय और रामलखन सिंह यादव के पौत्र जयवर्धन यादव ने राजद का दामन झटक कर जदयू के तीर को थाम लिया है। जो यादव वोट बैंक कभी लालू यादव की ताकत का मूल आधार था अब उसमें धीरे-धीरे कमी आ रही है। क्या Bihar assembly elections 2020 में राजद को यादव मतों का और नुकसान उठाना पड़ेगा ? दरअसल पिछले पांच-छह साल के दौरान बिहार का मतदान आचरण तेजी से बदला है। सामाजिक-आर्थिक प्रगति ने यादव समुदाय की सोच को एक हद तक नये सांचे में ढाला है। पढ़ा-लिखा नौजवान तबका अब उस तरह नहीं सोचता जैसा कि 1990 के दशक में उनसे परिजन सोचते थे। पिछड़ी जाति की राजनीति में यादव बनाम गैरयादव के ध्रवीकरण से भी स्थिति बदली है। अगर यादव राजनीति के दो बड़े घरानों ने राजद का साथ छोड़ा है तो यह मिशन 2020 के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

पहले से ही छिटक रहा लालू का यादव वोट
1995 में लालू यादव का रुतबा बुलंदी पर था और यादव राजनीति अपनी सबसे बड़ी ऊंचाई को छू रही थी। 1995 के विधानसभा चुनाव में कुल 86 यादव विधायक जीत कर आये थे। लेकिन धीरे-धीरे यादव विधायकों की संख्या में कमी आने लगी। 2010 के विधानसभा चुनाव में केवल 39 यादव विधायक ही जीते थे। यादव मतदाताओं की सोच बदलती जा रही थी। वे गुण दोष के आधार पर राजद के अलावा दूसरे दलों को वोट करने लगे थे। 2015 में लालू नीतीश के एक होने के बाद एक बार फिर यादव विधायकों की संख्या बढ़ी। 2015 में कुल 61 यादव विधायक चुने गये थे जिसमें से 42 राजद के थे। यानी 19 यादव विधायक दूसरे दलों से चुने गये थे। यह मिथक टूट रहा है कि यादव केवल राजद को वोट करते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में यादवों के गढ़ मधेपुरा में राजद को हार का सामना करना पड़ा था। बिहार के चर्चित नेता पप्पू यादव खुद को लालू के बाद यादवों का दूसरा सबसा बड़ा नेता मानते हैं। मधेपुरा एक तरह से उनका किला था। पप्पू यादव सीटिंग सांसद थे और उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था। लेकिन यादव वोटरों ने राजद और पप्पू यादव, दोनों को नकार कर नीतीश की पार्टी को जिता दिया था। यहां तक राजद छपरा में लालू की परम्परागत सीट भी नहीं बचा सका। चंद्रिका राय केवल यादव नेता ही नहीं बल्कि लालू के संबंधी भी हैं। दोनों परिवारों का घरेलू विवाद चुनाव को प्रभावित करेगा। जयवर्धन यादव जरूर पहली बार विधायक बने हैं लेकिन वे भी अपने दादा का कार्ड खेल सकते हैं। रामलखन सिंह यादव ने कभी लालू यादव सबसे बड़ा यादव विरोधी बताया था।

लालू यादव और रामलखन सिंह यादव
रामलखन सिंह यादव ही वह नेता थे जिन्होंने बिहार में सबसे पहले पिछड़ावाद का परचम लहराया था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। आजादी के बाद वे कांग्रेस के बड़े नेता हुए। वे छह बार विधायक रहे। बिहार सरकार में मंत्री रहे। उस समय वे बिहार में यादवों के सबसे बड़े नेता थे। लालू यादव ने कभी उनसे राजनीति का ककहरा सीखा था। 1971 में जब लालू यादव छात्र राजनीति में पांव जमा रहे थे उस समय भी रामलखन सिंह यादव बिहार के मंत्री थे। आरोप है कि रामलखन सिंह यादव ने 1974 के छात्र आंदोलन को बेअसर करने के लिए लालू यादव का सहारा लिया था। बिहार के प्रसिद्ध पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘बंधु बिहारी' में नरेन्द्र सिंह के हवाले से इसके संबंध में लिखा है- लालू यादव की पहचान एक छात्र नेता के रूप में बन चुकी थी। कांग्रेस के मंत्री रामलखन सिंह यादव अपने स्वजातीय छात्र नेता Lalu yadav से मिलना चाहते थे। वे देखना चाहते थे कि कैंपस में भीड़ जुटाने वाला ये छात्र नेता आखिर है कैसा। बुलावा आने पर एक दिन लालू यादव, रामलखन सिंह यादव से मिलने गये। उनमें बात हुई। लेकिन क्या बात हुई लालू ने इसको सार्वजनिक नहीं किया। कुछ दिनों के बाद पता चल गया कि इन दोनों में क्या बात हुई थी। विरोध प्रदर्शन के कारण छात्र आंदोलन उग्र हो रहा था। पुलिस छात्र नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए छापा मारने लगी थी। उस समय नरेद्र सिंह और लालू यादव में गहरी दोस्ती थी। एक दिन जब उन्हें भनक लगी कि पुलिस आ रही है तो दोनों भाग कर अलग अलग जगहों पर छिप गये। लेकिन रात होते-होते पुलिस ने नरेन्द्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया। बाद में एक पुलिस वाले ने नरेन्द्र सिंह को बताया कि उनके दोस्त लालू यादव के बताने पर उनकी गिरफ्तारी हुई थी। तब नरेन्द्र सिंह की समझ में आया कि रामलखन सिंह यादव ने लालू यादव को भेदिया के रूप में काम करने का प्रस्ताव दिया था।

रामलखन सिंह का लालू से विरोध
1990 में जब कांग्रेस का पतन हुआ तो रामलखन सिंह यादव जनता दल में शामिल हो गये। 1991 के लोकसभा चुनाव में वे जनता दल के टिकट पर आरा लोकसभा सीट से चुने गये। 1991 में जनता दल के 56 सांसद चुने गये थे। 28 बिहार से, 22 उत्तर प्रदेश से और 6 ओडिशा से। 1991 में कांग्रेस को 252 सीटें मिलीं मिली थीं। नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की अलपमत सरकार बनी। 1992 में जनता दल में अजीत सिंह और वीपी सिंह के बीच जब झगड़ा चरम पर पहुंच गया तो अजीत सिंह ने 20 सांसदों के साथ एक अलग गुट बना लिया। इस गुट में कई निलंबित सांसद थे। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने 20 सांसदों वाले अजीत सिंह गुट को मान्यता भी दे दी। जनता दल ए के रूप में उनके अलग बैठने की व्यवस्था भी हो गयी। रामलखन सिंह यादव अजीत सिंह गुट में थे। तब उन्होंने लालू की कोई परवाह नहीं की थी। 28 जुलाई 1993 को लोकसभा में नरसिम्हा राव सरकार के खिलाफ अविश्वास मत पर वोटिंग होनी थी। राव सरकार को बचाने के लिए रामलखन सिंह यादव समेत अजीत गुट के सात सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट दे कर राव सरकार को बचा लिया। इसके इनाम में रामलखन सिंह यादव राव सरकार में मंत्री बनाये गये। इसके बाद लालू यादव और रामलखन सिंह यादव में ठनी रही। 2004 में रामलखन सिंह यादव ने कहा था कि लालू यादव के राज में सबसे अधिक नुकसान यादवों का हुआ है। लालू ने यादवों के नाम पर सिर्फ अपना भला किया है।

दारोगा प्रसाद राय ने कभी की थी लालू की मदद
दारोगा प्रसाद राय कांग्रेस के बड़े नेता थे। वे फरवरी 1970 से लेकर दिसम्बर 1970 तक बिहार के मुख्यमंत्री थे। इसी समय लालू यादव पटना विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में पांव जमाने की कोशिश कर रहे थे। दारोगा प्रसाद राय छपरा (सारण) जिले के रहने वाले थे और लालू यादव पड़ोस के गोपालगंज जिले के। ऊपर से स्वजातीय थे। कहा जाता है कि जब लालू यादव पटना विश्वविद्यालय में थे तब वे मार्गदर्शन के लिए दारोगा प्रसाद राय से मिलने के लिए जाया करते थे। दारोगा राय हर तरह से लालू की मदद करते थे। लेकिन लालू यादव ने कभी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार नहीं किया था। बाद में लालू कांग्रेस विरोधी राजनीति का हिस्सा बने। 1981 में दारोगा प्रसाद राय के निधन के बाद 1985 में उनके पुत्र चंद्रिका राय ने उनकी राजनीति विरासत संभाली। वे अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र परसा से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गये। उस समय लालू भी केवल विधायक थे। चंद्रिका राय को तब लालू के नाम की जरूरत नहीं थी। 1990 में उन्होंने अपने दम पर परसा से विधानसभा का चुनाव जीता। वे कांग्रेस छोड़ कर निर्दलीय लड़े और विजयी रहे। 1990 में लालू अल्पमत सरकार के मुख्यमंत्री बने थे। उन्हें निर्दलीय और अन्य विधायकों की मदद की जरूरत थी। इस जरूरत ने लालू यादव और चंद्रिका राय को नजदीक कर दिया। बाद में वे राजद में आ गये और बिहार के मंत्री भी रहे। अब वे लालू के खिलाफ हैं और नीतीश के साथ हैं। चंद्रिका राय यादवों के नेता तो हैं ही, अगर उनकी पुत्री और लालू यादव की बहू ऐश्वर्या ने Bihar assembly elections 2020 लड़ने का फैसला कर लिया तो ‘माई का वाई' कोई बड़ा गुल खिला सकता है।












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