Bihar Election 2025 Phase 1: जाति समीकरण और योजनाओं का जादू, बिहार की सियासत में कौन चलाएगा असली पासा?
Bihar Election 2025 Phase 1 (Caste equations): बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण की वोटिंग ने यह साफ कर दिया है कि राज्य की राजनीति अब भी दो मजबूत स्तंभों जाति और कल्याणकारी योजनाओं पर टिकी है। गया, दरभंगा, मधुबनी, और सीवान से लेकर सीमांचल तक, हर इलाके में मतदाताओं की पसंद इन्हीं दो मुद्दों से तय होती दिख रही है।
गया जिले के खिजरसराय में एक फोटोकॉपी की दुकान पर लोगों की भीड़ लगी थी। कोई अपने पुराने वोटर कार्ड की कॉपी निकलवा रहा था तो कोई नए स्कीम के लिए आवेदन की तैयारी कर रहा था। यही तस्वीर बताती है कि बिहार में चुनाव का मूड योजनाओं और जातीय समीकरणों के बीच झूल रहा है।

'नीतीश कुमार ने काम किया, इसलिए वोट देंगे'
72 वर्षीय विजय सिंह, जो राजपूत समुदाय से आते हैं, कहते हैं कि उन्हें अगस्त में ₹1100 की वृद्धावस्था पेंशन मिली पहले यह राशि ₹400 थी। साथ ही आयुष्मान भारत योजना के तहत उन्हें पटना के एक निजी अस्पताल में मुफ्त इलाज भी मिला। वह मानते हैं कि "नीतीश कुमार ने विकास किया है, इसलिए हम एनडीए के साथ हैं।"
उनके बगल में खड़े रोशन राय, जो भूमिहार जाति से हैं, बताते हैं, "बीजेपी कार्यकर्ता ने कहा है कि वोटर कार्ड की कॉपी दो, नई नौकरी योजना में नाम जुड़ जाएगा।" एनडीए ने 10 लाख नौकरियों का वादा किया है, जबकि महागठबंधन ने हर घर को सरकारी नौकरी देने का दावा किया है।
RJD के लिए मुस्लिम-यादव वोट अब भी मजबूत
फाल्गु नदी के पार पथरन गांव में राजद के जफर एहसान मतदाताओं के दस्तावेज जमा कर रहे हैं। उनका कहना है कि "जब हमारी सरकार बनेगी, ये कागज आपको नौकरी दिलाएंगे।"
वह मानते हैं कि मुस्लिम वोट अब भी पूरी तरह आरजेडी के साथ हैं। इसके अलावा, यादव समुदाय में भी एकजुटता बढ़ी है, खासकर 30 अक्टूबर को जनसुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या के बाद।
इस हत्या में जेडीयू प्रत्याशी और बाहुबली नेता आनंद सिंह का नाम जुड़ा, जिन्हें 1 नवंबर को गिरफ्तार किया गया। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस घटना ने यादव वोटों को और ज्यादा आरजेडी की ओर मोड़ा है।
किसके पास कौन-सा वोट बैंक
- बिहार की राजनीति का समीकरण आज भी लगभग वैसा ही है जैसा दशकों से रहा है।
- बीजेपी को भूमिहार, ब्राह्मण और वैश्य वर्ग का ठोस समर्थन हासिल है।
- जेडीयू के साथ कुर्मी, महादलित और अतिपिछड़ा वर्ग मजबूती से खड़ा है।
- चिराग पासवान की एलजेपी, जीतन राम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो दलित और कुशवाहा वोटों को साधने की कोशिश में हैं।
- दूसरी तरफ, आरजेडी अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण पर भरोसा कर रही है, जबकि वामपंथी दल गरीब भूमिहीन दलित किसानों पर दांव लगा रहे हैं। मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी का फोकस मल्लाह समुदाय पर है।
'पहाड़ काटने वाले' की धरती पर जाति की गूंज
गया के गहलौर गांव के श्रवण मांझी कहते हैं, "दशरथ बाबा ने हमारी तकलीफों को दुनिया तक पहुंचाया, और जीतन मांझी ने हमें आवाज दी।" वहीं, 15 किलोमीटर दूर अरई केशोपुर के विजयराज बताते हैं कि "हम मजदूरी करते हैं, लेकिन वोट वही देंगे जिसे हमारा 'बाबू साहब' कहेगा।" यह बयान बिहार की जमीनी सच्चाई दिखाता है, जहां कई इलाकों में अभी भी जातीय प्रभाव वोटिंग पर भारी पड़ता है।
'बदलाव' की बातें, लेकिन जाति अब भी सबसे बड़ा फैक्टर
राजनीतिक विश्लेषक अब्दुल कादिर का मानना है कि 2025 का चुनाव भी जाति बनाम वर्ग की लड़ाई नहीं, बल्कि जाति बनाम जाति की है। उन्होंने कहा, ''किसी एक गठबंधन के पक्ष में कोई लहर नहीं है। जब ऐसा होता है, तो जातीय समीकरण ही विजेता तय करते हैं।''
उनके मुताबिक पिछली बार 2020 में मगध की 26 सीटों में से 20 पर आरजेडी गठबंधन जीता था। इस बार एनडीए महिलाओं और वंचित वर्ग को साधने के लिए प्री-पोल स्कीम्स के जरिए उस समीकरण को तोड़ने की कोशिश कर रहा है।
बिहार की राजनीति में जाति का रंग अब भी गाढ़ा है, लेकिन विकास और योजनाओं का स्वाद भी धीरे-धीरे घुल रहा है। वोटर आज जाति के साथ-साथ अपने जेब और भविष्य को भी तौल रहा है। 14 नवंबर को आने वाला नतीजा बताएगा -बिहार जाति से ऊपर उठा या फिर वही पुराना समीकरण कायम रहा।
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