Lalu Family Politics: बिहार चुनाव से पहले लालू परिवार में घमासान, तेजस्वी यादव के लिए कितना बड़ा खतरा
Bihar Election 2025 Lalu Yadav Family Row: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का परिवार इन दिनों एक नई अंदरूनी खींचतान से गुजर रहा है। विवाद की जड़ है तेजस्वी यादव के बेहद करीबी सलाहकार और राज्यसभा सांसद संजय यादव का बढ़ता प्रभाव। मामला तब सुर्खियों में आया जब लालू की बेटी रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर संजय यादव और अपने भाई तेजस्वी को अनफॉलो कर दिया।
रोहिणी आचार्य का सोशल मीडिया पर संजय यादव के खिलाफ नाराजगी जताना और फिर परिवार को अनफॉलो करना कोई साधारण घटना नहीं है। यह साफ संकेत है कि परिवार के भीतर संजय यादव के बढ़ते प्रभाव को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। आइए समझते हैं कि बिहार चुनाव से पहले ये पारिवारिक कलह तेजस्वी के लिए कितना बड़ा खतरा?

लालू परिवार में संजय यादव विवाद: तेजस्वी के लिए कितना बड़ा खतरा?
राजनीतिक नजरिए से यह विवाद RJD के लिए डबल खतरा है। पहला-चुनावी सीजन में परिवार की फूट विपक्ष के लिए हथियार बनेगी। नीतीश कुमार और बीजेपी इसे तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करने के लिए भुनाएंगे। दूसरा-पार्टी के पुराने नेता और कार्यकर्ता, जो पहले ही संजय यादव के "सुपर पावर" से खिन्न बताए जाते हैं, अब खुलकर बगावती तेवर दिखा सकते हैं।
तेजस्वी की सबसे बड़ी ताकत उनका "युवा चेहरा" और "लालू का वारिस" होना है। लेकिन अगर परिवार ही उनके खिलाफ बंटा हुआ दिखे तो यह छवि कमजोर पड़ सकती है। रोहिणी जैसी लोकप्रिय और भावनात्मक जुड़ाव वाली शख्सियत, जिन्होंने पिता को किडनी दान दी थी, का विरोध खुलकर सामने आना पार्टी की साफ-सुथरी तस्वीर को धुंधला कर सकता है।
संजय यादव का बढ़ता दखल तेजस्वी के लिए दोहरी चुनौती है-एक तरफ परिवार की नाराजगी और दूसरी तरफ विरोधियों के हमले। अगर यह कलह जल्द नहीं सुलझी तो चुनावी मैदान में यह RJD के लिए बड़ा नुकसानदेह साबित हो सकती है।

लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव तो पहले से ही तेजस्वी के लिए मोर्चा खोलकर बैठे हुए हैं। उन्होंने अब साफ-साफ कहा है कि भगवान कसम RJD में अब कभी वापस नहीं जाऊंगा। महुआ से अकेले चुनाव लडूंगा। उन्होंने कहा है कि उनकी बहनें चुनाव प्रचार में आ सकतीं हैं।
संजय यादव के इर्द-गिर्द उठे इस विवाद ने साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। खासकर चुनावी मौसम से पहले परिवार के भीतर इस तरह का विभाजन तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता और रणनीति पर सवाल खड़े कर सकता है।
संजय यादव को लेकर लालू परिवार में कैसे भड़का विवाद?
तेजस्वी यादव की हालिया "बिहार अधिकार यात्रा" के दौरान एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें संजय यादव को यात्रा बस की फ्रंट सीट पर बैठे देखा गया। यह सीट परंपरागत रूप से पार्टी के शीर्ष नेता-लालू प्रसाद या तेजस्वी यादव-के लिए मानी जाती रही है। सोशल मीडिया पर उठे सवालों को रोहिणी ने रिपोस्ट कर दिया, जिसके बाद विवाद और गहरा गया।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक रोहिणी के इस कदम से परिवार के भीतर तीखी आलोचना हुई। कहा जा रहा है कि उन पर "डैमेज कंट्रोल" करने का दबाव भी बनाया गया। इसी बीच पार्टी ने विवाद शांत करने के लिए दलित नेताओं को प्रतीकात्मक रूप से फ्रंट सीट पर बैठाकर संदेश देने की कोशिश की।
रोहिणी का बड़ा बयान - "मेरी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं"
लगातार ट्रोलिंग और अफवाहों के बीच रोहिणी आचार्य ने रविवार 21 सितंबर को अपने X अकाउंट पर खुलकर बयान जारी किया। उन्होंने लिखा- "मेरे खिलाफ जो अफवाहें फैलाई जा रही हैं, वे सब निराधार हैं। मैं न कभी चुनाव लड़ना चाहती थी, न ही मेरी कोई पद की महत्वाकांक्षा है। न विधानसभा, न राज्यसभा और न ही किसी सरकारी पद पर मेरी कोई रुचि है। मेरे लिए सबसे बड़ी चीज है मेरी इज़्ज़त, माता-पिता का सम्मान और परिवार की प्रतिष्ठा।"
जहां एक ओर लालू परिवार इस विवाद पर चुप्पी साधे हुए है, वहीं बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने अपनी बहन का समर्थन किया। उन्होंने कहा-
"मेरी बहन ने जो सवाल उठाए हैं, वे पूरी तरह सही हैं। संजय यादव के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताना वाजिब है।"

रोहिणी सिर्फ लालू की बेटी नहीं, बल्कि खुद भी चर्चाओं में रही हैं। 2022 में उन्होंने सिंगापुर में अपने पिता लालू यादव को किडनी दान कर देशभर में सुर्खियां बटोरी थीं। पिछले साल सारण लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के राजीव प्रताप रूडी से हार गईं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार करने के बावजूद उन्हें लगातार ट्रोलिंग और आलोचना का सामना करना पड़ा है।
कौन हैं संजय यादव?
हरियाणा के रहने वाले संजय यादव का राजनीतिक सफर 2012 में शुरू हुआ, जब समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें तेजस्वी से मिलवाया। तब से वे तेजस्वी के भरोसेमंद सलाहकार बन गए। उन्होंने तेजस्वी को राजनीति की शुरुआती ट्रेनिंग दी। मीडिया से निपटने के लिए मॉक इंटरव्यू करवाए। समाजवादी विचारधारा और साहित्य से परिचित कराया। 2024 में वे राज्यसभा सांसद बने और अब तेजस्वी की हर राजनीतिक गतिविधि में उनकी भूमिका अहम हो गई है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि संजय यादव ने धीरे-धीरे संगठन में खुद को सबसे मजबूत कर लिया है।

अब लालू परिवार की यह कलह महज "फ्रंट सीट" की लड़ाई भर नहीं है, बल्कि सत्ता समीकरण और पार्टी पर प्रभाव की खींचतान का संकेत है। जहां रोहिणी ने साफ कहा है कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, वहीं तेज प्रताप का समर्थन यह दिखाता है कि संजय यादव का बढ़ता कद परिवार के भीतर असहजता पैदा कर रहा है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या लालू परिवार इस कलह को सुलझा पाएगा या RJD की राजनीति में यह विवाद और गहराएगा?












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