2020 का जनादेश बनाम 2025 की तैयारी: जिन सीटों से गुजर रही वोट अधिकार यात्रा, वहां महागठबंधन का पिछला रिकॉर्ड
Bihar Voter Adhikar Yatra: राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की वोट अधिकार यात्रा बिहार में 17 अगस्त से शुरू हो चुकी है। यह अब तक राहुल गांधी की सबसे बड़ी यात्रा बताई जा रही है, जो 23 जिलों से गुजरते हुए करीब 50 विधानसभा सीटों को कवर करेगी। कांग्रेस इस यात्रा के जरिए चुनावी मैदान में अपनी पुरानी जमीन हासिल करने और महागठबंधन के लिए माहौल बनाने की कोशिश में है।
दिलचस्प यह है कि जिन सीटों पर यह यात्रा हो रही है, वहां 2020 विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने 23 सीटें जीती थीं। इनमें से कांग्रेस ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 8 सीटें अपने खाते में डाली थीं। यही कारण है कि इस बार राहुल और तेजस्वी इन इलाकों में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। चुनावी बिगुल से पहले राहुल गांधी और तेजस्वी यादव शाहाबाद से लेकर मगध, अंग, कोसी, सीमांचल, मिथिला, तिरहुत और सारण तक सियासी जमीं नापते हुए महागठबंधन के लिए हवा बनाने में जुटे हैं।

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जनवरी 2024 में राहुल गांधी ने बिहार में 5 दिन की भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाली थी। नतीजों में महागठबंधन को सासाराम, औरंगाबाद, पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज जैसी 5 सीटें मिलीं। इन इलाकों में कुल 30 विधानसभा सीटें आती हैं, जहां कांग्रेस अब अपनी पकड़ और मजबूत करने पर जोर दे सकती है। आइए जानें जिन-जिन विधानसभा क्षेत्र से वोट अधिकार यात्रा गुजर रही है, वहां महागठबंधन का क्या प्रभाव है और उनकी क्या रणनीति है।
🔴 शाहाबाद: कांग्रेस का परंपरागत गढ़ या NDA की वापसी?
- शाहाबाद (भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर) को हमेशा से जातीय गोलबंदी की राजनीति प्रभावित करती रही है।
- यहां यादव, कुशवाहा, राजपूत, दलित और EBC अहम भूमिका निभाते हैं।
- 2015 में महागठबंधन ने यहां 16 सीटें जीती थीं, जबकि 2020 में यह आंकड़ा बढ़कर 19 हो गया।
- राहुल गांधी का फोकस यहीं है क्योंकि यह इलाका RJD, कांग्रेस और माले का कोर ज़ोन बन चुका है। राहुल गांधी लगातार OBC-EBC और दलित वोटरों को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
🔴 मगध: नीतीश कुमार के वोट बैंक पर सीधी नजर
- पटना, जहानाबाद, गया, औरंगाबाद जैसे जिलों वाला मगध क्षेत्र इस बार राहुल गांधी के लिए सबसे अहम है।
- 2020 में महागठबंधन ने यहां 49 में से 32 सीटें जीतीं।
- कांग्रेस ने 7 सीटों पर किस्मत आजमाई लेकिन सिर्फ 2 पर जीत पाई।
- यहां कुर्मी-कोइरी और EBC वोट लंबे समय से नीतीश कुमार की ताकत रहे हैं। लेकिन राहुल गांधी और तेजस्वी यादव दलित-यादव वोटरों को एकजुट करके समीकरण बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

🔴 अंग प्रदेश: NDA के गढ़ में सेंधमारी
- भागलपुर, मुंगेर और लखीसराय जैसे जिलों में राहुल गांधी की मौजूदगी बेहद अहम है।
- 2020 में महागठबंधन यहां सिर्फ 7 सीटों पर सिमट गया।
- कांग्रेस ने 9 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 3 पर जीत मिली।
- यह इलाका कभी कांग्रेस का गढ़ था। भागलपुर दंगों के बाद कांग्रेस यहां लगातार कमजोर होती गई। अब राहुल गांधी MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण और EBC वोटरों के सहारे यहां वापसी की कोशिश कर रहे हैं।
🔴 सीमांचल: ओवैसी का असर और कांग्रेस की चुनौती
- किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया वाले सीमांचल में मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं।
- यहां 24 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 12 मुस्लिम बहुल हैं।
- 2020 में AIMIM ने एंट्री करके 5 सीटें जीत लीं और महागठबंधन सिर्फ 8 सीटों पर सिमट गया।
- राहुल गांधी की कोशिश है कि मुस्लिम वोटर फिर से महागठबंधन के साथ जुड़ें और ओवैसी फैक्टर का नुकसान कम हो।
🔴 कोसी: नई जमीन की तलाश
- सहरसा, सुपौल और मधेपुरा का यह इलाका बाढ़, पिछड़ेपन और जातीय समीकरणों से प्रभावित है।
- 2020 में यहां महागठबंधन को 13 में से सिर्फ 3 सीटें मिलीं।
- कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला।
- यहां राहुल गांधी का लक्ष्य है कि EBC और मल्लाह वोटरों का भरोसा जीता जाए, ताकि NDA की पकड़ कमजोर हो।

🔴 मिथिलांचल और तिरहुत: NDA का गढ़, कांग्रेस की चुनौती
- मिथिलांचल (दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी आदि) में 2020 में NDA ने 46 में से 31 सीटें जीतीं। कांग्रेस यहां बेहद कमजोर रही।
- तिरहुत (मुजफ्फरपुर, छपरा, सीवान, गोपालगंज आदि) में 64 सीटें हैं। 2020 में महागठबंधन ने यहां 24 सीटें जीतीं, जिसमें से कांग्रेस के खाते में सिर्फ 3 आईं।
- यानी इन दोनों इलाकों में राहुल गांधी की असली चुनौती है - NDA के सवर्ण और EBC वोट बैंक में सेंध लगाना।
🔴 नतीजा: 2025 में किसकी बाजी भारी?
राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की वोट अधिकार यात्रा सिर्फ जनसंपर्क अभियान नहीं है, बल्कि यह बिहार में महागठबंधन की सियासी मजबूती की असली परीक्षा भी है।
शाहाबाद और मगध में महागठबंधन मजबूत दिख रहा है। अंग और सीमांचल में कांग्रेस को वापसी की जरूरत है। मिथिलांचल और तिरहुत में NDA अभी भी भारी है।
राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या वे EBC और दलित वोटरों को अपने पाले में ला पाएंगे या फिर NDA का गढ़ बरकरार रहेगा।












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