Bihar caste census: जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी अब क्यों नहीं कर सकेंगे अधिक 'सौदेबाजी'? जानिए
बिहार जातीय जनगणना की रिपोर्ट कई राजनीतिक दलों के लिए आंखें खोलने वाला है। कुछ का दबदबा बढ़ना तय है, तो कुछ के सामने अब चुनौतियां ज्यादा बढ़ गई हैं। खासकर जाति-आधारित छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियों के मोल-भाव करने की ताकत अब काफी कम हो सकती है।
बिहार के जिन राजनीतिक दलों की चुनावों के समय गठबंधन या सीटों पर तालमेल के समय सौदेबाजी की ताकत कम हो सकती है, उनमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) (HAM-S) के नेता जीतन राम मांझी और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख सहनी शामिल हैं।

पासवानों से मिलेगी बीजेपी को ताकत
वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (दोनों गुटों) की राजनीतिक और चुनावी ताकत बरकरार रहने की संभावना है। क्योंकि, जमुई के लोकसभा सांसद चिराग पासवान और उनके चाचा और हाजीपुर के लोकसभा एमपी पशुपति कुमार पारस की अगुवाई वाली पार्टियां मूल रूप से पासवान-जाति आधारित राजनीति करती हैं; और बिहार जाति जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में इस जाति की जनसंख्या 5.31% है। फिलहाल ये दोनों ही चाचा-भतीजे एनडीए के साथ हैं।
मांझी और सहनी की पार्टियों को झटका
लेकिन, वीआईपी और हम (सेक्युलर) के लिए यह जातीय जनगणना उनकी भविष्य की राजनीति के लिए किसी झटके से कम नहीं है। क्योंकि, सहनी की अगुवाई वाली वीआईपी, जो कि मल्लाह या निषाद जाति के प्रतिनिधित्व का दावा करती है, वह पहले इस जाति के 6% वोट बैंक होने का दावा करती थी। इसी आधार पर सहयोगी दलों से सीटों का बंटवारा करने का दबाव भी बनाती थी और बड़ी पार्टियों को उनकी मांगें माननी भी पड़ती थी।
लेकिन, ताजा जातीय जनगणना के मुताबिक मल्लाहों की जनसख्या महज 2.6% ही है, जो कि अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC)में शामिल हैं। यानी उनके अबतक के दावों से आधे से भी कम।
इन जाति-आधारित दलों के दावों की खुली पोल
इसी तरह जीतन राम मांझी भी पिछले कई चुनावों से सहयोगी दलों से अपने पास 5% मुसहर वोट बैंक होने का दावा करते हुए ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की कोशिश करते थे और कई बार इन्हें उनमें सफलता भी मिल चुकी है। लेकिन, बिहार में हुई जातीय जनगणना के मुताबिक अनुसूचित जाति में शामिल मुसहरों की आबादी सिर्फ 3% के ही करीब है।
2020 के चुनाव में वीआईपी-'हम' का कैसा था प्रदर्शन?
अगर 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों की बात करें तो मांझी और सहनी दोनों को बीजेपी ने एनडीए कोटे से सीटें दी थीं। तब हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) 7 सीटों पर लड़कर 4 सीटें जीती थी। वहीं विकासशील इंसान पार्टी 13 सीटों पर लड़ी थी और उसे भी 4 सीटों पर ही कामयाबी मिली थी। बाद में इस पार्टी के सभी चारों विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे।
अब नहीं कर सकेंगे अधिक 'सौदेबाजी'?
लेकिन, जाति जनगणना रिपोर्ट के बाद ये दोनों ही पार्टियां अब पहले की तरह किसी भी गठबंधन में दबाव बना सकेंगी यह बहुत बड़ा सवाल है। वैसे मांझी अब महागठबंधन सरकार से निकलकर एनडीए के करीब आ चुके हैं और वीआईपी के तो अपने विधायक ही उन्हें गच्चा दे चुके हैं।












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