पोस्टर अभियान चिराग पासवान का मास्टर स्ट्रोक! जेडीयू डरी, एनडीए में खलबली

नई दिल्ली। एनडीए की प्रेस कॉन्फ्रेन्स में पटना में यह एलान कर दिया गया कि जो नीतीश कुमार के नेतृत्व को मानेगा वही एनडीए में रहेगा। उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल अगर चार दलों को छोड़कर कोई करता है तो उसकी शिकायत चुनाव आयोग से की जाएगी। ये चार दल हैं- बीजेपी, जेडीयू, हम और वीआईपी। बीजेपी की ओर से ये दोनों स्पष्टीकरण जेडीयू को तसल्ली देने के लिए है जो इस चिंता में दुबली हुई जा रही है कि चिराग पासवान लगातार मोदी के पोस्टर का इस्तेमाल कर रहे हैं और चुनाव बाद बीजेपी-एलजेपी सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं।

Bihar assembly elections 2020 LJP chirag paswan poster campaign

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    वास्तव में चिराग पासवान के पोस्टर और चुनाव प्रचार ने बिहार में जेडीयू की नींद उड़ा दी है। चिराग पासवान ने स्पष्ट रूप से चार बातें कही हैं- जेडीयू को वोट देने का मतलब बेरोजगारी और पलायन को वोट करना बिहार के विकास के लिए मोदी विज़न जरूरी है। एलजेपी-बीजेपी मिलकर चुनाव बाद सरकार बनाएगी, एलजेपी हर उस सीट पर लड़ेगी जहां जेडीयू होगी।

    सीटों के बंटवारे की घोषणा करने वाली एनडीए की प्रेस ब्रीफिंग में यह घोषणा जेडीयू को संतोष दिलाने वाली हो सकती है कि एलजेपी एनडीए में नहीं है, कि नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के कामकाज वाले पोस्टर का इस्तेमाल केवल चार दल ही कर सकते हैं, कि एलजेपी इनका इस्तेमाल नहीं कर सकती। मगर, वास्तव में इन घोषणाओं का कोई मतलब नहीं है, इसे कुछ प्वाइंटर में समझें- एलजेपी को केंद्र सरकार के कामकाज और उसके नाम पर वोट लेने से कोई कैसे रोक सकता है अगर एलजेपी के नेता केंद्र सरकार में मंत्री बने हुए हैं! एलजेपी केंद्र सरकार में भी बनी हुई है और वह एनडीए का हिस्सा भी नहीं है! दोनों बातें एक साथ कैसे संभव है!

    मोदी विज़न को आगे बढ़ाने और बिहार में लागू करने की बात करना एलजेपी का अधिकार है या नहीं अगर वह मोदी सरकार में शामिल है! बीजेपी नेताओं ने यह भी कहा है कि वे मोदी के पोस्टर और केंद्र सरकार के कामकाज का इस्तेमाल करने वाली पार्टी यानी एलजेपी के खिलाफ चुनाव आयोग में जा सकती है। इस फैसले से जेडीयू संतुष्ट हो सकती है, मगर चुनाव आयोग का संतुष्ट होना बहुत मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि बीजेपी के नेताओं को ये सारी दुविधा पता नहीं है। वे बखूबी जानते हैं लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में जनता को संदेश देने की सियासत सबसे प्रमुख है। चुनाव के दौरान की सियासत से ज्यादा चुनाव के बाद की सियासत अधिक अहम दिखाई पड़ रही है। अगर वास्तव में चिराग पासवान को बीजेपी इस बात से रोकना चाहती है कि वह एनडीए में होने के फायदे से दूर रहें तो उसका पहला कदम होना चाहिए- केंद्र सरकार से एलजेपी को अलग करना। अगर बीजेपी ऐसा नहीं कर रही है तो समझिए कि दाल में कुछ काला है।

    बीजेपी को यह विश्वास दिलाना होगा कि चिराग पासवान जो कह रहे हैं कि चुनाव बाद बिहार में बीजेपी-एलेजपी की सरकार बनेगी, वह गलत है। यह विश्वास दिलाए बगैर वर्तमान एनडीए मजबूत नहीं हो सकता और न ही जेडीयू के कार्यकर्ता खुद को छले जाने के भाव से उबार पाएंगे। इसका असर उन सीटों पर भी पड़ेगा जहां बीजेपी के उम्मीदवार हैं और जेडीयू उन्हें समर्थन करने जा रही है। वे पूरे मन से कैसे काम कर सकेंगे जब तक कि यह शक दूर नहीं किया जाएगा कि जेडीयू को हराने का प्रण लिए बैठी एलजेपी के पीछे बीजेपी का हाथ नहीं है। अगर बीजेपी यह विश्वास जेडीयू को नहीं दिला पाती है तो इसके दो स्पष्ट मायने होंगे- बीजेपी जानबूझकर जेडीयू को कमजोर कर रही है और उसका मकसद एनडीए के भीतर खुद को जेडीयू से बड़ा करना है। अगर नीतीश के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी इतनी बड़ी हुई कि जेडीयू चुनाव में बुरी तरह हार जाए तो बीजेपी के लिए एलजेपी के रूप में चुनाव के बाद सरकार बनाने वाली सहयोगी तैयार खड़ी मिलेगी।

    वास्तव में एनडीए दो खेमों में बंट गयी लगती है। एक खेमा बीजेपी और उसकी सहयोगी वीआईपी का है तो दूसरा जेडीयू और उसकी सहयोगी 'हम’ का। एलजेपी एनडीए में है भी और नहीं भी, मगर वह हर हाल में जेडीयू के खिलाफ है। चुनाव अभियान के शुरू होते समय ही एनडीए का स्पष्ट रूप से खेमों में बंटा दिखायी देना, एलजेपी की बगावत और बीजेपी की अंदरखाने एलेजपी से सांठगांठ की आशंका ने जेडीयू को कमजोर कर दिया है। यह चिराग पासवान के पोस्टर अभियान की सियासत और उसकी अहमियत ही है कि इसने जेडीयू को डरा दिया है।

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