बिहार विधानसभा चुनाव 2020: राजद के हुए ‘श्याम” तो क्या जदयू में कश्ती तलाशेंगे ‘मांझी’?

बिहार विधानसभा चुनाव 2020: राजद के हुए ‘श्याम” तो क्या जदयू में कश्ती तलाशेंगे ‘मांझी’?

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    श्याम रजक ने 2009 में जिस तरह लालू को जबर्दस्त झटका दिया था उसी तरह 2020 में उन्होंने नीतीश कुमार भौंचक्का कर दिया है। उन्होंने 11 साल पहले राजद पर उपेक्षा और अपमान का आरोप लगाया था और आज जदयू के लिए भी वह यही कह रहे हैं। श्याम रजक 1995 से लगातार विधानसभा का चुनाव जीत रहे हैं। वे छह बार के विधायक हैं और दलित नेता के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनायी है। बिहार के दलित नेता वैसे तो भीम आर्मी के बिहार में चुनाव लड़ने को तवज्जो नहीं दे रहे लेकिन अंदर ही अंदर उनके मन में एक कश्मकश सी जरूर चल रही है। दलित मतों को साधने के लिए दलों के दरवाजे खुले हुए हैं। कोई जाएगा तो कोई आएगा। लोजपा के चिराग पासवान भी अपनी राजनीति पारी जमाने के लिए ही नीतीश कुमार पर हमलावार हैं। क्या श्याम रजक के राजद में जाने से चिराग की 'बार्गेनिंग पावर’ बढ़ जाएगी ? हम के अध्यक्ष जीतन राम मांझी महागठबंधन में असहज हैं। मांझी ने भी नयी कश्ती तलाश कर ली है।

    श्याम रजक के जाने से जदयू पर क्या असर ?

    श्याम रजक के जाने से जदयू पर क्या असर ?

    क्या श्याम रजक के जाने से जदयू पर कोई असर पड़ेगा ? उदय नारायण चौधरी कभी जदयू के बड़े दलित नेता थे। नीतीश कुमार ने उन्हें बिहार विधानसभा का अध्यक्ष बनाया था। बाद में नीतीश से खटपट होने पर उन्होंने 2018 में जदयू छोड़ दी। उनके जाने के बाद जदयू ने 2019 का लोकसभा चुनाव शानदार तरीके से जीता। क्या श्याम रजक के राजद में जाने से लालू को फायदा होगा ? बिहार में सभी 22 अनुसूचित जातियों का कोई एक सर्वमान्य नेता नहीं है। अलग-अलग समूहों के अलग-अलग नेता हैं। रामविलास पासवान का पासवान समुदाय में, श्याम रजक का धोबी समाज में जीतन राम मांझी का मुसहर समुदाय में और उदय नारायण चौधरी का पासी समुदाय में दबदबा है। 1990 में जब लालू यादव का उदय हुआ तो लगभग एक दशक तक एससी वोट बैंक पर उनका प्रभाव रहा। लालू राज के शुरू में कमल पासवान कभी राजद के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। धीरे-धीरे यह वोट बैंक राजद से छिटक गया। चुनाव के नतीजे इस बात की तस्दीक करते हैं। 2004 में लोकसभा की 24 सीटें जीतने वाला राजद 2009 और 2014 में चार पर आ गया तो 2019 में वह जीरो पर लुढ़क गया। 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद तब जीता जब नीतीश साथ थे। नीतीश अलग हुए तो 2019 के लोकसभा चुनाव में राजद को एक भी सीट नहीं मिली थी। राजद में फिलहाल शिवचंद्र राम सबसे सक्रिय दलित नेता हैं। अब शिवचंद्र राम और श्याम रजक की जोड़ी राजद के पुराने आधार मत को फिर वापस पाने की कोशिश करेगी। ये कोशिश आसान नहीं होगी।

    श्याम रजक की चुनौतियां

    श्याम रजक की चुनौतियां

    श्याम रजक राजद में तेजस्वी के युवा नेतृत्व के साथ कैसे तालमेल बैठाएंगे, यह एक बड़ा सवाल है। 2009 में श्याम रजक ने लालू यादव के जन्मदिन का केक खाने के दो दिन बाद राजद को खुदा हाफिज कह दिया था। लालू यादव ने ही श्याम रजक को राजनीति में खड़ा किया था। मंत्री भी बनाया था। लेकिन जब वक्त आया तो उन्होंने लालू से दामन झटक लिया। 2009 को लोकसभा चुनाव में लालू ने श्याम रजक को जमुई लोकसभा सीट से खड़ा किया था। कहा जाता है कि जब लालू यादव रेल मंत्री थे तब श्याम रजक का रेलवे में बहुत प्रभाव था। श्याम ये चुनाव हार गये थे। हार के बाद श्याम रजक ने पार्टी के ही कुछ बड़े नेताओं पर अपनी हार का ठीकरा फोड़ दिया था। इसके बाद वे लालू यादव से नाराज चलने लगे। 11 जून 2009 को लालू यादव का जन्मदिन मनाया गया था। जन्म दिन के मौके पर गरीब रथ ट्रेन के आकार का केक बना गया था। उस समय लालू यादव रेल मंत्री थे। केक कटा। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने अन्य लोगों के अलावा श्याम रजक को भी केक खाने को दिया। इसके बाद पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की एक बैठक हुई जिसमें श्य़ाम रजक ने राजद को मजबूत करने का एक प्रस्ताव भी पेश किया। इसके दो दिन बाद ही उन्होंने राजद छोड़ने की घोषणा कर दी। उन्होंने आरोप लगाया कि राजद के कुछ नेता उनकी जाति के आधार पर उन्हें अपमानित कर रहे थे। छह-सात नेताओं ने राजद को अपनी जागीर बना ली थी। मैं राजद में घुटन महसूस कर रहा था जिसकी वजह से मैंने अलग होने का फैसला किया। कुछ ही दिनों के बाद वे जदयू में शामिल हो गये। राजद के नेताओं ने श्याम रजक के इस फैसले को विश्वासघात कहा। लालू ने श्याम रजक के कथित विश्वासघात को दिल पर ले लिया। 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू -नीतीश को जीत मिली थी। श्याम रजक जदयू के विधायक थे। जब सरकार गठन का समय आया तो लालू ने श्याम रजक को मंत्री बनाये जाने पर अड़ंगा लगा दिया। उस समय नीतीश चाह कर भी श्याम रजक को मंत्री नहीं बना पाये थे। जदयू नेता के रूप में श्याम रजक लालू यादव और तेजस्वी पर व्यक्तिगत हमले करते रहे थे। अगर लालू और तेजस्वी के पुराने जख्मों को किसी ने कुरेद दिया तो क्या होगा श्याम रजक का ?

    कोई जाएगा तो कोई आएगा

    कोई जाएगा तो कोई आएगा

    बाढ़ आने पर जैसे लोग ऊंचा ठिकाना तलाशते हैं वैसे ही चुनाव आने पर नेता सुरक्षित दल तलाशते हैं। इस आने-जाने के खेल में कई बार फायदा होता है तो कई बार नुकसान। श्याम रजक अगर राजद में गये हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के लिए जदयू में आने का रास्ता आसान हो गया। जीतन राम मांझी के जदयू में आने की लगातार अटकलें लग रही हैं। मामला ‘हम' के जदयू में विलय या स्वतंत्र अस्तित्व पर अटका हुआ है। जीतन राम मांझी जब तक जदयू में थे तब लगातार मंत्री रहे। नीतीश कुमार ने खुद पद छोड़ कर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। सीएम बनने के बाद मांझी खुद को बड़ा दलित नेता मानने लगे। जदयू से अलग हो कर ‘हम' पार्टी बनायी। 2015 के चुनाव में तामझाम से कूदे। जीतन राम मांझी अपनी पार्टी के एकलौते विधायक चुने गये। दो में एक सीट पर हारे भी। फिर वे राजद, कांग्रेस के साथ महागठबंधन में आ गये। 2019 के लोकसभा चुनाव में मोलतोल कर महागठबंधन में हैसियत से अधिक सीटें ली। तीन में एक भी नहीं जीते। एक अन्य दलित नेता उदय नारायण चौधरी भी नीतीश से अलग हुए थे। वे आजतक अपना राजनीतिक भविष्य नहीं तलाश कर पाए हैं। रामविलास पासवान कभी लालू के साथ, कभी अकेले और कभी एनडीए के साथ रहे हैं। एनडीए के सहयोगी के रूप में पासवान को 2014 और 2019 के लोकसभा के चुनाव में जबर्दस्त कामयाबी मिली। लेकिन विधानसभा चुनाव में अभी भी लोजपा वजूद के लिए लड़ रही है। चिराग पासवान नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल कर अकेले चुनाव लड़ने की बात तो कर रहे हैं लेकिन हकीकत उनसे भी नहीं छिपी है। 2015 के विधानसभा चुनाव में में लोजपा को एनडीए में 43 सीटें मिली थीं लेकिन वह केवल दो ही जीत पायी। लोजपा की दलित समुदाय के एक सीमित वर्ग पर ही पकड़ है। अगर रामविलास पासवान का दलित वर्ग के करीब 16 फीसदी वोटों पर व्यापक प्रभाव होता तो ऐसे नतीजे नहीं होते। इसलिए ऐसा नहीं लगता कि श्याम रजक के जाने से चिराग पासवान की बार्गेनिंग पावर बढ़ जाएगी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने लोजपा को हैसियत न भूलने की सलाह दी है। 43 में दो सीटें जीतने वाली पार्टी कैसे 80 सीटें मांग सकती है ?

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