घटना के वक्त आरोपी था नाबालिग, अदालत में साबित करने में लग गए 33 साल, इसके बाद भी बरी होने में लगे 10 साल
अदालत को सिर्फ सबूत चाहिए। इसके अलावा उन्हें कुछ नहीं चाहिए। ऐसा ही एक अदालती मामला सामने आया है। एक शख्स को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। 33 साल की सुनवाई के बाद एक शख्स को नाबालिग घोषित किया गया।
अदालत को सिर्फ सबूत चाहिए। इसके अलावा उन्हें कुछ नहीं चाहिए। ऐसा ही एक अदालती मामला सामने आया है। एक शख्स को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। 33 साल की सुनवाई के बाद एक शख्स को नाबालिग घोषित किया गया। इतने सालों तक वह व्यस्क आरोपी की तरह मुकदमे का सामना किया। यह मामला बिहार के बक्सर जिले का है। आरोपी घटना के वक्त नाबालिग था। पर साबित होने में 33 साल लग गए।

बता दें कि बक्सर के मुन्ना सिंह और उनके पिता सहित 9 लोगों के के खिलाफ 7 सितंबर 1979 को मुकदमा दर्ज किया गया था। सभी के खिलाफ घारा-148 और 307 के तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन 2012 में ही यह प्रूफ हो गया कि आरोपी घटना के वक्त नाबालिग था। लेकिन इसके बाद भी उसे बरी होने में 10 साल लग गए। अदालत ने 11 अक्टूबर 2022 को गवाहों के अभाव में मुन्ना सिंह को बरी कर दिया।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, किशोर न्याय बोर्ड के सहायक अभियोजन अधिकारी एके पांडे ने कहा कि हमने मामले की अच्छी तरह से जांच की। उन्होंने बताया कि मुन्ना सिंह के खिलाफ कोई गवाह नहीं था, लिहाजा उसे बरी कर दिया गया। मुन्ना सिंह के वकील राकेश कुमार मिश्रा के मुताबिक उनका मुवक्किल केवल 13 वर्ष का था और घटना के समय आठवीं कक्षा का छात्र था।
वकील ने कहा कि आठवीं कक्षा का छात्र और 13 साल के होने के बावजूद भी उसे 2012 तक नाबालिग नहीं माना गया। 10 बाद उन्हें बरी किया गया। मुकदमे के दौरान उन्होंने मुन्ना सिंह से उनकी उम्र पूछी, तो उन्होंने अपनी आयु 46 वर्ष बताई। इससे साफ हो गया कि जब मामला दर्ज किया गया था तब वह नाबालिग थे।
वहीं, मुन्ना सिंह के पिता समेत मामले के पांच आरोपियों की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। मुन्ना सिंह के वकील ने कहा कि किशोर बोर्ड का बक्सर से पटना फिर आरा और फिर बक्सर ट्रांसफर होने के चलते देरी हुई। नहीं तो 2012 में ही मुन्ना सिंह को बरी कर दिया जाता।
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