Gandhi jayanti 2022: एमपी का चरखे वाला गांव, सतना में आज भी साकार होता है बापू के स्वावलंबन का सपना
सतना, 1 अक्टूबर। पूरा देश चरखे पर सूत तैयार कर कपड़े बनाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 153वीं जयंती मना रही है। जिस चरखे का उपयोग गांधीजी ने देश के शोषण को रोकने के लिए हथियार के रुप में किया था। वह चरखा आज भी सतना जिले के ग्राम सुलखम के लोगों की जीविका का साधन बना हुआ है। यहां के लगभग 50 परिवार गांधीजी के दिखाए रास्ते पर चलते है। यहां के ग्रामीण चरखा चलाकर अपना गुजारा चलाते हैं। लेकिन आज के इस आधुनिक दौर में चरखे के दम पर इनका गुजारा मुश्किल से हो रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि गांधी जी की यह विरासत बचाने के लिए शासन और प्रशासन कोई पहल क्यों नहीं कर रहा।

हर घर में चलता है चरखा
बता दें कि सतना जिला मुख्यालय से करीब 95 किलोमीटर दूर बसा एक गांव सुलखमा है। इस ग्राम पंचायत के हर घर में चरखा चलता है और इस चरखे पर सूत काटकर गांव के लोग कंबल बैठकी बनाते हैं। जिन्हें बेचकर ग्रामीणों की जीविका चलती है। इस तरह ये गांव आज भी महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर चल रहा है और स्वावलंबी है। चरखा चलाना इस गांव की परंपरा भी और जरूरत भी है।

पुरुषों के साथ महिलाएं भी चलाती है चरखा
पाल जाति बहुल इस गांव की कुल आबादी लगभग 4 हजार के आस पास है। इस गांव की पुरुषों के साथ ही महिलाएं बच्चे भी इस विरासत को संभाले हुए हैं। दरअसल महिलाएं चरखा चलाकर सूत कातती हैं और घर के पुरुष बच्चे उस सूत से कंबल बैठकी बनाकर उन्हें बेचकर जीविका चलाते हैं। हालांकि अब यह परंपरा या कहें कि विरासत कमजोर पड़ रही है. इसकी वजह ये है कि 10-12 दिनों में तैयार होने वाले कंबल से अब गांव के लोगों की मजदूरी नहीं निकल पा रही है।

प्रशासन से नहीं मिल रही मदद
गांव के ग्रामीणों को इस विरासत को बचाने के लिए प्रशासन की भी मदद नहीं मिल रही है। जिसके चलते महंगाई बढ़ने और खर्चे बढ़ने के कारण अब गांव के ग्रामीण छोटे-बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं। प्रशासन ने गांव में एक प्रशिक्षण केंद्र खोला गया था। लेकिन इस भवन का ना ताला खुला है और ना ही ग्रामीणों को यहां प्रशिक्षण दिया गया है।

भेड़ के बाल से बनाते हैं कंबल
गांव के ही रहने वाले राम निहोर पाल बताते हैं कि ये काम पिछले कई वर्षों से हमारे पूर्वज कर रहे थे। अब जब वो लोग नहीं रहे तो हम लोग ये काम कर रहे हैं। हम लोग चरखे से कंबल बनाते हैं। ऊन को धुनकते है, फिर सूत बनाते हैं। उसके बाद इसकी गोलाई बनाकर इसपर मांड़ चढ़ाई जाती है। वो आगे कहते हैं कि हम लोग गडर के बाल काटते हैं। जब गडर के बाल बड़े-बड़े हो जाते हैं, तो उनको कटानी से काट लिया जाता है। फिर उसी से कंबल बनाते हैं। उन्हीं कंबलों को बेचने से हमारा घर चलता है।
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