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MP News: विदिशा में तिरपाल और टॉर्च की रोशनी में प्रसव, जानिए MP की स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह हकीकत

MP News: कड़ाके की ठंड, सुनसान सड़क, ऊपर खुला आसमान, नीचे ज़मीन पर बिछी तिरपाल और मोबाइल/टॉर्च की रोशनी-इन हालात में एक गर्भवती महिला का प्रसव होना किसी एक दिन की "दुर्घटना" नहीं है, बल्कि यह मध्य प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के पूरी तरह चरमराने का जीवंत और शर्मनाक प्रमाण है।

यह घटना न सिर्फ सिस्टम की विफलता को उजागर करती है, बल्कि उन तमाम सरकारी दावों पर भी सवाल खड़े करती है, जिनमें प्रदेश को "हेल्थ मॉडल" बताया जाता है।

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एंबुलेंस नहीं, सिस्टम नदारद

जानकारी के अनुसार, प्रसव पीड़ा शुरू होने पर महिला के परिजनों ने 108 एंबुलेंस और जननी एक्सप्रेस सेवा के लिए संपर्क किया, लेकिन रात के समय कोई भी आपात स्वास्थ्य सेवा मौके पर नहीं पहुंची। अस्पताल और डॉक्टर होने के बावजूद जमीनी स्तर पर सिस्टम पूरी तरह गायब रहा। मजबूरी में परिजनों को सड़क किनारे तिरपाल की आड़ लेकर, टॉर्च की रोशनी में प्रसव कराना पड़ा। यह दृश्य अपने आप में किसी भी संवेदनशील समाज के लिए झकझोर देने वाला है।

सरकारी दावे बनाम जमीनी हकीकत

स्वास्थ्य विभाग रोज़ाना प्रेस विज्ञप्तियों, होर्डिंग्स और सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए "सुलभ, सशक्त और संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाओं" का प्रचार करता है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और अधिकारी तक योजनाओं की सफलता के दावे करते नहीं थकते। लेकिन सवाल यह है कि जब ये सेवाएं वास्तव में ज़रूरत के वक्त काम नहीं आईं, तो इन दावों का क्या मूल्य रह जाता है?

ग्रामीण इलाकों की सच्चाई यह है कि:

  • 108 एंबुलेंस सेवा कई बार समय पर उपलब्ध नहीं होती।
  • जननी एक्सप्रेस जैसी योजनाएं कागज़ों में ज़्यादा और ज़मीन पर कम दिखती हैं।
  • रात के समय आपात स्वास्थ्य सेवाएं लगभग निष्क्रिय हो जाती हैं।
  • हजारों करोड़ का बजट, फिर भी असहाय महिलाएं

सरकार हर साल स्वास्थ्य विभाग पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने का दावा करती है। 108 एंबुलेंस को 24×7 आपात सुविधा बताया जाता है। ऐसे में विदिशा की यह घटना दो ही संभावनाओं की ओर इशारा करती है-या तो सरकारी दावे पूरी तरह झूठे हैं, या फिर भ्रष्टाचार और लापरवाही ने पूरी व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया है।

विपक्ष ने उठाई जांच की मांग

मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता प्रवीण धौलपुरे ने इस घटना को "सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा" बताया है। उन्होंने मांग की है कि:

  • इस पूरे मामले की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराई जाए।
  • 108 एंबुलेंस सेवा, सीएमएचओ और संबंधित अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय हो।
  • लापरवाह अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
  • मुख्यमंत्री यह स्पष्ट करें कि स्वास्थ्य योजनाओं पर खर्च बजट का वास्तविक लाभ जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा।

विकास के दावों पर जिंदा सवाल

टॉर्च की रोशनी में जन्मा यह बच्चा सिर्फ एक नवजात नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री के "विकास" और "संवेदनशील शासन" के दावों पर जिंदा आरोप पत्र है। यह घटना याद दिलाती है कि जब तक स्वास्थ्य सेवाएं कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर नहीं उतरेंगी, तब तक ऐसे दृश्य बार-बार सामने आते रहेंगे-और हर बार सिस्टम की असफलता एक और मासूम ज़िंदगी पर भारी पड़ेगी।

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