कमलनाथ सरकार के 27% ओबीसी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में क्यों दी गई चुनौती? जानिए पूरा मामला
मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को दिए गए 27 प्रतिशत आरक्षण को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। लेकिन इस बार चुनौती आरक्षण की मात्रा को बढ़ाने की मांग के साथ है। मध्य प्रदेश ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने याचिका दायर कर दावा किया है कि ओबीसी की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद उन्हें केवल 27 प्रतिशत आरक्षण मिलना भेदभावपूर्ण है।
एसोसिएशन ने 1994 के आरक्षण अधिनियम की धारा 4(2) को असंवैधानिक बताते हुए 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। यह मामला कमलनाथ सरकार द्वारा 2019 में लागू किए गए 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की वैधता पर नए सवाल खड़े करता है, जो पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में 50 प्रतिशत की सीमा तोड़ने के आरोप में चुनौती का सामना कर रहा है।

यह चुनौती ऐसे समय में आई है जब मध्य प्रदेश सरकार (वर्तमान में भाजपा शासित) सुप्रीम कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का बचाव कर रही है। एक ओर सामान्य वर्ग के याचिकाकर्ता 27 प्रतिशत को 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन बता रहे हैं, वहीं ओबीसी संगठन इसे अपर्याप्त मानकर 50 प्रतिशत की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला आरक्षण की नीति पर राष्ट्रीय बहस को नई दिशा दे सकता है, जहां आबादी आधारित आरक्षण (जितनी आबादी, उतना हक) का मुद्दा प्रमुख है।
कमलनाथ सरकार का 27% ओबीसी आरक्षण: पृष्ठभूमि और विवाद
कमलनाथ सरकार ने मार्च 2019 में एक अध्यादेश जारी कर ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था। इसका उद्देश्य ओबीसी समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अधिक प्रतिनिधित्व देना था। लेकिन इस फैसले से कुल आरक्षण (एससी 16%, एसटी 20%, ओबीसी 27% और ईडब्ल्यूएस 10%) 73 प्रतिशत हो गया, जो सुप्रीम कोर्ट के 1992 के इंद्रा साहनी मामले में तय 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक है।
इस अध्यादेश को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां इसे अंतरिम रूप से स्थगित कर दिया गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां राज्य सरकार ने "गहन बहिष्कार" और ओबीसी की सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन का हवाला देकर 27 प्रतिशत का बचाव किया। हाल ही में दायर हलफनामे में सरकार ने कहा कि ऊपरी जातियां पास होने पर ओबीसी को 56 प्रतिशत मामलों में खड़ा रहना पड़ता है, जो गहरी असमानता दर्शाता है। लेकिन सामान्य वर्ग के संगठन इसे योग्यता का हनन बताते हैं।
27% क्यों कम, 50% क्यों नहीं?
मध्य प्रदेश ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 1994 के मध्य प्रदेश आरक्षण अधिनियम की धारा 4(2) की वैधता को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव निषेध) और 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का उल्लंघन करती है।
याचिकाकर्ताओं के वकील वरुण ठाकुर ने बताया, "ओबीसी की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन क्लास-1 और क्लास-2 सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व 13 प्रतिशत से भी कम है। अंबेडकर रिसर्च कमेटी की रिपोर्ट से यह साफ है कि उनका कोई उचित प्रतिनिधित्व नहीं है। इसलिए हमने धारा 4(2) को चुनौती दी है, जो ओबीसी को केवल 27 प्रतिशत तक सीमित रखती है।" उन्होंने कहा कि एससी और एसटी को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिलता है, तो ओबीसी को क्यों नहीं?
सीनियर एडवोकेट रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कोर्ट में तर्क दिया, "2011 की जनगणना के अनुसार, एससी की आबादी 15.6%, एसटी 21.01% और ओबीसी 50.01% है। एससी को 16% और एसटी को 20% आरक्षण मिल रहा है, जो अनुपातिक है। लेकिन ओबीसी को मात्र 27% मिलना भेदभाव है।" अन्य वकील विनायक प्रसाद शाह, हनुमत लोधी और रामकरण प्रजापति ने भी पैरवी की।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया: मुख्य सचिव से जवाब तलब
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की डिवीजन बेंच ने याचिका को गंभीरता से लेते हुए मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने पूछा, "ओबीसी को आबादी के अनुपात में आरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा?" मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।
विरोधी पक्ष: 50% सीमा का उल्लंघन और योग्यता का हनन
यह याचिका ऐसे समय में आई है जब सुप्रीम कोर्ट में ही 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को 50 प्रतिशत सीमा तोड़ने के आधार पर चुनौती दी जा रही है। सामान्य वर्ग के संगठन और याचिकाकर्ता तर्क देते हैं कि कुल आरक्षण 73 प्रतिशत पहुंचना असंवैधानिक है और योग्यता आधारित अवसरों को नुकसान पहुंचाता है। एनडीटीवी की रिपोर्ट में कहा गया कि ऊपरी जातियां पास होने पर ओबीसी को 56 प्रतिशत मामलों में खड़ा रहना पड़ता है, लेकिन सामान्य वर्ग इसे आरक्षण की अधिकता का नतीजा मानते हैं।
एक्स (पूर्व ट्विटर) पर सामान्य वर्ग के यूजर्स ने 27 प्रतिशत को ही "मेरिट का हनन" बताया है। एक यूजर ने लिखा, "73% आरक्षण से सामान्य वर्ग को केवल 27% अवसर मिलेंगे, जो असमानता है।" भाजपा सरकार भी 27 प्रतिशत का बचाव कर रही है, लेकिन 50 प्रतिशत की मांग पर चुप्पी साधे है। कांग्रेस ने भाजपा को "ओबीसी विरोधी" बताया है, क्योंकि 27 प्रतिशत अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ।
आंकड़ों में असमानता: आबादी vs आरक्षण
वर्ग,आबादी (2011 जनगणना),वर्तमान आरक्षण,मांगा गया आरक्षण (ओबीसी एसोसिएशन)
- एससी,15.6%,16%,-
- एसटी,21.01%,20%,-
- ओबीसी,50.01%,27%,50%
- ईडब्ल्यूएस,-,10%,-
- कुल,-,73%,96% (यदि 50% ओबीसी)
आगे क्या? राष्ट्रीय बहस की शुरुआत
यह मामला "जितनी आबादी, उतना हक" की मांग को मजबूत कर सकता है, जो कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी उठाते रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि 50 प्रतिशत सीमा तोड़ना अन्य राज्यों में भी विवाद पैदा कर सकता है। मध्य प्रदेश सरकार का जवाब इसकी दिशा तय करेगा। क्या ओबीसी को 50 प्रतिशत मिलेगा या 27 प्रतिशत ही रहेगा? सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक होगा।












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