MP News: दतिया में अंधविश्वास की भीड़तंत्रीय सजा: श्मशान की घटना के बाद युवक को चप्पलों की माला
MP News: दतिया शहर के झिर का बाग इलाके से अंधविश्वास, सामाजिक क्रूरता और भीड़तंत्र की ऐसी भयावह तस्वीर सामने आई है, जिसने न केवल इंसानियत बल्कि कानून और संविधान की आत्मा को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।
श्मशान घाट से जुड़ी एक असामान्य और विचलित करने वाली घटना के बाद समाज ने स्वयं को न्यायपालिका मानते हुए एक युवक को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया, अमानवीय सजा दी और पूरे परिवार को सामाजिक बहिष्कार का दंश झेलने पर मजबूर कर दिया।

श्मशान घाट की घटना, जिसने सब कुछ बदल दिया
घटना 14 जनवरी की है। झिर का बाग निवासी 72 वर्षीय मूलचंद कुशवाह का बीमारी के चलते निधन हो गया था। शाम को परिजन और समाज के लोग परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ श्मशान घाट पहुंचे और अंतिम संस्कार संपन्न कराया गया। इस दौरान मोहल्ले का ही रहने वाला बल्ली कुशवाह (40 वर्ष), पुत्र तुलसी कुशवाह, भी वहां मौजूद था। वह शॉल ओढ़े पूरे समय खड़ा रहा और अंतिम संस्कार में शामिल हुआ।
करीब एक घंटे बाद सभी लोग अपने-अपने घर लौट गए। लेकिन रात लगभग 11 बजे के बाद बल्ली कुशवाह दोबारा श्मशान घाट पहुंचा। यहीं से इस घटना ने भयावह मोड़ ले लिया।
श्मशान की राख से स्नान, खोपड़ी और अस्थियां घर ले गया
आरोप है कि बल्ली ने जलती चिता की लकड़ियों को फैलाया, राख को इधर-उधर बिखेरा और श्मशान की राख से स्नान किया। इसके बाद उसने मृतक मूलचंद की खोपड़ी और कुछ अस्थियां उठाईं, उन्हें पॉलिथीन में रखा और अपने घर ले गया। बताया जाता है कि पूरी रात वह उन्हीं अस्थियों के साथ कमरे में रहा और वहीं सोया।
अगली सुबह जब मृतक के परिजन अस्थि-विसर्जन के लिए श्मशान घाट पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर सन्न रह गए। चिता की राख बिखरी हुई थी और खोपड़ी गायब थी।
शॉल से खुला राज, घर से बरामद हुई अस्थियां
परिजनों ने खोजबीन शुरू की तो मौके पर एक शॉल मिली। यह वही शॉल थी, जो अंतिम संस्कार के समय बल्ली ने ओढ़ रखी थी। शक उसी पर गया, क्योंकि उसका घर मृतक के घर से महज 50 से 70 मीटर की दूरी पर है।
मामले की सूचना वार्ड पार्षद कल्लू कुशवाह को दी गई। पार्षद ने बल्ली को घर से बुलवाकर पूछताछ की। पूछताछ में उसने कृत्य स्वीकार कर लिया और अपने घर से पॉलिथीन में रखी अस्थियां भी बरामद कराईं।

भीड़ का कहर: चप्पलों की माला, गटर का पानी और सार्वजनिक अपमान
लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने समाज के चेहरे से सभ्यता का मुखौटा उतार दिया। बल्ली के भतीजे राजकुमार कुशवाह के अनुसार, मोहल्ले के लोगों ने आक्रोश में आकर कानून को हाथ में ले लिया। बल्ली को चप्पलों की माला पहनाई गई, गटर का कीचड़ और गंदा पानी पिलाया गया और पूरे मोहल्ले में घुमाकर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया।
यहीं नहीं रुके लोग। समाज ने पंचनामा तैयार कर बल्ली कुशवाह और उसके पूरे परिवार को सामाजिक रूप से बेदखल कर दिया।
सामाजिक बहिष्कार का फरमान
पंचनामा में यह भी दर्ज किया गया कि यदि समाज का कोई व्यक्ति बल्ली या उसके परिवार से संपर्क रखेगा या उन्हें अपने घर बुलाएगा, तो उस पर 5,100 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। इस पंचनामा पर लालाराम, ज्वाला, अतर सिंह, रतन, राजू, प्रकाश, रामकिशुन, भज्जू सहित समाज के कई वरिष्ठ लोगों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं।
इस फैसले के बाद बल्ली ही नहीं, उसकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य भी सामाजिक तिरस्कार और अलगाव झेलने को मजबूर हो गए।
अंधविश्वास की जड़: संतान की चाह में श्मशान की राख
बल्ली की पारिवारिक स्थिति इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना देती है। भतीजे राजकुमार के मुताबिक, बल्ली की पहली शादी को करीब 20 साल हो चुके हैं, लेकिन संतान नहीं हुई। दूसरी शादी से दो बच्चे हुए, लेकिन दोनों की मृत्यु हो गई। करीब डेढ़ साल पहले दूसरी पत्नी उसे छोड़कर चली गई। फिलहाल वह पहली पत्नी के साथ रहता है।
वह टेंट हाउस और आटा चक्की का काम करता है, शराब का आदी है और लंबे समय से मानसिक तनाव में है। उसका इलाज ग्वालियर में चल रहा है। राजकुमार का कहना है कि कुछ समय पहले बल्ली भितरवार गया था, जहां एक कथित जनवा ने उसे संतान प्राप्ति के लिए श्मशान की राख से स्नान करने की सलाह दी थी।
परिजनों के बयान
उमाचरण, मृतक का बेटा: "रात 11 बजे तक बल्ली हमारे साथ बैठा था, चाय भी पी। सुबह जब राख फैली मिली और खोपड़ी गायब थी, तो पूछताछ में उसने सब स्वीकार कर लिया। हमने डायल-112 पर पुलिस को बुलाया। पुलिस ने कार्रवाई का भरोसा दिया।"
मनीराम कुशवाह, मृतक का भाई: "बल्ली ने बताया कि बच्चे नहीं हो रहे थे, जनवा ने राख में लोटने को कहा था। इसी अंधविश्वास में उसने यह सब किया।"
राजकुमार कुशवाह, भतीजा: "लोग पहले कहते थे कि उस पर अघोरी बैठा है। पूजा भी कराई, डॉक्टर को भी दिखाया। इलाज चल रहा है, लेकिन भीड़ ने कानून हाथ में ले लिया।"
पुलिस का पक्ष
आकांक्षा जैन, एसडीओपी, दतिया: "मृतक के परिजनों द्वारा संबंधित व्यक्ति को थाने लाया गया था। उसके खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई है। सामाजिक बहिष्कार और मारपीट जैसे आरोपों की जांच कराई जाएगी।"
बड़ा सवाल
यह मामला केवल एक व्यक्ति के अंधविश्वास का नहीं, बल्कि उस समाज का भी है जिसने कानून और मानवाधिकारों को दरकिनार कर भीड़तंत्र को न्याय का विकल्प बना लिया। सवाल यह है कि क्या अंधविश्वास के नाम पर दी गई यह भीड़तंत्रीय सजा भी अपराध नहीं? और क्या संविधान के राज में सामाजिक बहिष्कार जैसे फैसलों की कोई जगह होनी चाहिए?
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