मध्यप्रदेश: सुंदरलाल तिवारी के निधन से विंध्य की सियासत से युग का अंत, बेबाकी थी इनकी पहचान

Bhopal News, भोपाल। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले कांग्रेस को झटका लगा है। कांग्रेस ने मध्यप्रदेश के विंध्य क्षेत्र में अपना एक दिग्गज नेता खो दिया है। कांग्रेस के प्रमुख नेता सुंदरलाल तिवारी का हाल ही में निधन हो गया।

Congress Leader Sundar Lal tiwari passes away

( Sundar Lal tiwari Biography) वे 1999 में रीवा से लोकसभा चुनाव जीते थे। पिछली विधानसभा में वे एक ऐसे शख्स थे, जिन्होंने भाजपा की सरकार के लिए कई चुनौतियां खड़ी कर दी थी। सुंदरलाल तिवारी ने हमेशा कांग्रेस की राजनीति को सक्रिय बनाए रखा। सतना और रीवा बेल्ट में उनकी अच्छी खासी पकड़ थी।

जीते जी नहीं दी तवज्जों

जीते जी नहीं दी तवज्जों

सुंदरलाल तिवारी श्रीनिवास तिवारी के उत्तराधिकारी थे। उनके अंतिम संस्कार में मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, मंत्री जीतू पटवारी, कमलेश्वर पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और भारतीय जनता पार्टी के भी कई प्रमुख नेता उपस्थित थे, लेकिन यही नेता सुंदरलाल तिवारी के जीते जी उन्हें तवज्जों नहीं देते थे। तिवारी की मृत्यु के एक दिन पहले उनकी कांग्रेस के एक बड़े नेता से तीखी बहस हो गई थी।

लोकसभा चुनाव में जताना चाहते थे दावेदारी

तिवारी चाहते थे कि वे लोकसभा टिकट के लिए अपनी दावेदारी जताएं और चुनाव लड़ें। कांग्रेस का एक वर्ग चाहता था कि वे अपनी दावेदारी वापस ले लें। तिवारी की मृत्यु से कांग्रेस के नेता दुखी हैं, लेकिन वे जानना चाहते हैं कि आखिर उन्हें ह्रदयाघात क्यों आया? संभाग की सभी विधानसभा सीटों पर उनका वर्चस्व था। कार्यकर्ताओं से उनके जीवंत संपर्क थे, लेकिन उन्हें हाशिए पर रख दिया गया।

पार्टी को जोड़ने वाली कड़ी को खो दिया

पार्टी को जोड़ने वाली कड़ी को खो दिया

विंध्य के कांग्रेसी कार्यकर्ता महसूस करते हैं कि विंध्य के दो नेताओं को हाशिए पर पटकने की कोशिशें लगातार हो रही थी, जिनमें से एक तो तिवारी थे और दूसरे हैं पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह। इन दोनों स्थानीय नेताओं को दरकिनार करते हुए कांग्रेस पार्टी उन लोगों को महत्व दे रही थी, जो बहुजन समाज पार्टी से कांग्रेस में आए थे। तिवारी के निधन से कांग्रेस का एक ऐसा गुट भी है, जो राहत महसूस कर रहा है, लेकिन पार्टी को जोड़ने वाली एक कड़ी कांग्रेस खो चुकी है। तिवारी जीवित होते और उन्हें टिकट मिलता, तो उनकी जीत की संभावना ज्यादा थी। अब यहां से लोकसभा चुनाव 2019 में जिसे भी टिकट मिलेगा, उसके लिए चुनौतियां बड़ी होंगी।

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