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MP News: CM मोहन यादव का बड़ा ऐलान, जल गंगा संवर्धन अभियान का नया चरण 19 मार्च से होगा शुरू

मध्य प्रदेश में जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने की दिशा में सरकार की महत्वाकांक्षी पहल "जल गंगा संवर्धन अभियान" ने उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। मुख्यमंत्री Mohan Yadav ने बताया कि वर्ष 2024 से शुरू हुए इस अभियान के माध्यम से प्रदेश में अब तक 2.79 लाख से अधिक कुओं, बावड़ियों, तालाबों, चेक डैम और अन्य जल संरचनाओं का संरक्षण, पुनर्जीवन और सुदृढ़ीकरण किया जा चुका है।

मुख्यमंत्री के अनुसार जनभागीदारी के साथ चलाया गया यह अभियान प्रदेश में जल संरक्षण की नई संस्कृति विकसित कर रहा है और मध्य प्रदेश को इस क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों की कतार में खड़ा कर रहा है।

CM Mohan Yadav announces new phase of Jal Ganga Sanrakshan Abhiyan from March 19

अभियान की बड़ी उपलब्धियां

सरकार के मुताबिक अभियान के तहत जल संरक्षण से जुड़ी विभिन्न संरचनाओं के संरक्षण और पुनर्जीवन का कार्य बड़े स्तर पर किया गया है।

2.79 लाख से अधिक जल संरचनाओं का संरक्षण

  • कुएं, बावड़ियां, तालाब, चेक डैम, अमृत सरोवर और खेत तालाब का जीर्णोद्धार
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जनभागीदारी
  • लाखों लोग "जलदूत" और "अमृत मित्र" के रूप में अभियान से जुड़े
  • भूजल स्तर में सुधार और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ी

सरकार का कहना है कि इस अभियान के माध्यम से पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग भी किया जा रहा है।

कई विभागों की संयुक्त भागीदारी

अभियान को सफल बनाने के लिए राज्य के कई विभागों ने मिलकर काम किया। इनमें जल संसाधन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, नर्मदा घाटी विकास, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, कृषि और पर्यावरण विभाग प्रमुख रूप से शामिल रहे। इन विभागों के समन्वय से जल संरचनाओं का निर्माण, मरम्मत, गहरीकरण और सफाई जैसे कार्य बड़े पैमाने पर किए गए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह अभियान केवल संरचनाओं के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य जल संस्कृति को पुनर्जीवित करना और भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

19 मार्च से अभियान का नया चरण

अब इस अभियान को और व्यापक बनाने के लिए सरकार ने इसे दोबारा शुरू करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री के अनुसार 19 मार्च 2026 को गुड़ी पड़वा के पावन पर्व से अभियान का नया चरण शुरू होगा, जो गंगा दशमी तक प्रदेशभर में चलेगा। इस दौरान लगभग 50 से 60 दिनों तक जल संरक्षण से जुड़े विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

  • इस चरण में मुख्य रूप से निम्न कार्यों पर जोर रहेगा-
  • कुएं, तालाब, बावड़ियां और नदी स्रोतों का संरक्षण
  • चेक डैम और अमृत सरोवर का निर्माण
  • वर्षा जल संचयन को बढ़ावा
  • तालाबों और नदियों की सफाई
  • खेत तालाब और जल संग्रहण संरचनाओं का विकास
  • बड़े स्तर पर वृक्षारोपण

16 विभागों की सक्रिय भागीदारी

अभियान के इस नए चरण में राज्य के 16 विभाग सक्रिय रूप से शामिल होंगे। इनमें जल संसाधन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, नगरीय विकास, कृषि, पर्यावरण, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, स्कूल शिक्षा और उद्यानिकी विभाग शामिल हैं। सरकार का कहना है कि विभिन्न विभागों के समन्वय से जल संरक्षण के कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा।

आधुनिक तकनीक और नवाचार का उपयोग

अभियान के इस चरण में आधुनिक तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा। सरकार AI आधारित योजना निर्माण और SIPRI सॉफ्टवेयर जैसी तकनीकों के माध्यम से जल संरचनाओं की बेहतर प्लानिंग करेगी। इसके साथ ही पारंपरिक जल संरक्षण पद्धतियों को भी बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे स्थानीय समुदाय की भागीदारी मजबूत हो सके।

विशेष कार्यक्रम भी होंगे आयोजित

  • अभियान के दौरान कई विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। इनमें-
  • नदी स्रोतों का विकास
  • क्षिप्रा परिक्रमा जैसी यात्राएं
  • जल संरक्षण जागरूकता अभियान
  • भोपाल में अंतर्राष्ट्रीय जल सम्मेलन
  • जैसे कार्यक्रम शामिल होंगे।

जल संकट के दौर में अभियान का महत्व

जलवायु परिवर्तन, भूजल स्तर में गिरावट और सूखा प्रभावित क्षेत्रों की बढ़ती चुनौती के बीच यह अभियान प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। पिछले वर्ष चले 90 दिन के अभियान में खंडवा जिला जल संरचनाओं के निर्माण में देश में अग्रणी रहा था, जहां सबसे अधिक संरचनाएं तैयार की गईं।

जनभागीदारी की अपील

मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों से अपील करते हुए कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार का काम नहीं बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि लोग अपने गांव और शहरों में तालाबों की सफाई, वर्षा जल संचयन और वृक्षारोपण जैसे कार्यों में भाग लें।

मुख्यमंत्री ने कहा- "जल की हर बूंद अमूल्य है। हमें मिलकर इसे बचाना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियों को जल संकट का सामना न करना पड़े।" प्रदेश सरकार का मानना है कि यदि समाज और सरकार मिलकर काम करें तो "जल है तो कल है" का संदेश वास्तव में जन आंदोलन का रूप ले सकता है।

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