भोपाल की 35 साल की पूजा जैन ने क्यों किया अन्न जल और परिवार का त्याग, जानिए संलेखना व्रत धारण करने का कारण
Bhopal news: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक अनोखी और भावुक घटना घटित हो रही है। 35 वर्षीय पूजा जैन ने अन्न और जल का पूर्ण त्याग करते हुए जैन धर्म की उच्चतम साधना, सल्लेखना व्रत, को अपनाया है। इस निर्णय ने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे जैन समुदाय को गहरे प्रभाव में डाल दिया है।
पूजा जैन ने अपने जीवन की इस अंतिम यात्रा के लिए पूरी तरह से संकल्पित हैं। उन्होंने अपने परिवार और सांसारिक जीवन को त्यागकर केवल साधना में ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया है। वर्तमान में वह भोपाल के चौक जैन मंदिर में स्थित संत निवास में तपस्वियों की तरह ध्यानमग्न हैं।

पूजा जैन की साधना की प्रक्रिया
पूजा जैन की साधना की प्रक्रिया में उनके परिवार के सदस्य और जैन विद्वान लगातार उनकी सहायता कर रहे हैं। संत निवास के एक कक्ष में पूजा जैन लेटी हुई हैं और उनके आसपास के लोग उन्हें नमोकार मंत्र का जाप कर रहे हैं। यह मंत्र उनकी साधना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
ब्रहमचारिणी दीदी और उनके परिवार के सदस्य पूजा को समर्थन देने के लिए वहां मौजूद हैं। आर्यिका दृणमति लगातार पूजा जैन को संबोधित कर रही हैं और उनकी साधना को सही दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
बीमारी और उपचार की कठिनाइयां
पूजा जैन की कहानी की शुरुआत उस समय हुई जब उन्हें पता चला कि उन्हें लीवर का कैंसर है, और वह भी चौथे स्टेज का। उनकी बीमारी का पता लगने के बाद, परिवार ने उनका हर संभव इलाज करवाने का प्रयास किया। खबरों के मुताबिक, पूजा को 70 से 80 कीमोथेरेपी सत्र दिए गए और टाटा मेमोरियल अस्पताल में उनका इलाज जारी रहा।
जब डॉक्टरों ने बताया कि इलाज अब संभव नहीं है, तो पूजा ने 10 सितंबर को अपने जीवन की दिशा को बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने सोचा कि मृत्यु की प्रतीक्षा करने की बजाय, क्यों न साधना के माध्यम से अपने जीवन का अंत किया जाए।
सल्लेखना व्रत का निर्णय
पूजा जैन ने अपने परिवार, ससुराल वालों और मायके वालों को अपने इस निर्णय के बारे में बताया और उन्हें अपनी इस अंतिम यात्रा के लिए सहमत किया। उन्होंने अपने पति सुधीर जैन और परिवार के अन्य सदस्यों को मनाया कि जब मृत्यु अवश्य आनी ही है, तो क्यों न इसे साधना के साथ शांति और संतोष के साथ स्वीकार किया जाए।
10 सितंबर को, पूजा जैन ने आचार्य विद्यासागर जी महाराज की उपस्थिति में भोपाल के चौक जैन मंदिर में अपनी साधना की शुरुआत की। यहां उनकी साधना में दो प्रमुख गुरु मति माताजी और द्रौपदी माताजी उनकी मार्गदर्शक बनकर उन्हें इस पथ पर आगे बढ़ा रहे हैं।
पूजा जैन का यह अद्वितीय और प्रेरणादायक निर्णय उनके अडिग विश्वास और संकल्प को दर्शाता है। यह घटना न केवल उनके परिवार बल्कि जैन धर्म और समाज के लिए भी एक गहरा संदेश प्रस्तुत करती है, जिसमें जीवन के अंतिम क्षणों को भी आध्यात्मिक साधना के माध्यम से पूर्णता की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है।
सल्लेखना विधि: जैन धर्म में समाधि लेने की प्रथा
जैन धर्म में, सल्लेखना (या संथारा) एक महत्वपूर्ण और दिव्य प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन के अंत को आध्यात्मिक रूप से शांतिपूर्ण ढंग से स्वीकार करता है। इस प्रथा को 'सल्लेखना' कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'अच्छाई का लेखा-जोखा'। यह विधि उन लोगों के लिए है जिनके पास अकाल मृत्यु, बुढ़ापा, या गंभीर बीमारी जैसी परिस्थितियाँ होती हैं, और जिनके लिए कोई चिकित्सा या उपचार संभव नहीं है।
सल्लेखना विधि का संक्षिप्त विवरण
सल्लेखना क्या है? सल्लेखना एक जैन परंपरा है जिसमें व्यक्ति मृत्यु के समय को सुखपूर्वक और बिना किसी शारीरिक या मानसिक कष्ट के स्वीकार करने की प्रक्रिया में अन्न-जल का पूर्ण त्याग कर देता है। इस दौरान, व्यक्ति अपना पूरा ध्यान ईश्वर की उपासना और ध्यान में केंद्रित करता है, जिससे वह आत्मा की शुद्धता की ओर बढ़ता है और मोक्ष की प्राप्ति करता है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने भी सल्लेखना विधि द्वारा अपने प्राण त्यागे थे। यह विधि व्यक्ति को मृत्यु के अंतिम क्षणों में शांति और संतोष का अनुभव कराती है।
सल्लेखना का महत्व जैन धर्म के अनुसार, जब किसी व्यक्ति को बीमारी, बुढ़ापा, या अकाल मृत्यु जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है और कोई उपचार संभव नहीं होता, तो सल्लेखना विधि के माध्यम से शरीर त्यागना उचित माना जाता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को अपने कर्मों के बंधनों को कम करने और मोक्ष प्राप्त करने का एक अवसर प्रदान करती है। इसके साथ ही, यह एक आत्म-स्वीकृति और आत्म-मूल्यांकन का भी तरीका है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन के किए गए कर्मों के लिए ईश्वर से क्षमा मांगता है।
सल्लेखना के अन्य नामों में संथारा, संन्यास-मरण, समाधि-मरण, और इच्छा-मरण शामिल हैं। इन सभी नामों से यह प्रक्रिया शांतचित्त होकर मृत्यु को स्वीकार करने की एक प्रक्रिया को दर्शाती है।
सल्लेखना विधि के नियम
- गुरु से अनुमति: सल्लेखना विधि अपनाने से पहले व्यक्ति को अपने गुरु से अनुमति प्राप्त करनी होती है। यदि गुरु जीवित नहीं हैं, तो सांकेतिक रूप से अनुमति ली जाती है।
- सेवा और समर्थन: इस प्रक्रिया के दौरान, व्यक्ति की सेवा के लिए 4 या अधिक लोग नियुक्त किए जाते हैं। ये लोग व्यक्ति को योग-ध्यान, जप-तप आदि के माध्यम से सहायता प्रदान करते हैं और अंतिम क्षणों तक उसकी सेवा में रहते हैं।
- अन्न-जल का त्याग: सल्लेखना विधि के तहत व्यक्ति अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर देता है, जिससे उसकी मृत्यु शांतिपूर्वक और बिना किसी शारीरिक कष्ट के होती है।
आध्यात्मिक ध्यान: इस विधि के दौरान, व्यक्ति अपने ध्यान और साधना में पूरी तरह लीन रहता है, जिससे उसकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।
सल्लेखना विधि जैन धर्म में मृत्यु को एक आध्यात्मिक अवसर मानते हुए उसे शांति और संतोष के साथ स्वीकार करने की प्रक्रिया है। यह विधि न केवल मृत्यु के प्रति एक सम्मानजनक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु के बीच के आध्यात्मिक संबंध को भी स्पष्ट करती है।
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