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MP News: मध्य प्रदेश में कैंसर बना आपात स्थिति! हर दिन 242 नए मरीज, 133 मौतें—स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़े सवाल

Cancer crisis: मध्य प्रदेश में कैंसर अब सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि एक गंभीर आपात स्थिति बन चुकी है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा में और बाहर मीडिया से बातचीत में आंकड़े पेश करते हुए कहा कि प्रदेश में हर दिन औसतन 242 नए कैंसर केस सामने आ रहे हैं और 133 लोगों की मौत हो रही है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2025 के बीच प्रदेश में कैंसर से 4,638 मौतें दर्ज हुई हैं और मामले हर साल 10.53% की दर से बढ़ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि mortality-to-incidence ratio 55.1% है - यानी 100 में से 55 मरीजों की मौत हो जाती है।

Cancer becomes a crisis in MP 242 cases daily 133 deaths health system in question

कैंसर के आंकड़े और हकीकत

  • नए मामले: प्रतिदिन 242 (सालाना करीब 88,000+)
  • मौतें: प्रतिदिन 133 (सालाना करीब 48,000+)
  • मृत्यु दर: 55.1% (देश के औसत से काफी ऊपर)
  • राष्ट्रीय रैंकिंग: मोदी सरकार ने संसद में बताया कि कैंसर मामलों में मध्य प्रदेश 7वें स्थान पर है।
  • सरकारी सुविधाएं: पूरे प्रदेश में सिर्फ 2 बड़े सरकारी कैंसर संस्थान (भोपाल और इंदौर में)। बाकी ज्यादातर मरीजों को महंगे प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भर होना पड़ता है।

उमंग सिंघार ने कहा, "कैंसर अब महामारी बन चुका है। लेकिन सरकार के पास न रोकथाम की ठोस योजना है, न बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग, न पर्याप्त अस्पताल, न सस्ती दवाइयाँ। PM-JAY और जनऔषधि जैसी योजनाएँ ₹5 लाख तक की हैं, लेकिन कैंसर का इलाज करोड़ों में हो जाता है। हजारों करोड़ का स्वास्थ्य बजट बताती है सरकार, लेकिन हकीकत में व्यवस्था वेंटीलेटर पर है।"

ICMR के अनुसार मुख्य कारण

ICMR (Indian Council of Medical Research) की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में कैंसर के प्रमुख कारण हैं:

  • प्रदूषित पानी और भूजल में आर्सेनिक/फ्लोराइड की अधिकता
  • कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक इस्तेमाल
  • तंबाकू, गुटखा, सिगरेट और शराब का बढ़ता सेवन
  • खराब खान-पान और प्रदूषण

लेकिन इन कारणों पर रोकथाम के लिए कोई ठोस अभियान या स्क्रीनिंग प्रोग्राम बड़े स्तर पर नहीं चल रहा। ग्रामीण इलाकों में तो जागरूकता और जांच की सुविधा नाममात्र की है।

प्राइवेट अस्पतालों पर मजबूरी

प्रदेश में सरकारी स्तर पर कैंसर की उचित सुविधा न होने से मरीज मजबूरी में प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भर हैं। जहां कीमोथेरेपी, रेडिएशन और सर्जरी का खर्च लाखों-करोड़ों में पहुंच जाता है। PM-JAY (आयुष्मान भारत) के तहत कवरेज सीमित है और कई दवाइयाँ योजना से बाहर हैं। जनऔषधि केंद्रों में भी कैंसर की महंगी दवाइयाँ उपलब्ध नहीं होतीं।

उमंग सिंघार ने कहा, "23 साल के शासन में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर किया गया और प्राइवेट सिस्टम को मजबूत किया गया। आज हालात यह हैं कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटीलेटर पर है। सवाल सीधा है - क्या मध्य प्रदेश के लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है? सरकार को अब जवाब देना होगा।"

सरकार का दावा और हकीकत

सरकार की ओर से कहा जाता है कि प्रदेश में कैंसर केयर को मजबूत किया जा रहा है - भोपाल और इंदौर में कैंसर हॉस्पिटल हैं, AIIMS भोपाल में सुविधाएं हैं और जनऔषधि केंद्रों की संख्या बढ़ाई गई है। लेकिन विपक्ष का कहना है कि ये दावे कागजी हैं। ग्रामीण इलाकों में कैंसर स्क्रीनिंग, जागरूकता और समय पर इलाज की सुविधा नाममात्र की है।

जनता की पीड़ा और सवाल

कैंसर पीड़ित परिवारों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में मशीनें खराब रहती हैं, डॉक्टर कम हैं, दवाइयाँ नहीं मिलतीं। प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च उठाना गरीबों के बस की बात नहीं। उमंग सिंघार ने कहा कि अगर सरकार ने अभी ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाले सालों में कैंसर के मामले और मौतें और बढ़ेंगी।

यह आंकड़े और हकीकत मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कैंसर अब सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक आपात स्थिति बन चुकी है। सरकार को अब जवाब देना होगा - क्या मध्य प्रदेश के लोगों की जान की कोई कीमत है?

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