कर्नाटक चुनाव 2023: अब तक भ्रष्टाचार क्यों नहीं बन सका चुनावी मुद्दा ?

कर्नाटक विधानसभा चुनावों का ऐलान हो चुका है। लेकिन यहां चुनावी मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं है। आखिर क्यों पढ़िए ये स्पेशल रिपोर्ट।

Karnataka Elections 2023

Karnataka Elections 2023: कर्नाटक एक ऐसा राज्य है जहां भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। घपले-घोटाले के आरोपों से न भाजपा अछूती है न कांग्रेस और न जेडीएस। इन आरोपों के बावजूद ये पार्टियां समय-समय पर सरकार बनाती रहीं। यानी चुनावी राजनीति में इन भ्रष्ट नेताओं की करतूतों का पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। अभी भाजपा विधायक मदल विरुपक्षप्पा और कांग्रेस नेता डी शिवकुमार चर्चा में हैं। मदल विरुपक्षाप्पा के अफसर बेटे 40 लाख रुपये घूस लेते पकड़े गये। भाजपा विधायक और उनके बेटे के ठिकानों से 8 करोड़ रुपये बरामद किये गये। दूसरी ओर कांग्रेस नेता डी शिवकुमार जनता के ऊपर नोट बरसाने के कारण विवादों में घिर गये हैं।

सबके दामन पर दाग

2011 में कर्नाटक लोकायुक्त से एक लिखित शिकायत की गयी थी राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों एसएम कृष्णा, धरम सिंह और एचडी कुमारास्वामी ने अपने-अपने कार्यकाल (1999 से 2004) में अवैध खनन की इजाजत दी थी। आरोप लगा था कि ये तीनों मुख्यमंत्री खनन पट्टा आवंटन की गड़बड़ी में शामिल थे। लोकायुक्त ने इनके खिलाफ जांच के आदेश दिये थे। एसएम कृष्णा और धरम सिंह जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री थी। वहीं कुमार स्वामी जेडीएस के। 2011 में कर्नाटक के तत्कालीन लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने अवैध खनन के संबंध में अपनी रिपोर्ट राज्य के मुख्य सचिव को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के परिवार के लोगों को कई कंपनियों ने भुगतान किये थे। इसी रिपोर्ट में जेडीएस के मुख्यमंत्री रहे कुमारास्वामी का जिक्र गड़बड़ी करने वाले नेता के रूप में किया गया था। अवैध खनन से राज्य सरकार को 16 हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ था। भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को भूमि घोटला के आरोप में जेल भी जाना पड़ा था।

दाग से फर्क नहीं, जीत तो मिल ही जाती है

येदियुरप्पा पर 40 करोड़ रिश्वत लेने का आरोप लगा था लेकिन भाजपा ने 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्हें सीएम चेहरा बनाया था। इस चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। लेकिन फिर भी येदियुरप्पा ने सरकार बनायी थी। लेकिन वे सिर्फ 7 दिन ही मुख्यमंत्री रह पाये थे क्यों कि बहुमत साबित करने में सफल नहीं रहे थे। हालांकि आगे चल कर येदियुरप्पा फिर सीएम बने। दूसरी तरफ कांग्रेस, 2023 के विधानसभा चुनाव में सिद्धरमैया और डीके शिवकुमार को चुनावी चेहरा बना कर मैदान में उतर रही है। डीके शिवकुमार पर भी भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं। सिद्धरमैया जब मुख्यमंत्री (2013 से 2018) थे तब शिवकुमार उनकी सरकार में मंत्री थे। 2015 में कर्नाटक हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर शिवकुमार और उनके परिवार पर अवैध खनन में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। 2017 में इनकम टैक्स विभाग ने शिवकुमार के कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। उनके एक करीबी के घर से 8 करोड़ रुपये बरामद किये गये। ईडी ने मन लॉन्ड्रिंग केस में डीके शिवकुमार को गिरफ्तार भी किया था। अगर मान लिया जाए कि 2023 के चुनाव में कांग्रेस को जीत मिलती है तो क्या शिवकुमार को कोई महत्वपूर्ण पद नहीं मिलेगा ? यानी भ्रष्टाचार के आरोपी नेता कर्नाटक में फलते-फूलते रहे हैं। यहां तक कि उन्हें जनता का समर्थन भी मिलता रहा है।

लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय की अहमियत

कर्नाटक में पहली बार 2007 में भाजपा की सरकार बनी थी। इसके बाद उसका प्रभाव यहां बढ़ता गया। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 224 में 110 सीटें जीत कर सभी को चौंका दिया था। इस बार भाजपा के येदियुरप्पा बहुमत वाली सरकार के मुख्यमंत्री बने। यहां भ्रष्टाचार इसलिए मुद्दा नहीं बन पाया क्यों कि मतदान की प्रवृति सामुदायिक रुझान से संचालित है। अपने समुदाय को समर्थन देने की चाहत में वोटर वैसे नेता की भी नैया पार लगा देते हैं जो घपले के आरोपी होते हैं। कर्नाटक की राजनीति लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के ईर्द-गिर्द घुमती रही है।

2018 के चुनाव में लिंगायत को सबसे अधिक टिकट

लिंगायत सबसे बड़ा समुदाय है जिसकी आबादी करीब 17 फीसदी है। 120 विधानसभा सीटों पर इस समुदाय के वोट निर्णायक हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर वोक्कालिगा समुदाय है जिसकी आबादी करीब 15 फीसदी है। यह समुदाय दक्षिणी कर्नाटक में प्रभावशाली है। भाजपा के येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के शक्तिशाली नेता हैं। इसलिए उनकी चुनावी ताकत कभी कम नहीं हुई। जेडीएस के नेता कुमारास्वामी वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं इसलिए उनकी चुनावी हैसियत बनी रही। कांग्रेस नेता डीके शिव कुमार भी वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। कर्नाटक चुनाव में समुदाय कितना अहम है यह 2018 के टिकट वितरण से समझा जा सकता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने लिंगायत समुदाय के 68 उम्मीदवारों और कांग्रेस ने 49 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था। कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के 8 नेता मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हो चुके हैं। जब चुनाव में जाति और धर्म सबसे बड़ा आधार हो तो फिर भ्रष्टाचार कैसे चुनावी मुद्दा बनेगा ?

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