प्रयागराज में भाजपा को एक और झटका, 29 सालों से पार्टी का चेहरा रहे इस कद्दावर नेता ने तोड़ा नाता

Prayagraj news, प्रयागराज। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आईं रीता जोशी के लिए दर्जनों कांग्रेसियों ने पार्टी छोड़ी थी, फिर रीता के प्रत्याशी बनाए जाने पर यही क्रम दोबारा से नजर आया, लेकिन वैसा ही क्रम अब भाजपा के लिए शुरू हो गया है। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में पहुंचे और प्रत्याशी बने योगेश शुक्ला के समर्थन में भाजपाईयों का पार्टी छोड़ने का सिलसिला चल पड़ा है। इलाहाबाद संसदीय सीट से पिछले 29 सालों से भाजपा का कद्दावर चेहरा रहे और भाजपा की प्रदेश मीडिया के पैनलिस्ट शशांक शेखर पांडेय ने भाजपा छोड़ दी है।

खुलकर कर रहे बीजेपी का विरोध

खुलकर कर रहे बीजेपी का विरोध

अपने पद से त्यागपत्र देते हुए शशांक खुलकर बीजेपी के विरोध में उतर आए हैं। हालांकि, भाजपा छोड़ने का दर्द उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट पर भी देखने को मिला, जहां उन्होंने लिखा था कि 29 सालों की अथक यात्रा को आज पूर्ण विराम मिल गया। फिलहाल, योगेश के बाद शशांक का भी भाजपा से जाना बड़ा झटका माना जा रहा है और यह तय है कि अगले कुछ दिनों में इस तरह का घटनाक्रम जारी रहेगा। वैसे अंदर खाने की खबर यह है कि रीता जोशी को टिकट मिलने से नाराज व खेमे में बंटे बड़े नेताओं ने भी अंदर ही अंदर योगेश को सपोर्ट करने की पहल शुरू कर दी है, यही कारण है कि योगेश की हर मीटिंग में दो चार भाजपा नेताओं के पहुंचने का क्रम जारी है। यह घटनाक्रम कितना गुल खिलाएगा यह तो चंद दिनों में पता चलेगा, लेकिन भाजपा के लिए जीत के समीकरणों पर अब बुरी तरह से पानी फिर रहा है।

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यमुनापार को गढ़ बनाने की पहल

यमुनापार को गढ़ बनाने की पहल

शशांक शेखर वकालत के साथ भाजपा के स्थानीय पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं से बेहतर सामंजस्य रखने वाले कद्दावर नेताओं में शुमार हैं, जिनका प्रभाव ब्राह्मण मतदाताओं पर बेहद ही प्रभावशाली है। योगेश की रणनीति के अनुसार भाजपा के ब्राह्मण नेताओं को अपनी ओर खींचकर ले आने का है, जिसका क्रम शशांक भी है। हालांकि, शशांक योगेश के बेहद ही खास सहयोगी व नजदिकियों में से एक रहे हैं और अब अपने समर्थकों के साथ अपने धुर विरोधी दल कांग्रेस के लिए वोट मांग रहे हैं। फिलहाल, प्रयागराज शहर में भाजपा काफी प्रभावशाली नजर आ रही है। खासकर ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन रीता जोशी को बहुत अधिक मिल रहा है। ऐसे में अपनी कर्मस्थली को अपना गढ़ बनाने के लिऐ योगेश व उनकी टीम जी जान से जुट गई है। कोशिश की जा रही है है कि रीता को जितना फायदा शहर में हो उतना नुकसान उनका यमुनापार इलाके में कर दिया जाए।

योगेश का अभी नहीं है विरोध

योगेश का अभी नहीं है विरोध

अभी तक के घटनाक्रम में जो सबसे आश्चर्यजनक बात है वह यह है कि योगेश शुक्ला के कांग्रेस प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भी अभी तक उनका विरोध नहीं शुरू हुआ है। अमूमन ऐसा होता नहीं है, लेकिन योगेश की छवि को धूमिल करने के प्रयास में होने वाले नफा नुकसान को भांप कर ही स्थानीय नेता या तो खामोश हैं या दबे पांव ही अपनी रणनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। लगातार दौरा व प्रचार कर रही रीता जोशी ने भी योगेश शुक्ला पर कोई कमेंट नहीं किया, जबकि खुद योगेश ने भी रीता का विरोध साफ लहजे में नहीं किया था। फिलहाल, इसे साइलेंट किलर वाला जहर माना जा रहा है, जो एक दूसरे की कमजोरी और मजबूती को बखूबी जान रहे हैं और एक दूसरे का विरोध के बजाए अपनी ताकत को बढ़ाने में जुटे हैं।

कोई और ना ले जाए फायदा

कोई और ना ले जाए फायदा

इलाहाबाद से जीत की प्रबल दावेदार भाजपा को जिस तरह से योगेश ने झटका दिया है और खिलाफत में चुनाव लड़ने आए हैं, ऐसे में सियासी गणित कुछ और ही इशारा कर रही है। अब रीता और योगेश की लड़ाई में तीसरे प्रत्याशी का फायदा होता दिख रहा है। अभी तक कमजोर प्रत्याशी कहे जा रहे राजेंद्र के लिए खुद ही रास्ते खुल गए हैं। भाजपा के लिए अब ब्राह्मणों का एक तरफा वोट मिलना मुश्किल है और कांग्रेस के पास आगे निकलने के लिए अभी समीकरण तैयार नहीं है, जबकि राजेंद्र के पास सपा-बसपा के मूल वोटरों का पूरा ताना बाना सेट है। अगर सपा-बसपा के मूल वोटर बिना भटके गठबंधन के प्रत्याशी को वोट करते हैं तो अभी तक बढ़ते बनाए रीता जोशी को दूसरे स्थान पर खिसकना पड़ जाएगा। हालांकि, अभी तो रुझान आना शुरू ही हुए हैं, ऊंट किस करवट बैठेगा यह अगले 10 दिनों में साफ होता नजर आ जाएगा।

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