नरेंद्र मोदी को पीएम बनने से रोक नहीं पायेगी वंजारा की चिठ्ठी
यह देखने वाला है कि कैसे 'धर्मनिरपेक्ष' मीडिया और राजनेताओं ने गुजरात के पूर्व आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा द्वारा लिखे गए पत्र को शस्त्र बना कर नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पदे के लिये संभावित दावेदारी के धूमिल होने का जश्न मनाना शुरू कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इतने दिनों से वंजारा कहां थे, अगर उन्हें इतना कुछ मालूम था मोदी के बारे में तो वो अब तक चुप क्यों थे, किसके ग्रीन सिगनल का इंतजार कर रहे थे?
या कहीं ऐसा तो नहीं कि वो गुजरात के मुख्यमंत्री के खिलाफ आग उगलने के लिये मोदी-विरोधी तत्वों से हरी झंडी के इंतजार में थे? ऐसे तो लगता है कि कल को अगर कोई सड़क का भिखारी यह कहेगा कि मोदी ने उसे एक रुपए का सिक्का नहीं दिया, तो पूरा छींका फिर फूटेगा और मोदी को गरीब-विरोधी तत्व के रूप में पेश कर दिया जायेगा।
आखिर चुनाव के पहले ही वंजारा आगे आये?
वंजारा का यह दावा है कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उभरने के लिए मोदी की संभावना दु:खद है और उन्हें पीएम बनाने की उम्मीद करना बेवकूफी। यदि वंजारा यह कहते हैं कि वह और उनके सहयोगियों को आदेशों के क्रियान्वयन के लिये प्रदेश सरकार की मदद नहीं मिली, तो पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी की बात जरूर संज्ञान में लेनी चाहिये, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार के हर मामले में पब्लिक सर्वेंट की जवाबदेही ज्यादा होती है।
वंजारा को आज दर्द सा महसूस हो रहा है, कि उन्हें नैतिक स्तर पर न्याय नहीं मिला। लेकिन यह न्याय उन्होंने पहले क्यों नहीं मांगा, जब बात सामने आयी थी? या फिर क्या वो किसी प्रकार के पुरस्कार का इंतजार कर रहे थे, या वो यह सोच रहे थे कि कहीं उनका फेंका हुआ तीर निशाने से चूक गया, तो क्या होगा। अब उन्होंने मोदी के खिलाफ खुल कर बोलने का मन बना लिया है। वंजारा का कहना है कि वह मोदी को भगवान की तरह पूजते थे, सच पूछिढ तो एक प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते यह उनका सबसे कमजोर वक्तव्य है।
दागी नेता वोट पाने के लिए कामना कर सकते हैं, तो मोदी जैसे सक्षम राजनेता क्यों नहीं कर सकते?
न्याय से हटकर हत्याएं केवल गुजरात और नरेंद्र मोदी के शासन में ही हुई हैं? हम सरकारी कामकाज में अपने निजी रिश्तों या निजी बातों को क्यों ले आते हैं। और एक आम मतदाता के लिये इसका क्या सरोकार है? अगर भारतीय मतदाता अभी भी देश भर में दागी नेताओं को वोट दे सकते हैं, तो इसमें कोई चांस नहीं कि मोदी जैसे एक साफ सुथरी छवि वाले नेता को वोट न दे।
राजनीति में नैतिकता?
नैतिक आरोप राजनीति में कभी काम नहीं आये हैं। यदि 1975 और 1977 के बीच इमरजेंसी के बाद या फिर 1984 के सिख दंगों के बाद कांग्रेस सत्ता में वापस आ जाती, तो यह बात सोचना भी बेवकूफी होगा कि वंजारा के पत्र के बाद मोदी के पीएम बनने के चांस कम हो गये। वंजारा थे या नहीं थे, गुजरात की जनता ने मोदी को जमकर सपोर्ट किया और यहीं कारण है कि वो लगातार तीन बार चुनाव जीते। उनके शासन करने की क्षमता ने सारे रिकॉर्ड भी तोड़ दिये हैं। अगर हम नैतिकता को हमारी राजनीति में जगह देने लगे तो मुझे लगता है कि तमाम नेताओं का तो खुलेआम घूमना तक मुश्किल हो जायेगा।
मोदी के विकास मॉडल की बात करें तो गुजरात में है, न कि वंजारा के पत्र में। और तो और मोदी के विरोधी सोचते हैं कि गुजरात का विकास मॉडल के जरिये वो राज्य के के बाहर के वोट प्राप्त नहीं कर पायेंगे, तो यही बात खुद वंजारा पर लागू होती है, कि उनका पत्र गुजरात के बाहर किसी को भी प्रभावित नहीं करेगा।
क्या वंजारा दबाव में थे?
क्या वंजारा यह पत्र तब नहीं लिख सकते थे, जब भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिये प्रोजेक्ट करना शुरू भी नहीं किया था। जब इशरत जहां का मामला सुर्खियों में था, तब वंजारा का यह पत्र क्यों बाहर नहीं आया। आखिर ऐसा कौन सा दबाव है, जिसके चलते वंजारा ने यह पत्र उसी समय प्रेषित किया, जब देश की जनता महंगाई से त्रस्त है और रुपया दिन प्रति दिन गिरता जा रहा है। खैर दबाव कोई भी हो मोदी जैसे शक्तिशाली नेता को पटरी से उतरने के लिए पत्र से नहीं बल्कि बड़ी राजनीतिक रणनीति की जरूरत है। पत्र और भावना से काम नहीं चलेगा।













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