रेशम धागों से संवरी सैकड़ों महिलाओं की जिंदगी

गौरतलब है कि कोरिया जिले में नैसर्गिक रूप से प्रतिवर्ष करीब 40 लाख प्राकृतिक कोसा ककून और 14 लाख पालित कोसा ककून का उत्पादन होता है। जिले में एक भी धागाकरण इकाई नहीं होने के कारण दूसरे प्रांतों व जिलों के व्यापारी कोचियों के माध्यम से कौड़ियों के दाम में ये कोसा फल खरीद लेते हैं, जिससे यहां के कोसा संग्राहक परिवार को अपनी मेहनत तक का वाजिब दाम नहीं मिल पाता था।
जिला प्रशासन द्वारा एकीकृत कार्ययोजना के तहत जिले के पांच स्थानों में कोसा टसर धागाकरण इकाइयों की स्थापना करने का निर्णय लिया गया ताकि जिले में उत्पादित कोसा ककून का मूल्य संर्वधन कर यहां के कोसा संग्राहकों को न केवल उनकी मेहनत का उचित मूल्य दिया जा सके, बल्कि उन्हें इस कार्य से अतिरिक्त आमदनी भी मुहैया हो सके। टसर धागाकरण इकाई के लिए एकीकृत कार्ययोजना मद से पिछले साल 65 लाख रुपये की कार्ययोजना स्वीकृत की गई। इसके तहत जिले के बैकुंठपुर विकास खंड के ग्राम सलका, भंडारपारा व कुड़ेली में, सोनहत विकास खंड के ग्राम कैलाशपुर में तथा मनेंद्रगढ़ विकास खंड के ग्राम रोझी में संचालित कोसा केंद्रों में धागाकरण यूनिटों की स्थापना की गई।
इन यूनिटों में 32 लाख 12 हजार रुपये की लागत से कुल 75 नग मोटराइज्ड रिलिंग मशीन, 20 नग स्पिनिंग मशीन तथा 30 नग री.रीलिंग मशीन के साथ धागाकरण में उपयोग आने वाली अन्य मशीनें स्थापित की गई है। शेष राशि से धागाकरण केंद्रों के लिए आधारभूत संरचनाएं निर्मित की जा रही हैं। पांचों धागाकरण यूनिटों में वहां के आस-पास के क्षेत्र की 20-20 महिलाओं को समूह में संगठित कर उन्हें धागाकरण के कार्य का प्रशिक्षण मुहैया कराया जा रहा है। धागाकरण कार्य का प्रशिक्षण मिलने से समूह की महिलाएं काफी उत्साहित हैं।
समूह की सदस्य उर्मिला कुजूर का कहना है कि पहले कोसा ककून को एकत्रित कर बहुत कम कीमत में कोचियों को बेच दिया जाता था परंतु अब प्रशिक्षण मिलने से वे स्वयं रेशम का धागा तैयार कर उससे अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकेगी। वहीं, तेजवंती राजवाड़े बताती है कि पहले देखने में यह कार्य बहुत कठिन लग रहा था जबकि प्रशिक्षण के बाद अब वह बहुत आसानी से ककून से धागा निकाल लेती है।
समूह की महिलाएं घर का कामकाज निपटाने के बाद बचे समय में केंद्र में आकर धागा निकालने का कार्य बड़ी लगन से कर रही है। इससे ये महिलाएं जहां इस कार्य में पारंगत हो रही हैं, वहीं प्रत्येक महिला प्रतिदिन 150 से 200 रुपये तक की आमदनी भी प्राप्त करने लगी हैं। इन महिलाओं ने अभी तक करीब 15 किलो धागा का उत्पादन भी कर लिया है जिसका बाजार मूल्य करीब 45 हजार रुपये है। इन महिलाओं द्वारा उत्पादित धागा की गुणवत्ता भी बेहतर है जिससे व्यापारियों द्वारा मांग भी बढ़ती जा रही है।
कोसा धागा की मांग राज्य के जांजगीर, चांपा, कोरबा व रायगढ़ जिलों के साथ ही सीमावर्ती प्रदेश झारखंड व उत्तर प्रदेश में भी काफी है और वहां के व्यापारी समय-समय पर जिले का भम्रण करते रहते हैं। इससे इन महिलाओं को घर बैठे ही उत्पादित धागा की अच्छी कीमत हासिल हो जाएगी। महिलाओं में सहकारिता की भावना को विकसित करने के लिए जिला प्रशासन द्वारा पांचों केंद्र की समूह की महिलाओं को एक सहकारी समिति के रूप में संगठित कर उनका पंजीयन भी कराया गया है। इसका नाम अमृत टसर धागाकरण सहकारी समिति कोरिया रखा गया है।












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