रूपये में ऐतिहासिक गिरावट, अब पहुंचा 61.19 के स्तर पर

यह ध्यान देने योग्य है कि जैसे ही डॉलर के मुकाबले रूपये में गिरावट दर्ज की जाती है, वैसे ही पेट्रोल कंपनियां आयात बिल बढ़ने की बात कहकर सरकार पर कीमतें बढ़ाने का दबाव बढ़ा देती है, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ने से आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी बेतहाशा वृद्धि होती है। नतीजा महंगाई बढ़ जाती है।
भारत में भी उत्पादन और निवेश की स्थिति अच्छी नहीं है। देश में आयात अधिक किया जाता है जबकि निर्यात बेहद कम होता है, जिसके कारण विदेशी धन की आवक कम होती है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत का आयात 60 फीसदी तो निर्यात मात्र 40 फीसदी है। इसके अलावा रूपये के टूटने का कारण अमेरिका में आयी बेरोजगारी भी है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी होने के कारण निवेशक आकर्षित नहीं हो रहे हैं। वहीं निवेशक रूपये को भी तवज्जो नहीं दे रहे है उनकी प्राथमिकता डॉलर बन गया है। इस पर रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने कहा है कि हम इस समय किसी खास एक्चेंज रेट पर ध्यान नहीं दे रहे है। रूपये की खराब हालत को देखते हुए निवेशक, पूंजी निकाल रहे हैं।
पिछले दिनों भारत के वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने भारतीयों से सोना न खरीदने की अपील भी की थी। भारत में सोने की मांग अधिक है, जिससे भारत को इसे आयात करना पड़ता है।












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