जनता को हर 3 महीने पर लगेगा बिजली का झटका

नियामक आयोग ने नियमावली बनाकर पिछले वर्ष अक्टूबर में लागू किए गए टैरिफ के साथ ही कार्पोरेशन प्रबंधन को फ्यूल एंड पावर परचेज कास्ट एडजस्टमेंट व्यवस्था लागू करने को कहा था। जनवरी से मार्च के दरमियान कोयले व तेल के दाम बढऩे से प्रति यूनिट बिजली उत्पादन में 32 पैसे की अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में पावर कार्पोरेशन के अध्यक्ष संजय अग्रवाल ने 27 जून को एफपीपीसीए के संबंध में नियामक आयोग में चुपचाप रिव्यू याचिका दाखिल की है।
जानिए क्यों बढ़ रहे हैं दाम
दरअसल बिजली घरों को पर्याप्त कोयला आपूर्ति का नाटक बीते बरस जुलाई में ऐतिहासिक बिजली कटौती के बाद शुरू हुआ था। पांचवें सबसे बडे कोयला भंडार वाले भारत की सरकार पूरे एक साल तक कोशिश करती रही लेकिन बिजली घरों के लिए कोयले का इंतजाम नहीं हो पाया। बीते सप्ताह वित्त मंत्री पी चिदंबरम को लगा कि बिजली न होने से तो महंगी बिजली अच्छी है। इसलिए कोयले की कमी आयात से पूरी करने का फैसला सुना दिया गया।
आयात के कारण बिजली की बढ़ी हुई लागत उपभोक्तों से वसूली जाएगी और पूरे देश में बिजली 20 से 25 पैसे प्रति यूनिट तक महंगी होगी। बिजली दरों में यह प्रस्तावित वृद्धि दरअसल एक निक्कमी सरकार का अभिशाप है। जिसने अपने चहेते उद्यमियों को खदानें देने का फैसला करने में जरा देर नहीं लगाई लेकिन प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पूरी सरकार, सार्वजनिक कंपनी, कोल इंडिया को उत्पादन बढ़ाने पर राजी नहीं कर पाई। 2009 से 2015 तक देश में करीब 78000 मेगावाट की नई बिजली उत्पादन क्षमता तैयार हो रही है। इसमें करीब 36000 मेगावाट के बिजली संयंत्र तैयार हैं और कोयले को तरस रहे हैं। कोल इंडिया इस नई उत्पादन क्षमता की केवल 65 फीसदी जरुरत पूरी कर सकेगी, शेष कोयला आयात होगा।
कोल इंडिया की अक्षमता बहुत महंगी पड़ेगी, क्योंकि आयातित कोयले की कीमत घरेलू कोयले से चार गुना ज्यादा होगी। राज्यों के बिजली नियामकों ने बिजली दरें बढ़ाने का फार्मूला बनाना शुरूकर दिया है। उप्र में बढऩे वाले दामों की यही वजह हैं। 2015 तक उपभोक्ताओं को करीब 10,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त चुकाने होंगे। रुपया गिर रहा है इसलिए आयातित कोयले की लागत व बिजली की कीमत बढ़ती जाएगी।












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