आडवाणी कबूल नहीं पा रहे कि उनका वक्त जा चुका है
लखनऊ। 1983 में लंदन में विश्वकप क्रिकेट चल रहा था गावस्कर टीम के सबसे बड़े बल्लेबाज थे लेकिन किसी भी मैच में खेल नहीं पा रहे थे, कप्तान कपिल देव उनके सामने ही ऊभर कर आए थे और गावस्कर की फॉर्म को लेकर चिंतित थे, एक मैच में जब अंतिम ग्यारह खिलाड़ी की घोषणा हुई तो उसमें गावस्कर का नाम नहीं था। कप्तान कपिल देव से पूछा गया कि गावस्कर जैसे वरिष्ठ खिलाड़ी टीम में क्यों नहीं है तो कपिल देव ने गावस्कर का सम्मान बनाए रखने के लिए कह दिया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं हैं। पत्रकारों ने जाकर जब गावस्कर से पूछा तो उन्होंने कहा कि वह पूरी तरह ठीक है, पत्रकार वापस आए और कपिल देव को बताया कि गावस्कर कह रहे है कि वो बिलकुल ठीक है अब आप का क्या कहना है तो कपिल का जवाब था जब वो ऐसा कह रहे है तो मैं क्या कह सकता हूं।
यह वाक्या मैंने इसलिए लिखा कि गावस्कर की तरह लालकृष्ण आडवाणी जानते है कि भाजपा में शीर्ष नेता से लेकर आम कार्यकर्ता तक उन्हें पूजता है लेकिन इस समय वह मोदी के नेतृत्व में कांग्रेस से मुकाबला करना चाहता है। हर आदमी का एक वक्त होता है, हर व्यक्ति हर वक्त में ऐक जैसा नहीं रहता, न उसकी लोकप्रियता। लालकृष्ण आडवाणी जानते है कि उनका वक्त अब पूरा हो गया है लेकिन वह विद्रोह करके मोदी के लिए मुसीबत खड़ी करना चाहते है। वह जानते है कि उनके इतने सख्त इस्तीफे के बाद पूरी पार्टी उन्हें मनाने में जुट जाएंगी और वह अंत में वह मान भी जाएंगे, लेकिन उसके बाद क्या होगा।

उनसे कौन मिलने जाएगा। उनकी कौन बात मानेगा। आडवाणी उसी प्रकार जिद कर रहे हैं जैसे बच्चों के जवान होने के बाद कुछ बातों में अपनी अहमियत दिखाने के लिए कभी-कभी घर के बुजुर्ग जिद कर बैठते है। वह वक्त की आवश्यकताओं को नहीं समझते हैं। अब समझदार बच्चे अपने बुजुर्गों की बात न चाहते हुए भी मान लेते है लेकिन बुजुर्ग बच्चों की नजरों में अपना सम्मान खो देते हैं। लालकृष्ण आडवाणी आज वो कर रहे हैं जिसे बचाने के लिए उन्होंने हमेशा कुर्बानी दी। भाजपा कैडर पार्टी थी, लेकिन जब कांग्रेस से जंग के लिए एक व्यक्ति को आगे बढ़ाने की बात हुई तो उन्होंने बगैर यह देखे कि इससे उनका अहित हो सकता है पार्टी के हित में अटल को आगे बढ़ा दिया।
भले ही मतदाताओं ने अटल को चाहा लेकिन पार्टी का कार्यकर्ता हमेशा आडवाणी को चाहता रहा। भाजपा और संघ को लगा कि २००४ और २००९ में पार्टी कांग्रेस से इसलिए हारी कि उसका पास नेता नहीं था जो भीड़ को वोट में बदल दे। आजादी के बाद के राजनैतिक इतिहास पर नजर डाले तो शास्त्री जी के बाद कांगे्रस पार्टी इंदिरा गांधी नाम से जानी गई और उसके बाद तो उसका सारा वजूद गांघी परिवार के आसपास ही सिमट गया।
१९७७ में जेपी, १९८९ में वीपी सिंह, १९९९ में अटल के नेतृत्व में ही विपक्ष कांग्रेस को हरा सका। भाजपा जानती है कि अटल के व्यक्त्वि ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया। आडवाणी को पार्टी ने एक बार नहीं, दो बार यह मौका दिया लेकिन जिन्ना पर बयान के बाद आडवाणी भीड़ को वोट में बदलने वाले नेता नहीं रहे। उनके साथ नजर आ रहे नेता सुषमा स्वराज, वैकयानायडू, अनंत कुमार जैसे नेता भी आज लोकसभी की एक सीट जीतने के लायक नहीं है।
जैसा मैं पहले भी लिख चुका हूं, कांग्रेस तभी हारती है जब विपक्ष के पास भीड़ को वोट में बदलने वाला नेता होता है। भाजपा के आम कार्यकर्ता को लगा कि मोदी जो कांग्रेस को तीन बार पटकनी दे चुके है उन्हें यदि आगे किया जाए तो शायद जीत दर्ज की जा सकती है। कार्यकर्ता की बात संघ ने समझी और बाद में इसे भाजपा के अन्य नेताओं को समझाया। पार्टी में जब इस पर आम सहमति बनने लगी तो दिल्ली में बैठकर राजनीतिकरने वाले नेताओं में हडकम्प मच गया। उसमें से वो नेता तो मान गए जिन्हें लगा कि मोदी के साथ रहे तो कुछ हासिल हो सकता है। लेकिन जो प्रधानमंत्री के प्रत्याशी थे वो तिलमिला गए और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में एकजुट हुए।
आडवाणी को गुमान था कि उनकी मर्जी के बगैर पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेता इतनी बड़ी हिम्मत नहीं दिखाएंगे। लेकिन उनका अनुमान गलत निकला और पार्टी ने उनकी इच्छा को दरकिनार करते हुए भाजपा के अपने- अपने इलाके के सूबेदारों (मुख्यमंत्री) की बात मान ली। क्योंकि सूबेदारों को मालूम है कि उनके इलाके में भी कौन से नेता की मांग हैं और उन्हें अपने-अपने इलाके में राज करना है तो उन्हें मोदी जैसे नेता की आवश्यकता है। आडवाणी इतिहास की इतनी सी मोटी बात नहीं समझ पा रहे है कि उगते सूरज को सब सलाम करते है। एक समय था जब जेपी, वीपी और अटल के साथ हर नेता तस्वीर खिंचवाने की तमन्ना रखता था लेकिन जैसे ही उनका रसूख खत्म हुआ उन्हें पूछने वाला कोई नहीं दिखा।












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